वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदानित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६५
परमेश्वर सृष्टि के प्रारम्भ में सजातीय उच्चारण की अपेक्षा से ही वेदों का उच्चारण करता है इसलिए उन्हें अपौरुषेयत्व है । इसी सिद्धान्त को और अधिक स्पष्ट करते हैं ।
तथा च सर्गाद्यकाले परमेश्वरः १पूर्वसर्ग-सिद्धि-वेदानुपूर्वीसमानानु-पूर्वीकं वेदं विरचितवान् , न तु तद्विजातीयं२ वेदमिति न सजातीयो-च्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वं पौरुषेयत्वं३ वेदानाम् । भारतादीनां४ तु सजातीयोच्चारणमनपेक्ष्यैवोच्चारणमिति तेषां पौरुषेयत्वम् : एवं पौरुषेयापौरुषेय-भेदेनागमो द्विधा५ निरूपितः ।
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
आगमपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ४ ॥
अर्थ— ऐसा होने से परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में पूर्वसर्ग के समय वेदों की सिद्धि आनुपूर्वी के समान ही जिसकी आनुपूर्वी है ऐसे वेद की रचना की । उस आनुपूर्वी से भिन्न ( विजातीय ) विलक्षण आनुपूर्वीवाले वेद की रचना उसने नहीं की । अतः उसमें ( वेदमें ) सजातीय उच्चारण की अपेक्षा जिसे नहीं ऐसे उच्चारण का विषयत्व नहीं है । और भारतादि पौरुषेय ग्रन्थों का उच्चारण, सजातीय उच्चारण की बिना अपेक्षा किए ही होती है अतः उनमें पौरुषेयत्व है । इस प्रकार पौरुषेय अपौरुषेय भेद से आगम दो प्रकार का है । यह । यह हमने इस प्रकरण में निरूपण किया ।
विवरण— उपर्युक्त प्रकार का पौरुषेयत्व होने से वेदों में पौरुषेयत्व नहीं है । क्योंकि आद्यसृष्टि के समय परमेश्वर ने पूर्वकल्पसिद्ध अनुक्रम के अनुसार ही जिसका अनुक्रम है ऐसे वेद को रचा । भिन्न अनुक्रम से वेद की रचना नहीं की । पूर्वकल्प में वह जैसा था वैसा ही रचा, उसमें एक अक्षर का भी परिवर्तन नहीं किया गया । इसी कारण उसमें पौरुषेयत्व नहीं है किन्तु सजातीय उच्चारण की जिन्हें अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण किये जाने वाले अर्थात् विजातीय आनुपूर्वीवाले ग्रंथ ही पौरुषेय होते हैं - महाभारतादि ग्रन्थों में पूर्वकल्प का सजातीय उच्चारण नहीं रहता इसलिए वे पौरुषेय हैं । इस प्रकार चतुर्थ आगम नामक प्रमाण पौरुषेय एवं अपौरुषेय भेद से दो प्रकार का होता है । उसका हमने यहाँ सविस्तर निरूपण किया ।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे
आगम-परिच्छेदः समाप्तः ।
—: ० :—
| १. 'वंसिद्ध'-इति पाठान्तरम् । | २. 'यमिति'-इति पाठान्तरम् । |
| ३. 'त्वम्'-इति पाठान्तरम् । | ४. 'नां स'-इति पाठान्तरम् । |
| ४. विधो'-इति पाठान्तरम् । |