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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 482 में से

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पृष्ठ 318

२६० | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदनित्यत्वादिविचारः

(पूर्व कल्प के वेद का अनुक्रम भिन्न है और ईश्वर-निर्मित इस कल्प के वेद का अनुक्रम अत्यन्त विलक्षण है—ऐसा नैयायिक मानते हैं। यह अद्वैत वेदान्तियों को सम्मत नहीं है। वे आकाशादिकों के समान वेदों की उत्पत्ति मानते हैं। किन्तु उनकी आनुपूर्वी, पूर्वकल्प की आनुपूर्वी के समान ही होती है, यह सिद्ध करते हैं।)

अब मीमांसकों के मत को बताते हैं—हमने वेदों की नित्यता स्वीकार की होने से, उनमें पुरुषगत समस्त दोषों का अभाव है, इस कारण उन्हें प्रामाण्य है। वेदों को यदि अनित्य माना जाय तो उनमें पुरुष-प्रणीतत्व मानना होगा। वेदकर्ता पुरुष में ईश्वरत्व होने पर भी उसमें भक्तपक्षपात आदि दोष होना बहुत संभव है। इस कारण बौद्धप्रणीत आगम के समान वेदों में भी दोष हो सकते हैं। किन्तु वेदों के नित्य होने से उनमें से समस्त पुरुषदोषों का निरसन हो जाता है। उनमें भ्रम-प्रमादादि कोई दोष नहीं कहा जा सकता, इसी कारण वे प्रमाण कहे जाते हैं।

इस प्रकार नैयायिक एवं मीमांसकों के वेदप्रामाण्यविषयक मतों को बताकर अब ग्रन्थकार स्वयं अपना मत बताते हैं। वेद की उत्पत्ति होने से हमारे मत में वे नित्य नहीं है। यहाँ पर 'तु' शब्द उभयपक्षों से अपने मत की विलक्षणता प्रकट करने के लिये है। उत्पत्ति के कारण वेदों के अनित्य होने पर भी प्रलय-काल तक उनकी स्थिरता स्वरूपतः रहती है। इसलिये वे पुरुषदोषों से रहित रहते हैं। उनका पुरुषदोष-निर्मुक्तत्व श्रुतिसिद्ध होने से वेदों के अनित्यत्व में साधक 'उत्पत्तिमत्त्व' हेतु को स्वरूपा-सिद्ध नहीं कहा जा सकता। 'ऋग्वेदादि, इस महाभूत का निःस्वसित है' इत्यादि श्रुतियाँ वेदों की उत्पत्ति में प्रमाण हैं। यहाँ के 'आदि' शब्द से पुरुषसूक्त की 'ऋचः सामानि जज्ञिरे' इत्यादि श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।

'वेद नित्य नहीं हैं' वेदान्तियों के इस कथन से यह प्रतीत होता है कि नैयायिका-भिमत त्रिक्षणावस्थायित्व भी उन्हें अनुमत होना चाहिये। इस शङ्का के निरसनार्थ 'नापि०' आदि ग्रन्थ से ग्रन्थकार बताते हैं कि 'मीमांसकों का अभिमत 'वेदनित्यत्व' जैसे हमें सम्मत नहीं वैसे ही नैयायिकसम्मत 'अनित्यत्व' भी हमें मान्य नहीं।

नापि वेदानां त्रिक्षणावस्थायित्वम् । य एव वेदो देवदत्तेनाधीतः; स एव¹ वेदो मयाऽधीत इत्यादिप्रत्यभिज्ञा-विरोधात् । अत एव गकारादि-वर्णानामपि न क्षणिकत्वं, सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधात् ।

अर्थ— वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व भी नहीं है। क्योंकि जिस वेद को देवदत्त ने पढा, उसको मैंने भी पढ़ा' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है। इसी कारण


१. 'मयापीत्या'—इति पाठान्तरम् ।