वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ वेदान्तपरिभाषा [वेदनित्यत्वादिविचारः
पौरुषेयत्व की प्राप्ति होने लगेगी। इसी प्रकार 'जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन है'—वह पौरुषेय है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नैयायिकों से सम्मत पौरुषेयत्व के अनुमान पर हम वेदान्तियों के द्वारा 'सिद्ध-साधनता' दोष दिया जाता है। इसलिये 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण का विषय होना' ही पौरुषेयत्व है।
**विवरण—**वेदान्ती के पूर्वोक्त सिद्धान्त पर मीमांसक कहता है—'तुम्हारे मत में भले ही वेदों में क्षणिकत्व न हो तथापि आकाशादि इतर प्रपंच के समान उत्पत्तिमत्त्व है। और उसकी उत्पत्ति करनेवाला परमेश्वर है, इस कारण वेदों में पौरुषेयत्व (पुरुष-कर्तृत्व) है। ऐसा तुम्हारे सिद्धान्त के ही विरुद्ध सिद्ध होता है। क्योंकि तुम्हारा वेदापौरुषेयत्व का सिद्धान्त ईश्वर-कर्तृत्व के कारण बाधित हो जाता है।
परन्तु वेदान्ती कहता है—हमारे मत में भले ही वेद पैदा हुए हों तथापि पौरुषेयत्व न होने से अपसिद्धान्त नहीं हो पाता। हमारे मत पर मीमांसक जो पौरुषेयत्व का दोष देते हैं वह कैसे पौरुषेयत्व को मानकर ? क्या पुरुष के द्वारा उच्चारण किया जाना पौरुषेयत्व है, या पुरुष के अधीन वेदोत्पत्ति का होना पौरुषेयत्व है ? प्रथम पक्ष में मौनी पुरुष के श्लोक को भी अपौरुषेय कहने का प्रसंग प्राप्त होगा। क्योंकि जिसने मौन व्रत धारण किया हो वह अपने श्लोक को मुख से बोलता नहीं किन्तु लिखकर दिखाता है। उच्चारण न करने के कारण आपके लक्षण के अनुसार उसे अपौरुषेय कहना होगा। इसके अतिरिक्त गुरुमत में भी अध्यापक परम्परा से वेदों को पौरुषेय कहना होगा। क्योंकि उनके मत में अध्यापकों की परम्परा से ही वेदों का उच्चारण किया जाता है।
अस्तु, 'पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं' पौरुषेयत्वम्-इस प्रथम लक्षण को स्वीकार न कर 'पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वम्'—जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन होती है, वह पौरुषेय—इस द्वितीय लक्षण को यदि मानें तो उस पर सिद्धसाधन दोष आता है।
नैयायिक--'वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वात् भारतादिवत्'—वेद पौरुषेय हैं, क्योंकि वे वाक्य हैं, भारतादिकों के तुल्य। ऐसा अनुमान कर वेदों का पौरुषेयत्व साधन करते हैं। परन्तु हम तथा अन्य कुछ वादी भी नैयायिक संमत अनुमान के द्वारा ही स्वीकृत पौरुषेयत्व को साधन करते हैं। इस कारण उनके पौरुषेयत्वानुमान पर सिद्धसाधनता दोष आता है।
वेदान्तियों को कैसा पौरुषेयत्व मान्य है ? जिसके घटित न होने के कारण वेदों के उत्पत्तिमन् होने पर भी अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाता है ? इस शंका से प्रेरित होकर ग्रन्थकार 'किन्तु' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं। 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती—ऐसे उच्चारण का विषय होना ही हमारे मत में पौरुषेयत्व है। भारतादि ग्रंथों के उच्चारण में पूर्व सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती। किन्तु