वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६२ | वेदान्तपरिभाषा | [वेदनित्यत्ववादिविचारः |
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वर्णसमुदाय, पदसमुदाय और वाक्यसमुदाय रूप वेदों में आकाश आदि के समान् सृष्टि-कालीन उत्पत्तिकामत्त्व और प्रलयकालीन ध्वंस का प्रतियोगित्व है। बीच में ही वर्णों की उत्पत्ति और विनाश नहीं होते, क्योंकि अनंत गकारों की कल्पना करने में गौरव होता है।
वर्णों की अनुच्चारण दशा में (जब कि उनका उच्चारण नहीं किया जाता) उनकी (वर्णों की) अभिव्यक्ति न होने में कारण, उच्चारणरूप व्यंजक का अभाव ही है। अतः अनुच्चारित दशा में उनकी अभिव्यक्ति न होने में कोई विरोध नहीं है। अन्धकार स्थल में (जहाँ गाढ़ अन्धकार हो वहाँ) विद्यमान भी घट, अभिव्यंजक न होने से जैसे नहीं दिखाई देता उसी प्रकार वर्णों के अभिव्यंजक उच्चारण के अभाव से विद्यमान वर्ण भी अभिव्यक्त नहीं होते। अभी 'गकार उत्पन्न हुआ' आदि जो प्रत्यय होता है, वह 'वही यह गकार' इस प्रत्यभिज्ञा के विरोध के कारण अप्रमाण है। अथवा वर्णों की अभिव्यक्ति की जनक जो ध्वनिगत उत्पत्ति, उससे निरूपित हुए परम्परा सम्बन्ध के विषयत्वेन (विषयरूप में) वह प्रत्यय प्रमाण है। तस्मात् वेद, क्षणिक नहीं हैं।
विवरण—'तथा च'--'वेदों में स्वरूपतः एवं वर्णतः भी क्षणिकत्व के सिद्ध न होने पर आकाश-वायु आदि इतर भूत-भौतिक पदार्थों के समान सृष्टिकाल में उत्पन्न होना और प्रलयकाल में ध्वंस को प्राप्त होना आदि उनके धर्म हैं अर्थात् आकाशादिकों के समान सृष्टि के समय वे उत्पन्न होते हैं और प्रलयकाल में नष्ट होते हैं, स्थितिकाल में वे विद्यमान रहते हैं। इस कारण उत्पत्ति एवं प्रलयकाल के बीच वर्णों की उत्पत्ति नाश नहीं होता। क्योंकि प्रतिक्षण गकारादि वर्ण उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं—
यह मानने पर गकारादि अनन्त वर्णों की कल्पना करनी पड़ती है और ऐसा करने में गौरव होता है।
शंका--यदि वर्ण नित्य हैं तो वे सदैव अभिव्यक्त क्यों नहीं होते? इस आशंका के समाधानार्थ ग्रन्थकार कहते हैं—वर्णों के नित्य होने पर भी जिस समय उनका उच्चारण नहीं किया जाता उस समय वे अभिव्यक्त नहीं होते। क्योंकि उच्चारणरूप अभिव्यंजक का अभाव रहता है। इस कारण वर्णों के नित्य होने पर भी उनके सदैव अभिव्यक्त न होने में कोई दोष नहीं है। अन्धकार में विद्यमान घट, नहीं दीखता, उसका अभिव्यंजक प्रकाश है, बिना उसके घट का दीखना अशक्य है। अन्धकार में न दीखने के कारण वह है ही नहीं—यह नहीं कहा जाता। उसी प्रकार बिना उच्चारण किये वर्णों की अभिव्यक्ति नहीं होने मात्र से वे हैं ही नहीं—यह नहीं कहा जा सकता।
'गकार उत्पन्न हुआ' वह नष्ट हुआ' यह प्रत्यय (अनुभव) होते रहने के कारण, उच्चारण करते ही उनकी उत्पत्ति होना और उच्चारण बन्द करते ही उनका नाश होना आप स्वीकार क्यों नहीं करते? ऐसी शंका उठाकर ग्रन्थकार कहते हैं—