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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

२६४ वेदान्तपरिभाषा [वेदनित्यत्वादिविचारः

पौरुषेयत्व की प्राप्ति होने लगेगी। इसी प्रकार 'जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन है'—वह पौरुषेय है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नैयायिकों से सम्मत पौरुषेयत्व के अनुमान पर हम वेदान्तियों के द्वारा 'सिद्ध-साधनता' दोष दिया जाता है। इसलिये 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण का विषय होना' ही पौरुषेयत्व है।

**विवरण—**वेदान्ती के पूर्वोक्त सिद्धान्त पर मीमांसक कहता है—'तुम्हारे मत में भले ही वेदों में क्षणिकत्व न हो तथापि आकाशादि इतर प्रपंच के समान उत्पत्तिमत्त्व है। और उसकी उत्पत्ति करनेवाला परमेश्वर है, इस कारण वेदों में पौरुषेयत्व (पुरुष-कर्तृत्व) है। ऐसा तुम्हारे सिद्धान्त के ही विरुद्ध सिद्ध होता है। क्योंकि तुम्हारा वेदापौरुषेयत्व का सिद्धान्त ईश्वर-कर्तृत्व के कारण बाधित हो जाता है।

परन्तु वेदान्ती कहता है—हमारे मत में भले ही वेद पैदा हुए हों तथापि पौरुषेयत्व न होने से अपसिद्धान्त नहीं हो पाता। हमारे मत पर मीमांसक जो पौरुषेयत्व का दोष देते हैं वह कैसे पौरुषेयत्व को मानकर ? क्या पुरुष के द्वारा उच्चारण किया जाना पौरुषेयत्व है, या पुरुष के अधीन वेदोत्पत्ति का होना पौरुषेयत्व है ? प्रथम पक्ष में मौनी पुरुष के श्लोक को भी अपौरुषेय कहने का प्रसंग प्राप्त होगा। क्योंकि जिसने मौन व्रत धारण किया हो वह अपने श्लोक को मुख से बोलता नहीं किन्तु लिखकर दिखाता है। उच्चारण न करने के कारण आपके लक्षण के अनुसार उसे अपौरुषेय कहना होगा। इसके अतिरिक्त गुरुमत में भी अध्यापक परम्परा से वेदों को पौरुषेय कहना होगा। क्योंकि उनके मत में अध्यापकों की परम्परा से ही वेदों का उच्चारण किया जाता है।

अस्तु, 'पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं' पौरुषेयत्वम्-इस प्रथम लक्षण को स्वीकार न कर 'पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वम्'—जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन होती है, वह पौरुषेय—इस द्वितीय लक्षण को यदि मानें तो उस पर सिद्धसाधन दोष आता है।

नैयायिक--'वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वात् भारतादिवत्'—वेद पौरुषेय हैं, क्योंकि वे वाक्य हैं, भारतादिकों के तुल्य। ऐसा अनुमान कर वेदों का पौरुषेयत्व साधन करते हैं। परन्तु हम तथा अन्य कुछ वादी भी नैयायिक संमत अनुमान के द्वारा ही स्वीकृत पौरुषेयत्व को साधन करते हैं। इस कारण उनके पौरुषेयत्वानुमान पर सिद्धसाधनता दोष आता है।

वेदान्तियों को कैसा पौरुषेयत्व मान्य है ? जिसके घटित न होने के कारण वेदों के उत्पत्तिमन् होने पर भी अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाता है ? इस शंका से प्रेरित होकर ग्रन्थकार 'किन्तु' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं। 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती—ऐसे उच्चारण का विषय होना ही हमारे मत में पौरुषेयत्व है। भारतादि ग्रंथों के उच्चारण में पूर्व सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती। किन्तु

वेदानित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६५

परमेश्वर सृष्टि के प्रारम्भ में सजातीय उच्चारण की अपेक्षा से ही वेदों का उच्चारण करता है इसलिए उन्हें अपौरुषेयत्व है । इसी सिद्धान्त को और अधिक स्पष्ट करते हैं ।

तथा च सर्गाद्यकाले परमेश्वरः १पूर्वसर्ग-सिद्धि-वेदानुपूर्वीसमानानु-पूर्वीकं वेदं विरचितवान् , न तु तद्विजातीयं२ वेदमिति न सजातीयो-च्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वं पौरुषेयत्वं३ वेदानाम् । भारतादीनां४ तु सजातीयोच्चारणमनपेक्ष्यैवोच्चारणमिति तेषां पौरुषेयत्वम् : एवं पौरुषेयापौरुषेय-भेदेनागमो द्विधा५ निरूपितः ।

श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
आगमपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ४ ॥

