भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 482 में से

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पृष्ठ 324

अथार्थापत्तिपरिच्छेदः ५

इस प्रकार आगम प्रमाण का निरूपण कर अब क्रमप्राप्त अर्थापत्तिसंज्ञक पंचम प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं—

इदानीमर्थापत्तिर्निरूप्यते । तत्रोपपाद्यज्ञानेनोपपादक-कल्पनमर्थापत्तिः । तत्रोपपाद्यज्ञानं करणम् । उपपादक ज्ञानं फलम् । येन विना यदनुपपन्नं तत्तत्रोपपाद्यम्, यस्याभावे यस्यानुपपत्तिस्तत्तत्रोपपादकम् । यथा रात्रिभोजनेन विना दिवाऽभुञ्जानस्य पीनत्वमनुपपन्नमिति तादृशपीनत्वस्यानुपपत्तिरिति रात्रिभोजनमुपपादकम् ।

**अर्थ—**अब अर्थापत्ति प्रमाण का निरूपण किया जाता है । तत्रेति—उस प्रमाणरूप अर्थापत्ति में उपपाद्य ( कार्य ) के ज्ञान से उपपादक ( कारण ) की कल्पना ( ज्ञान ) ही अर्थापत्ति प्रमा है । इन दो ज्ञानों में से—उपपाद्य ज्ञान प्रमाण ( कारण, साधन ) है और उपपादक का ज्ञान प्रमा ( फल ) है । जिसके बिना जो अनुपपन्न होता है वह उपपाद्य, और जिसके अभाव में जिसकी अनुपपत्ति होती है वह वहां उपपादक होता है । जैसे—रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करने वाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न ( असंभव ) है, इस कारण वैसा पीनत्व ( पुष्टत्व ) उपपाद्य है, और रात्रिभोजन के अभाव में जैसे पीनत्व ( पुष्टि ) की अनुपपत्ति ( असंभव ) है, इस कारण रात्रि-भोजन उस पुष्टि का उपपादक है ।

**विवरण—**कदाचित् कोई दांभिक पुरुष दिन में भोजन नहीं करता किन्तु उसका शरीर पुष्ट दीखता है। परन्तु भोजन के बिना ऐसी पुष्टि असंभव है । इससे यह निश्चित है कि वह पुरुष रात्रि में अवश्य ही भोजन करता होगा । इस प्रकार पीनत्व रूप कार्य से रात्रि-भोजन रूप कारण की कल्पना की जाती है यही अर्थापत्ति प्रमा है । इस प्रमा के प्रमाण को भी अर्थापत्ति ही कहते हैं । सारांश यह है कि एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का भी वाचक है । इस अर्थापत्ति को ही शास्त्रीय ग्रन्थों में 'अन्यथानुपपत्ति' शब्द से भी कहते हैं । किसी अन्य प्रकार से कार्य की उपपत्ति न हो सकने से जो कारण की कल्पना की जाती है, वह ज्ञान कार्य के ज्ञान से ही होता है । इस कल्पक ज्ञान को ही उपपाद्य ( उपपन्न होने योग्य ) ज्ञान कहते हैं । इसलिये वह उपपाद्य ( अर्थापत्ति ) का करण है । जिसके कारण उपपाद्य की उपपत्ति लगती है वह रात्रि-भोजनादि का ज्ञान, उपपादक ( उपपत्ति बतानेवाला ) है । तस्मात् कार्यज्ञान के अनन्तर उसकी अन्यथा ( अन्य प्रकार से ) उपपत्ति न लग सकने के कारण उसके उचित