वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदानित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेद. २६३
यह प्रतीति अप्रमाण है। क्योंकि 'वही यह गकार है' इस प्रत्यभिज्ञा के साथ उसका विरोध है। अथवा वर्णों की अभिव्यक्ति को उत्पन्न करने वाली ध्वनि की उत्पत्ति से ज्ञात होने वाले 'स्वाश्रयध्वन्यभिव्यंग्यत्व' रूप परम्परासम्बन्ध से वैसा प्रत्यय होने के कारणपरम्परासम्बन्धविषयत्वेन वह प्रत्यय प्रमाण है—यह मानना चाहिए। 'काला घट नष्ट हुआ और लाल घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार की एक ही घट में गुण के सम्बन्ध से प्रतीति होती है, उसी प्रकार वर्ण की अभिव्यक्ति करने वाली ध्वनि की उत्पत्ति से वर्णों की उत्पत्ति का परंपरा-सम्बन्ध ज्ञात होता है। इस कारण उस उत्पत्ति प्रत्यय को साक्षात् प्रमाण न मानकर परंपरा-सम्बन्ध-विषयत्वेन आप चाहें तो प्रमाण मान लें। अतः वेदों में क्षणिकता नहीं है—यह सिद्ध हुआ। क्योंकि वे प्रतिक्षण में उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होते, किन्तु सृष्टिकाल में आकाश आदि इतर पदार्थों के समान उत्पन्न होते हैं और प्रलयकाल में ही नाश को प्राप्त होते हैं। 'स्वाश्रयध्वन्यभिव्यंग्यत्व' का अर्थ है स्वोत्पत्ति का आश्रय जो ध्वनि, उसका विषयत्व—ध्वनिरूप अभिव्यंजक के द्वारा अभिव्यक्त होना। ध्वनि की उत्पत्ति से वर्ण व्यक्त होते हैं।
सिद्धान्ती के इस समाधान पर मीमांसक अपसिद्धान्त की शंका करते हैं—
ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादि-प्रपञ्चवदुत्पत्तिमत्वेन परमेश्वर-कर्तृकतया पौरुषेयत्वाद^१पौरुषेयत्वं^२ च वेदानामिति तव^३ सिद्धान्तौ भज्येतेति चेत् । न । न हि^४ तावत्पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं पौरुषेयत्वम् । गुरुमतेऽपि अध्यापक-परम्परया पौरुषेयत्वापत्तेः । नापि पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वं^५ पौरुषेयत्वम् । नैयायिकाभिमतपौरुषेयत्वानुमानेऽस्मदादिना सिद्धसाधनत्वापत्तेः^६ । किन्तु सजातीयोच्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वम्^७ ।
अर्थ—वेदों के क्षणिक न होने पर भी आकाशादि प्रपंच के समान उनमें उत्पत्तिमत्त्व होने से और वह उत्पत्ति परमेश्वरकर्तृक होने से (उनका कर्त्ता परमेश्वर होने से) पौरुषेयत्व है। इस कारण वेदों के अपौरुषेयत्व का आपका सिद्धान्त भग्न होगा। यह यदि मीमांसक कहे तो उचित नहीं है। क्योंकि पुरुष के द्वारा उच्चारण किया जाना ही पौरुषेयत्व नहीं है। क्योंकि वैसा मानने पर गुरुमत में भी अध्यापक परम्परा से
१. 'त्वसिद्धाव'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'वेदा०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'अपि'—इति पाठान्तरम् ।
४. हिपुरु०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'त्वं नैया०'—इति पाठान्तरम् ।
६. 'नापत्ते०'—इति पाठान्तरम् ।
७. 'त्वं पौरुषेयत्वम्'—