अर्थ— ऐसा होने से परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में पूर्वसर्ग के समय वेदों की सिद्धि आनुपूर्वी के समान ही जिसकी आनुपूर्वी है ऐसे वेद की रचना की । उस आनुपूर्वी से भिन्न ( विजातीय ) विलक्षण आनुपूर्वीवाले वेद की रचना उसने नहीं की । अतः उसमें ( वेदमें ) सजातीय उच्चारण की अपेक्षा जिसे नहीं ऐसे उच्चारण का विषयत्व नहीं है । और भारतादि पौरुषेय ग्रन्थों का उच्चारण, सजातीय उच्चारण की बिना अपेक्षा किए ही होती है अतः उनमें पौरुषेयत्व है । इस प्रकार पौरुषेय अपौरुषेय भेद से आगम दो प्रकार का है । यह । यह हमने इस प्रकरण में निरूपण किया ।

विवरण— उपर्युक्त प्रकार का पौरुषेयत्व होने से वेदों में पौरुषेयत्व नहीं है । क्योंकि आद्यसृष्टि के समय परमेश्वर ने पूर्वकल्पसिद्ध अनुक्रम के अनुसार ही जिसका अनुक्रम है ऐसे वेद को रचा । भिन्न अनुक्रम से वेद की रचना नहीं की । पूर्वकल्प में वह जैसा था वैसा ही रचा, उसमें एक अक्षर का भी परिवर्तन नहीं किया गया । इसी कारण उसमें पौरुषेयत्व नहीं है किन्तु सजातीय उच्चारण की जिन्हें अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण किये जाने वाले अर्थात् विजातीय आनुपूर्वीवाले ग्रंथ ही पौरुषेय होते हैं - महाभारतादि ग्रन्थों में पूर्वकल्प का सजातीय उच्चारण नहीं रहता इसलिए वे पौरुषेय हैं । इस प्रकार चतुर्थ आगम नामक प्रमाण पौरुषेय एवं अपौरुषेय भेद से दो प्रकार का होता है । उसका हमने यहाँ सविस्तर निरूपण किया ।

श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे
आगम-परिच्छेदः समाप्तः ।

—: ० :—


१. 'वंसिद्ध'-इति पाठान्तरम् ।२. 'यमिति'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्वम्'-इति पाठान्तरम् ।४. 'नां स'-इति पाठान्तरम् ।
४. विधो'-इति पाठान्तरम् ।

अथार्थापत्तिपरिच्छेदः ५

इस प्रकार आगम प्रमाण का निरूपण कर अब क्रमप्राप्त अर्थापत्तिसंज्ञक पंचम प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं—

इदानीमर्थापत्तिर्निरूप्यते । तत्रोपपाद्यज्ञानेनोपपादक-कल्पनमर्थापत्तिः । तत्रोपपाद्यज्ञानं करणम् । उपपादक ज्ञानं फलम् । येन विना यदनुपपन्नं तत्तत्रोपपाद्यम्, यस्याभावे यस्यानुपपत्तिस्तत्तत्रोपपादकम् । यथा रात्रिभोजनेन विना दिवाऽभुञ्जानस्य पीनत्वमनुपपन्नमिति तादृशपीनत्वस्यानुपपत्तिरिति रात्रिभोजनमुपपादकम् ।

**अर्थ—**अब अर्थापत्ति प्रमाण का निरूपण किया जाता है । तत्रेति—उस प्रमाणरूप अर्थापत्ति में उपपाद्य ( कार्य ) के ज्ञान से उपपादक ( कारण ) की कल्पना ( ज्ञान ) ही अर्थापत्ति प्रमा है । इन दो ज्ञानों में से—उपपाद्य ज्ञान प्रमाण ( कारण, साधन ) है और उपपादक का ज्ञान प्रमा ( फल ) है । जिसके बिना जो अनुपपन्न होता है वह उपपाद्य, और जिसके अभाव में जिसकी अनुपपत्ति होती है वह वहां उपपादक होता है । जैसे—रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करने वाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न ( असंभव ) है, इस कारण वैसा पीनत्व ( पुष्टत्व ) उपपाद्य है, और रात्रिभोजन के अभाव में जैसे पीनत्व ( पुष्टि ) की अनुपपत्ति ( असंभव ) है, इस कारण रात्रि-भोजन उस पुष्टि का उपपादक है ।

