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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

वेदनित्यतादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६१

गकारादि-वर्णों को भी क्षणिकत्व नहीं है, क्योंकि 'वही यह गकार' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है ।

विवरण—वर्णों के समुदायरूप वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व ( क्षणिकत्व ) नहीं है । जो वस्तु क्षणिक होती है वह तीन क्षण ( उत्पत्ति का एक क्षण, स्थिति का दूसरा क्षण, नाश का तीसरा क्षण ) ही रहती है । नैयायिक लोग ऐसी वस्तु को क्षणिक, अनित्य आदि कहते हैं । वर्ण-समुदायरूप वेद में स्वरूपतः ऐसा क्षणिकत्व नहीं रहता, क्योंकि कल्प के आरंभ में जो वेद था वही मध्यकाल में एवं वर्तमान काल में भी है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों के मतानुसार उनमें त्रिक्षणावस्थायित्वरूप क्षणिकत्व रहता है, परन्तु ऐसा मानने पर उस प्रत्यभिज्ञा से विरोध आता है । इसलिये वर्णसमुदायगर्भ वेदों को स्वरूपतःक्षणिक स्वीकार नहीं किया जा सकता । 'अत एव' इत्यादि ग्रन्थ से वर्णों के द्वारा भी उनमें क्षणिकत्व नहीं है—बताया है । जब कि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध होने के कारण पदादि समुदायगर्भ वेद में क्षणिकत्व नहीं होता । इसी कारण 'देवदत्त से उच्चारित जो गकार है वही यह है' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आने के कारण वर्णों में भी क्षणिकत्व नहीं होता । एवंच नैयायिकाभिमत-त्रिक्षणावस्थायित्वस्वरूप क्षणिकत्व नहीं है ।

शंका—वर्णसमुदाययुक्त वेदों में वर्णों में भी यदि क्षणिकत्व नहीं तो आपके मत में वेदों में उत्पत्तिमत्त्व और उस कारण अनित्यत्व किस प्रकार है ? उत्तर देते हैं—

तथा च वर्ण-पद-वाक्यसमुदाय^१स्य वेदस्य वियदादिवत् सृष्टिकालीनोत्पत्ति^२मत्त्वं प्रलयकालीनध्वंस-प्रतियोगित्वं च । न तु मध्ये वर्णानामुत्पत्ति-विनाशौ, अनन्तगकारकपने^३ गौरवात् । अनुच्चारण-दशायां वर्णानामनभिव्यक्तिस्तदुच्चारणरूप-व्यञ्जकाभावान्न विरुध्यते । अन्धकारस्थ^४ले घटानुपलम्भवत् । उत्पन्नो गकार^५ इत्यादिप्रत्ययः सोऽयं गकार^६ इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधादप्रमाणम्, वर्णाभिव्य^७क्ति-जनकध्वनिगतोत्पत्ति-निरूपित-परम्परासम्बन्ध-विषयत्वेन प्रमाणं वा । तस्मान्न वेदानां क्षणिकत्वम् ।

अर्थ—वेदों में स्वरूपतः एवं वर्णद्वारा भी क्षणिकत्व नहीं है यह सिद्ध होने पर


१. 'रूपस्य'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्तिकत्वं'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'ल्पनायां-इति पाठान्तरम् ।
४. 'स्थघ'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'इति प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'इत्यादि'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'व्यंजकध्व' इति पाठान्तरम् ।