वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६८ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तिद्वैविध्यम् ] |
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अर्थ—अर्थ (पदार्थ) की आपत्ति (कल्पना) इस षष्ठी तत्पुरुष समास से 'अर्थापत्ति' शब्द, रात्रि-भोजनकल्पनारूप प्रमा अर्थ में रहता है और जिससे पदार्थ की कल्पना होती है—वह अर्थापत्ति प्रमाण, इस बहुव्रीहि समास से अर्थापत्ति शब्द, उस कल्पना के साधनभूत पीनत्वादिज्ञानरूप अर्थ में रहता है। इस कारण प्रमा और प्रमाण दोनों अर्थों में 'अर्थापत्ति' संज्ञक एक ही शब्द का प्रयोग होता है।
विवरण—शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त यदि एक ही हो तो एक शब्द, दो अर्थों का वाचक नहीं होगा। प्रकृत में प्रमा एवं प्रमाण अर्थ में अर्थापत्ति शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त भिन्न-भिन्न है। 'अर्थस्य आपत्तिः अर्थापत्तिः' ऐसा—षष्ठीतत्पुरुष समास करने पर अर्थापत्ति शब्द का 'कल्पना' अर्थ होने से अर्थापत्ति का 'प्रमा' अर्थ होता है। और उसी शब्द की 'अर्थस्य आपत्तिः यस्मात् तत्' बहुव्रीहि समास से व्युत्पत्ति यदि मानी जाय तो अर्थापत्ति का 'प्रमाण' अर्थ होता है। इस प्रकार प्रवृत्ति-निमित्त का भेद होने से एक ही अर्थापत्ति शब्द के 'प्रमा और प्रमाण' ये दो अर्थ हो सकते हैं।
इस प्रकार अर्थापत्ति प्रमा और प्रमाण का लक्षण बताकर अब उसके भेद को बताते हैं।
सा¹ चार्थापत्तिर्द्विविधा—दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति। तत्र दृष्टार्थापत्तिर्यथा—इदं रजतमिति पुरोवर्तिनि प्रतिपन्नस्य रजतस्य नेदं रजतमिति तत्रैव ²निषिध्यमानत्वं सत्यत्वेऽनुपपन्नमिति रजतस्य सद्विविक्तत्वं सत्यत्व-त्यन्ताभाववत्त्वं वा मिथ्यात्वं कल्पयतीति³।
अर्थ—और वह अर्थापत्ति दो प्रकार की है। दृष्टार्थापत्ति और श्रुतार्थापत्ति। उनमें से दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण जैसे—'यह रजत है' इस प्रकार आगे दीखनेवाली वस्तु में ज्ञात होनेवाले रजत का उसी पदार्थ में 'यह रजत नहीं' यह निषेध (उस रजत में)
१. अर्थापत्तिनिरूपणस्य अद्वैतिनां मते क उपयोगः ? श्लोकवार्तिककाराः कथयन्ति—
स्मृत्या श्रुतिर्या परिकल्प्यतेऽस्मिन् लिङ्गादिभिर्याविनियोजिका च।
फलादिभिर्यत् परिपूरणं च सम्बन्धकृत्तत्र न काचिदस्ति।
तत्सर्वमित्याद्यसमञ्जसं स्यात् न चेदियं स्यादनुमानतोऽन्या॥
इत्थमनुमानात् पृथग्रूपेण स्वीकृतस्य अर्थापत्तिप्रमाणस्य स्मृत्या श्रुतिकल्पनादीनि यानि प्रयोजनानि उक्तानि न तानि अद्वैतिनामसाधारणानि प्रयोजनानि, इति चेत् प्रपञ्चमिथ्या-त्वसिद्धिरेव तत्फलमिति दृष्टार्थापत्त्युदाहरणेन ग्रन्थकारः स्वयं सूचयति।
२. 'प्रतिषिः'—इति पाठान्तरम्।
३. प्रातिभासिकत्वं कल्पयति—इति तात्पर्यम्, परोक्षस्थले परिभाषाकारैः अन्यथा-ख्यातिस्वीकारात् अपरोक्षरजतनिषेध एव प्रातिभासिकत्वसाधकः इति भावः।