**विवरण—**कदाचित् कोई दांभिक पुरुष दिन में भोजन नहीं करता किन्तु उसका शरीर पुष्ट दीखता है। परन्तु भोजन के बिना ऐसी पुष्टि असंभव है । इससे यह निश्चित है कि वह पुरुष रात्रि में अवश्य ही भोजन करता होगा । इस प्रकार पीनत्व रूप कार्य से रात्रि-भोजन रूप कारण की कल्पना की जाती है यही अर्थापत्ति प्रमा है । इस प्रमा के प्रमाण को भी अर्थापत्ति ही कहते हैं । सारांश यह है कि एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का भी वाचक है । इस अर्थापत्ति को ही शास्त्रीय ग्रन्थों में 'अन्यथानुपपत्ति' शब्द से भी कहते हैं । किसी अन्य प्रकार से कार्य की उपपत्ति न हो सकने से जो कारण की कल्पना की जाती है, वह ज्ञान कार्य के ज्ञान से ही होता है । इस कल्पक ज्ञान को ही उपपाद्य ( उपपन्न होने योग्य ) ज्ञान कहते हैं । इसलिये वह उपपाद्य ( अर्थापत्ति ) का करण है । जिसके कारण उपपाद्य की उपपत्ति लगती है वह रात्रि-भोजनादि का ज्ञान, उपपादक ( उपपत्ति बतानेवाला ) है । तस्मात् कार्यज्ञान के अनन्तर उसकी अन्यथा ( अन्य प्रकार से ) उपपत्ति न लग सकने के कारण उसके उचित

प्रमा-प्रमाणयोरर्थापत्तिशब्दः ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २६७

कारण की कल्पना करना ही अर्थापत्ति है। और उपपाद्य का ( कल्पक का ) ज्ञान उसका कारण होने से ही वह अर्थापत्ति प्रमाण है। 'येन विना०' इत्यादि ग्रन्थ से उपपाद्य और उपपादक के लक्षण बताये हैं। 'येन विना०' इस वाक्य के प्रथम 'तत्' शब्द से 'यदनुपपन्नं', के प्रथमान्त 'यत्' शब्द-वाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है, और 'तत्र' इस पद से 'येन विना' के यत् शब्दवाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है। जिसके बिना जिसकी अनुपपत्ति ( अयोग्यरूप से प्रतीति ) होती है वह उपपाद्य कहा जाता है। जैसे रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न होता है, अर्थात् अयोग्यत्वेन प्रतीत होता है। ऐसे पुरुष का शरीर पुष्ट रहना संभव नहीं, इसलिये वह पीनत्व, उपपाद्य है। इसीलिये 'उपपादकाभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्व' रूप लक्षण भी यहाँ कहा गया है। प्रकृत स्थल में 'पीनत्व' उपपाद्य है और रात्रि-भोजन' उपपादक है। उपपाद्यरूप पीनत्व का अभाव, उपपादकरूप रात्रि-भोजन के अभाव का व्यापकीभूत ( व्यापक ) है, अर्थात् जहाँ-जहाँ भोजन का अभाव रहता है वहाँ-वहाँ निश्चय से ( नियमेन ) पीनत्व का भी अभाव रहता है। भोजन के बिना पुष्ट का होना कभी संभव नहीं। अर्थादेव ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगी पीनत्व है, अतः उपपाद्य-लक्षण का 'पीनत्व' रूप लक्ष्य में समन्वय हो जाता है।

इसी प्रकार 'यस्याभावे०' इस वाक्य से उपपादक का लक्षण बताया है। पूर्ववत् यहाँ यत्-तत् शब्दों का व्युत्क्रम ( उलटा क्रम ) नहीं है। प्रथम 'यस्य' इस शब्द से जिस अर्थ का कथन किया है, उसी का प्रथमान्त 'तत्' शब्द से निर्देश किया है। दिन में भोजन न करने वाले पुरुष के पीनत्व की जिस रात्रि-भोजन के अभाव में अनुपपत्ति होती है, वह रात्रि-भोजन उपपादक है। इस कारण 'उपपाद्याभावव्याप्याभावप्रतियोगित्व' यह उपपादक का लक्षण सिद्ध होता है। उपपाद्य का अभाव उपपादक के अभाव का व्यापक होता है। अर्थात् उपपाद्याभाव व्यापक और उपपादकाभाव व्याप्य होता है; पीनत्व के अभाव का व्याप्य जो रात्रि-भोजन का अभाव, उसका रात्रि-भोजन प्रतियोगी है। सारांश यह है कि कल्पकज्ञान उपपाद्य होता है और कल्प्यज्ञान उपपादक होता है—यह कल्पना अनुपपत्तिमूलक है। एक ही अर्थापत्तिशब्द प्रमा और प्रमाण दोनों का वाचक कैसे होता है? उत्तर देते हैं—

रात्रिभोजन-कल्पना-रूपायां प्रमितावर्थस्यापत्तिः कल्पनेति षष्ठीसमासेन अर्थापत्तिशब्दो वर्तते, कल्पनाकरणे पीनत्वादिज्ञाने त्वर्थस्यापत्तिः कल्पना यस्मादिति बहुव्रीहि समासेन वर्तते इति फलकरणयोरुभयोस्तत्पदप्रयोगः।


१. षष्ठीसमासबहुव्रीहिभ्यां फलरूपाप्रमाण ( करण ) रूपा च अर्थापत्तिरिति तात्पर्यम्।

२६८वेदान्तपरिभाषा[ अर्थापत्तिद्वैविध्यम् ]

