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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 482 में से

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पृष्ठ 325

प्रमा-प्रमाणयोरर्थापत्तिशब्दः ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २६७

कारण की कल्पना करना ही अर्थापत्ति है। और उपपाद्य का ( कल्पक का ) ज्ञान उसका कारण होने से ही वह अर्थापत्ति प्रमाण है। 'येन विना०' इत्यादि ग्रन्थ से उपपाद्य और उपपादक के लक्षण बताये हैं। 'येन विना०' इस वाक्य के प्रथम 'तत्' शब्द से 'यदनुपपन्नं', के प्रथमान्त 'यत्' शब्द-वाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है, और 'तत्र' इस पद से 'येन विना' के यत् शब्दवाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है। जिसके बिना जिसकी अनुपपत्ति ( अयोग्यरूप से प्रतीति ) होती है वह उपपाद्य कहा जाता है। जैसे रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न होता है, अर्थात् अयोग्यत्वेन प्रतीत होता है। ऐसे पुरुष का शरीर पुष्ट रहना संभव नहीं, इसलिये वह पीनत्व, उपपाद्य है। इसीलिये 'उपपादकाभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्व' रूप लक्षण भी यहाँ कहा गया है। प्रकृत स्थल में 'पीनत्व' उपपाद्य है और रात्रि-भोजन' उपपादक है। उपपाद्यरूप पीनत्व का अभाव, उपपादकरूप रात्रि-भोजन के अभाव का व्यापकीभूत ( व्यापक ) है, अर्थात् जहाँ-जहाँ भोजन का अभाव रहता है वहाँ-वहाँ निश्चय से ( नियमेन ) पीनत्व का भी अभाव रहता है। भोजन के बिना पुष्ट का होना कभी संभव नहीं। अर्थादेव ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगी पीनत्व है, अतः उपपाद्य-लक्षण का 'पीनत्व' रूप लक्ष्य में समन्वय हो जाता है।

इसी प्रकार 'यस्याभावे०' इस वाक्य से उपपादक का लक्षण बताया है। पूर्ववत् यहाँ यत्-तत् शब्दों का व्युत्क्रम ( उलटा क्रम ) नहीं है। प्रथम 'यस्य' इस शब्द से जिस अर्थ का कथन किया है, उसी का प्रथमान्त 'तत्' शब्द से निर्देश किया है। दिन में भोजन न करने वाले पुरुष के पीनत्व की जिस रात्रि-भोजन के अभाव में अनुपपत्ति होती है, वह रात्रि-भोजन उपपादक है। इस कारण 'उपपाद्याभावव्याप्याभावप्रतियोगित्व' यह उपपादक का लक्षण सिद्ध होता है। उपपाद्य का अभाव उपपादक के अभाव का व्यापक होता है। अर्थात् उपपाद्याभाव व्यापक और उपपादकाभाव व्याप्य होता है; पीनत्व के अभाव का व्याप्य जो रात्रि-भोजन का अभाव, उसका रात्रि-भोजन प्रतियोगी है। सारांश यह है कि कल्पकज्ञान उपपाद्य होता है और कल्प्यज्ञान उपपादक होता है—यह कल्पना अनुपपत्तिमूलक है। एक ही अर्थापत्तिशब्द प्रमा और प्रमाण दोनों का वाचक कैसे होता है? उत्तर देते हैं—

रात्रिभोजन-कल्पना-रूपायां प्रमितावर्थस्यापत्तिः कल्पनेति षष्ठीसमासेन अर्थापत्तिशब्दो वर्तते, कल्पनाकरणे पीनत्वादिज्ञाने त्वर्थस्यापत्तिः कल्पना यस्मादिति बहुव्रीहि समासेन वर्तते इति फलकरणयोरुभयोस्तत्पदप्रयोगः।


१. षष्ठीसमासबहुव्रीहिभ्यां फलरूपाप्रमाण ( करण ) रूपा च अर्थापत्तिरिति तात्पर्यम्।