अर्थअर्थ (पदार्थ) की आपत्ति (कल्पना) इस षष्ठी तत्पुरुष समास से 'अर्थापत्ति' शब्द, रात्रि-भोजनकल्पनारूप प्रमा अर्थ में रहता है और जिससे पदार्थ की कल्पना होती है—वह अर्थापत्ति प्रमाण, इस बहुव्रीहि समास से अर्थापत्ति शब्द, उस कल्पना के साधनभूत पीनत्वादिज्ञानरूप अर्थ में रहता है। इस कारण प्रमा और प्रमाण दोनों अर्थों में 'अर्थापत्ति' संज्ञक एक ही शब्द का प्रयोग होता है।

विवरण—शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त यदि एक ही हो तो एक शब्द, दो अर्थों का वाचक नहीं होगा। प्रकृत में प्रमा एवं प्रमाण अर्थ में अर्थापत्ति शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त भिन्न-भिन्न है। 'अर्थस्य आपत्तिः अर्थापत्तिः' ऐसा—षष्ठीतत्पुरुष समास करने पर अर्थापत्ति शब्द का 'कल्पना' अर्थ होने से अर्थापत्ति का 'प्रमा' अर्थ होता है। और उसी शब्द की 'अर्थस्य आपत्तिः यस्मात् तत्' बहुव्रीहि समास से व्युत्पत्ति यदि मानी जाय तो अर्थापत्ति का 'प्रमाण' अर्थ होता है। इस प्रकार प्रवृत्ति-निमित्त का भेद होने से एक ही अर्थापत्ति शब्द के 'प्रमा और प्रमाण' ये दो अर्थ हो सकते हैं।

इस प्रकार अर्थापत्ति प्रमा और प्रमाण का लक्षण बताकर अब उसके भेद को बताते हैं।

सा¹ चार्थापत्तिर्द्विविधा—दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति। तत्र दृष्टार्थापत्तिर्यथा—इदं रजतमिति पुरोवर्तिनि प्रतिपन्नस्य रजतस्य नेदं रजतमिति तत्रैव ²निषिध्यमानत्वं सत्यत्वेऽनुपपन्नमिति रजतस्य सद्विविक्तत्वं सत्यत्व-त्यन्ताभाववत्त्वं वा मिथ्यात्वं कल्पयतीति³।

अर्थ—और वह अर्थापत्ति दो प्रकार की है। दृष्टार्थापत्ति और श्रुतार्थापत्ति। उनमें से दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण जैसे—'यह रजत है' इस प्रकार आगे दीखनेवाली वस्तु में ज्ञात होनेवाले रजत का उसी पदार्थ में 'यह रजत नहीं' यह निषेध (उस रजत में)


१. अर्थापत्तिनिरूपणस्य अद्वैतिनां मते क उपयोगः ? श्लोकवार्तिककाराः कथयन्ति—
स्मृत्या श्रुतिर्या परिकल्प्यतेऽस्मिन् लिङ्गादिभिर्याविनियोजिका च।
फलादिभिर्यत् परिपूरणं च सम्बन्धकृत्तत्र न काचिदस्ति।
तत्सर्वमित्याद्यसमञ्जसं स्यात् न चेदियं स्यादनुमानतोऽन्या॥
इत्थमनुमानात् पृथग्रूपेण स्वीकृतस्य अर्थापत्तिप्रमाणस्य स्मृत्या श्रुतिकल्पनादीनि यानि प्रयोजनानि उक्तानि न तानि अद्वैतिनामसाधारणानि प्रयोजनानि, इति चेत् प्रपञ्चमिथ्या-त्वसिद्धिरेव तत्फलमिति दृष्टार्थापत्त्युदाहरणेन ग्रन्थकारः स्वयं सूचयति।
२. 'प्रतिषिः'—इति पाठान्तरम्।
३. प्रातिभासिकत्वं कल्पयति—इति तात्पर्यम्, परोक्षस्थले परिभाषाकारैः अन्यथा-ख्यातिस्वीकारात् अपरोक्षरजतनिषेध एव प्रातिभासिकत्वसाधकः इति भावः।

श्रुतार्थापत्तेरुदाहरणम् ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २६९

सत्यत्व होने पर अनुपपन्न होता है। इस कारण (वह निषेध) उस रजत में सद्भिन्नत्व या सत्यत्वात्यन्ताभाववत्व रूप मिथ्यात्व की कल्पना करा देता है।

विवरण—दृष्टार्थापत्ति¹ एवं श्रुतार्थापत्ति भेद अर्थापत्ति के दो प्रकार हैं। उनमें से जिस अर्थापत्ति का विषय दृष्ट होता है उसे दृष्टार्थापत्ति कहते हैं। जैसे—सामने दीखने वाले पदार्थ का प्रथम 'यह रजत है' ऐसा ज्ञान होता है। परन्तु किसी आप्त के कहने पर अथवा स्वयं वहाँ जाकर उसे हाथ में लेकर देखने के पश्चात् 'यह रजत नहीं है' ऐसा ज्ञान होता है। वास्तव में वह रजत यदि सत् (वस्तुभूत) पदार्थ होता तो उसका निषेध कैसे होता। अतः ऐसी कल्पना की जाती है कि यहाँ पर वास्तव में रजत की सत्ता नहीं अर्थात् रजत सत्य नहीं है। वह सद्भिन्न अर्थात् असत् (मिथ्या) है। अथवा इस रजत में सत्यत्व का अत्यन्ताभाव है। इस प्रकार उसके सत्यत्वात्यन्ताभाव-वत्वरूप मिथ्यात्व की कल्पना की जाती है। यह मिथ्यात्व की कल्पना निषेध के कारण होती है और रजत तथा शुक्ति दोनों विषय दृष्ट हैं। इस कारण रजत की इस मिथ्या-त्वकल्पना को दृष्टार्थापत्ति कहते हैं। इस प्रकार दृष्टार्थापत्ति के कारण रजत के मिथ्यात्व का निश्चय होता है। क्योंकि सत्य-पदार्थ का त्रिकाल में भी निषेध होना सम्भव नहीं।

अब श्रुतार्थापत्ति का लक्षण एवं उदाहरण बताते हैं—

²श्रुतार्थापत्तिर्यथा—³यत्र श्रूयमाणवाक्यस्य स्वार्थानुपपत्तिमू-खेनार्थान्तर-कल्पनम्। यथा 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यत्र श्रुतस्य शोकशब्दवाच्यबन्धजातस्य ज्ञाननिवर्त्यत्वस्यान्यथाऽनुपपत्या बन्धस्य मिथ्यात्वं कल्प्यते।

यथा वा जीवी देवदत्तो गृहे नेति वाक्यश्रवणानन्तरं जीविनो गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वं कल्पयति।

अर्थ--श्रुतार्थापत्ति का उदाहरण इस प्रकार है—जब कि सुनाई देने वाले वाक्य


१. दृष्टेन अर्थेन अदृष्टस्य अर्थस्य आपत्तिः--दृष्टार्थापत्तिः। तदुक्तं श्लोक-वार्त्तिके—

"प्रमाणषट्कविज्ञातो यत्रार्थो नान्यथा भवेत्।
अदृष्टं कल्पयेदन्यं सार्थापत्तिरुदाहृता॥"

अत्र च 'दृष्ट' पदेन शब्देतर प्रमाणजन्यज्ञानविषयो विवक्षितः।

२. एकैव अर्थापत्तिः कथं न स्वीक्रियते ? श्रुतार्थापत्तेः स्वीकारः किमर्थः ? तत्रोच्यते—दृष्टार्थापत्तौ 'अर्थस्यैव' कल्पनम्, श्रुतार्थापत्तौ तु शब्दस्य प्रमाणस्य कल्पनमिति भेदेन विभागः। तदुक्तं श्लोकवार्तिके—"प्रमाणग्राहिणीत्वेन यस्मात् पूर्वविलक्षणा।"इति।

३. 'यत्र' इति पदं नास्ति क्वचित्पुस्तके।

२७० | वेदान्तपरिभाषा | [ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

की स्वार्थानुपपत्ति के द्वारा ( वाक्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण ) अन्य अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है, इसी को श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे— आत्मवेत्ता शोक ( संसार ) से तर जाता है' इस श्रुति में शोक शब्द-वाच्य समस्त बन्धों में बताये हुए ज्ञाननिवर्त्यत्व की अन्यथा उपपत्ति का सम्भव न होने से समस्त बन्धों में मिथ्यात्व की कल्पना की जाती है अथवा 'जीवित देवदत्त घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जीवित पुरुष का घर में न होना उसके बहिःसत्त्व की कल्पना कराता है।

विवरण —सुने हुए वाक्य के मुख्य अर्थ का असम्भव होने पर उस अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये जो अन्य अर्थ की कल्पना की जाती है उसे श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे—'छान्दोग्योपनिषद्' में— 'आत्मवेत्ता पुरुष समस्त शोक को पार कर जाता है' कहा गया है। यहाँ 'शोक' शब्द का अर्थ 'कर्तृत्वादि समस्त बन्ध' है, और ज्ञान से उसकी निवृत्ति होती है, ऐसा श्रुति का आशय है। परन्तु श्रुति का यह अर्थ उपपन्न नहीं होता। क्योंकि किसी वस्तु की निवृत्ति उसके ज्ञान से नहीं हुआ करती। हमें पुस्तक का ज्ञान होने पर वह पुस्तक नष्ट हो जाय—ऐसा अनुभव किसी को नहीं होता। ज्ञान केवल अज्ञान का ही निवर्तक होता है। इसलिये इस श्रुतार्थ की अनुपपत्ति होती है। अतः उसकी उपपत्ति लगाने के लिये समस्त बन्ध, ज्ञान-निवर्त्य हैं, ( ज्ञान से नष्ट होने योग्य हैं) यह सिद्ध करने के लिये 'बन्ध' अज्ञानमूलक है, (शुक्ति-रजतादि के समान वास्तव में न होकर अज्ञान से ही भासित होता है) ऐसी कल्पना करनी पड़ती है। यही श्रुतार्थापत्ति है। इस रीति से आत्मा के दुःखित्वादि को मिथ्या सिद्ध करना ही अर्थापत्ति-प्रमाण का उपयोग है।

इस प्रकार वेदान्तोपयोगी उदाहरण बताकर 'यथा वा०' इत्यादि वाक्य से लौकिक उदाहरण बताया है। 'देवदत्त जीवित है किन्तु घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जो पुरुष घर में नहीं और घर के बाहर भी नहीं उसका जीवित रहना सम्भव नहीं। इस कारण अर्थात् ऐसी कल्पना करनी पड़ती है कि वह जीवित होते हुए जब घर में नहीं है तब वह बाहर होना ही चाहिये। इस प्रकार कल्पना करना भी श्रुतार्थापत्ति का ही उदाहरण है। इस रीति से श्रुति ( शब्द से ज्ञान होने वाले ) अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये उसके उपपादक ( उपोद्वलक ) अन्य अर्थ की कल्पना करना ही श्रुतार्थापत्ति कही जाती है।

इसी श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेदों को बताते हैं—

श्रुतार्थापत्तिश्च द्विविधा—^१अभिधानानुपपत्तिरभिहितानुपपत्तिश्च। तत्र, यत्र वाक्यैकदेश-श्रवणेऽन्वयाभिधानानुपपत्त्याऽन्वयाभिधानोप-


^१. अभिधानानुपपत्तिः—तात्पर्यानुपपत्तिः, तात्पर्यविषयीभूतस्य अन्वयस्यानुपपत्तिरित्यर्थः। अभिहितानुपपत्तिः—वाक्यप्रतिपाद्यस्य अर्थस्य अनुपपत्तिः।

श्रुतार्थापत्तिद्वैविध्य ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७१

योपि पदान्तरं कल्प्यते तत्राभिधानानुपपत्तिः । यथा द्वारमित्यत्र ‘पिधेहि’ इत्यध्याहारः, यथा वा ‘विश्वजिता यजेत’ इत्यत्र ‘स्वर्ग-काम’ इति$^१$ पदाध्याहारः ।

**अर्थ—**श्रुतार्थानुपपत्ति के दो भेद होते हैं—एक अभिधानानुपपत्ति और दूसरी अभिहितानुपपत्ति । उनमें से जब हम वाक्य का एक देश ( एक भाग ) सुन लेते हैं, किन्तु उस एक पद के या कुछ भाग के अन्वय की अनुपपत्ति होने पर उस पद के साथ अन्वित होने योग्य किसी दूसरे पद की कल्पना ( अध्याहार ) करते हैं, उसे अभिधानानुपपत्ति कहते हैं । जैसे—हम 'द्वारम्' कपाट शब्द को सुनकर ( उसके अन्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ) 'पिधेहि' ( लगा दो ) पद का अध्याहार करते हैं, या 'विश्वजित् याग करे' इस विधि के श्रवण करने पर ( उस याग का फलत्व सिद्ध करने के लिए ) 'स्वर्गकाम' ( स्वर्ग की इच्छा करने वाला ) पद का अध्याहार करते हैं—बस यही अभिधानानुपपत्ति कहलाती है ।

**विवरण—**क्रियावाचक पदों को कारकों की आकांक्षा रहती है, और कारकों को क्रिया की अपेक्षा रहती है बिना उसके केवल क्रियार्थक या कारकार्थक पद, विवक्षित अर्थ को नहीं दिखा सकते । कितनी ही जगह ऐसे पद श्रुत न रहने पर भी वक्ता के तात्पर्यविषयभूत अर्थ की उपपत्ति के लिये उनकी कल्पना करके ही अन्वयबोध कर लेना होता है । ऐसे अध्याहार कल्पना को अभिधानानुपपत्ति रूप अर्थापत्ति कहते हैं । जैसे—किसी कार्य में अत्यन्त व्यग्र हुआ व्यक्ति शीघ्रता के कारण 'द्वार-द्वार' इतना कहकर ही चुप हो जाता है । उस समय वहाँ की सब परिस्थिति देखकर उस वक्ता के तात्पर्यविषयीभूत अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये 'द्वार' इस कर्मवाचक पद को इस समय लगाओ' इस क्रियावाचक पद की ही आकांक्षा है—यह समझकर उस पद का अध्याहार कर उस वाक्य को पूर्ण करते हैं—यही अभिधानानुपपत्ति है ।

इसी अभिधानानुपपत्ति का मीमांसक-संमत वैदिक उदाहरण—'यथा वा०' इस वाक्य से दिखाया है । किसी पुरुष की फलरहित कर्म में प्रवृत्ति नहीं होनी । श्रुति ने 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्-संज्ञक याग करे—ऐसा कर्म का विधान किया है । किन्तु 'वायव्यं श्वेतमालभेत पशुकामः' जिस पशु की कामना हो वह वायु देवता को उद्देश्य-कर श्वेत पशु का आलंभन करे ) इत्यादि विधि के समान प्रत्यक्ष कोई फल नहीं कहा है । इस श्रुत्यर्थ की सफलता के लिये एवं उस याग में पुरुष की प्रवृत्ति कराने के लिये सभी को अभिलषित स्वर्ग-सुख की ही फलत्वेन कल्पना करनी चाहिये । और ऐसे स्वर्गकाम ( स्वर्गेच्छु ) पुरुष को विश्वजित् करना चाहिये—यह उस विधि का अर्थ किया


१. 'इति' पदं नास्ति क्वचित्पुस्तके ।

२७२वेदान्तपरिभाषा[ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

जाता है। यहाँ क्रियावाचक पद की कर्तृवाचक पद के बिना अनुपपत्ति होती है, इसलिये कर्तृवाचक पद का अध्याहार करना पड़ता है। अन्यथा उस विधि की उपपत्ति का संभव नहीं। अन्वय की अनुपपत्ति होने पर 'विश्वजिता' इत्यादि विधिदर्शक पद उपपाद्य हैं। उनसे 'स्वर्गकामः' इस उपपादक पद की कल्पना होती है। अतः प्रकृत स्थल में अर्थापत्ति के लक्षण का समन्वय होता है। इसी प्रकार अन्य भी उपपाद्य और उपपादक को पहचान कर प्रकृत लक्षण का समन्वय कर लेना चाहिये।

इस पर शंका ओर उसका समाधान—

ननु द्वारमित्यादावन्वयाभिधानात्पूर्वमिदमन्वयाभिधानं पिधानोपस्थापक-पदं विनाऽनुपपन्नमिति कथं ज्ञानमितिचेत्। न। अभिधानपदेन करणव्युत्पत्त्या तात्पर्यस्य विवक्षितत्वात्। तथाच द्वारकर्मक-पिधानक्रिया-संसर्गपरत्वं पिधानोपस्थापकपदं विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं तत्रापि सम्भाव्यते।

अर्थ—'द्वारम्' इत्यादि एकदेशरूप वाक्य के उस पद का अन्वय अमुक पद के साथ है इस प्रकार अन्वय का कथन करने से पूर्व उस (द्वार) पद का अन्वयाभिधान, पिधानार्थक पद न होने से ही अनुपपन्न हुआ है, यह आपने कैसे जाना? यदि पूछो तो उचित नहीं है। क्योंकि हमें अभिधानपद से करण-व्युत्पत्ति के द्वारा तात्पर्य अर्थ ही विवक्षित है। इस कारण द्वारकर्मक पिधान क्रिया ही उस वाक्य का अर्थ, पिधानवाचक पद के बिना ही अनुपपन्न हुआ है, यह ज्ञान उस एकदेशरूप वाक्य में भी हो सकता है।

**विवरण—**अभिधान का अर्थ है अन्वय, और उसकी अनुपपत्ति का अर्थ है अन्वय-बोधाभाव—यह अभिधानानुपपत्ति का अर्थ है। प्रथम 'द्वारकर्मक पिधान = जिसमें 'द्वार' कर्म है, ऐसी पिधान क्रिया। इस प्रकार यदि अन्वय-बोध होगा तो वह अन्वयबोध पिधानार्थक पद के अभाव में कैसे हो सकेगा? और अन्वयबोध ही यदि न हो तो अमुक अन्वयबोध की अमुक पद के न होने से अनुपपत्ति हुई है—यह ज्ञान भी कैसे हो सकेगा? और उस ज्ञान का होना यदि सम्भव नहीं तो आप पिधानार्थक पद के बिना इस अन्वय-बोध के अनुपपन्न होने से 'पिधेहि' पद का अध्याहार करने की कल्पना किस पर से करते हैं?

यह शंका ठीक नहीं है। क्योंकि भावे व्युत्पत्ति को स्वीकार कर 'अभिधान' शब्द का अन्वयबोध रूप अर्थ यदि माना जाय तो आपका दिया हुआ दोष हमारे पक्ष में आता है। परन्तु हमने उस अर्थ से 'अभिधान' शब्द का प्रयोग नहीं किया, अपितु 'अभिधीयते अनेन इति अभिधानम्' इस करण व्युत्पत्ति को मानकर 'अभिधानानुपपत्ति' शब्द का प्रयोग किया है। अभिधान शब्द का अर्थ है—तात्पर्य। वक्ता ने जिस तात्पर्य से शब्दोच्चारण

अभिहितानुपपत्तिः ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७३

किया हो उसी तात्पर्यार्थ की अनुपपत्ति होना ही 'अभिधानानुपपत्ति' है। ऐसा कहने के अनन्तर प्रकरण आदि पर से 'द्वारकर्मक विधान' वक्ता के इस तात्पर्य का बोध होता है और यहाँ पिधानार्थक पद का उच्चारण न किया होने से उसकी अनुपपत्ति होती है। अतः इस अनुपपत्ति का परिहार करने के लिये 'पिधेहि' पद का अध्याहार किया जाता है। इस कल्पना को ही अभिधानानुपपत्ति रूप श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। इस अनुपपत्ति का ज्ञान कल्पना से पूर्व ही होता है और प्रकरणादि से पिधानार्थक पद ही वक्ता को अभिप्रेत है—यह ज्ञान होता है। तस्मात् हमारे पक्ष में कोई दोष नहीं है।

अब अभिहितानुपपत्तिरूपश्रुतार्थापत्ति के लक्षणादि बताते हैं—

अभिहितानुपपत्तिस्तु यत्र वाक्यावगतोऽर्थोऽनुपपन्नत्वेन ज्ञातः संन्नर्थान्तरं कल्पयति, तत्र द्रष्टव्या। यथा 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यत्र स्वर्गसाधनत्वस्य क्षणिक-ज्योतिष्टोमयाग-गततयाऽवगतस्यानुपपत्त्या मध्यवर्त्यपूर्वं कल्प्यते।

अर्थ— जहाँ पर वाक्य से ज्ञात हुआ अर्थ अनुपपन्न (प्रमाणान्तरविरुद्ध) है, यह ज्ञात होने पर वाक्य अन्य अर्थ की कल्पना कराता है, वहाँ पर 'अभिहितानुपपत्ति' संज्ञक अर्थापत्ति होती है, ऐसा समझना चाहिये। जैसे—'स्वर्गेच्छु पुरुष ज्योतिष्टोम याग करे' इस वाक्य में क्षणिक ज्योतिष्टोम यागगतत्वेन अवगत हुए स्वर्गसाधनत्व की अनुपपत्ति होने से क्षणिक याग—यह साधन है और स्वर्गप्राप्ति—यह फल है। इनके मध्यवर्ती अपूर्व की कल्पना की जाती है।

विवरण— प्रमाणभूत वाक्य का अर्थ उपपन्न होने के लिये उस वाक्यार्थ से बहिर्भूत अर्थ की कल्पना किये बिना अन्य मार्ग ही नहीं है। क्योंकि बिना उसके उस वाक्यार्थ में पुरुष-प्रवृत्त का होना संभव ही नहीं। अतः ऐसे वाक्य की व्यवस्था लगाने के लिए अन्य (वाक्यार्थ-बहिर्भूत) पदार्थ की कल्पना करनी पड़ती है। यही अभिहितानुपपत्ति है, क्योंकि यहाँ अभिहित (उक्त) अर्थ की अनुपत्ति होती है। जैसे—'स्वर्गेच्छुक पुरुष ज्योतिष्टोम याग करे' इस वाक्य से याग, स्वर्ग का साधन है, ऐसा ज्ञात होता है। परन्तु यह श्रुत्यर्थ ठीक नहीं बैठता, क्योंकि क्रिया क्षणिक होती है और देवता के उद्देश्य से हविःप्रक्षेप रूप क्रिया ही याग है। ज्योतिष्टोम याग क्षणिक है—याग होते ही वह कर्म समाप्त (नष्ट) होता है। और याग के होते ही यजमान स्वर्गस्थ हुआ दिखाई नहीं देता। स्वर्ग का साधन ही यदि ऐसा विनाशी है तो उससे स्वर्ग कैसे साधा जाय? कारण के ही नष्ट होने पर कार्य कैसे होगा? इस कारण श्रुति से बताया हुआ अर्थ (याग, स्वर्ग का साधन है) अनुपपन्न होता है। इसलिये श्रुत्यर्थ की उपपत्ति जिस प्रकार हो ऐसे पदार्थ की कल्पना करनी चाहिये। वह पदार्थ, 'अपूर्व' ही है। यद्यपि याग विनाशी है तथापि

१८ वे० प०

२७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्

वह अपने स्थितिक्षण में ही ( उत्पन्न होते ही ) स्वर्ग के साधनभूत एक विलक्षण अपूर्व ( अदृष्ट ) को उत्पन्न करता है, तब नष्ट होता है। वह 'अपूर्व' याग और स्वर्ग का मध्यवर्ती व्यापार है। उस व्यापार से युक्त हुए याग से कालान्तर में स्वर्गरूप फल प्राप्त हो सकता है। जिससे 'याग स्वर्ग का साधन है' इस श्रुत्यर्थ की अनुपपत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि व्यापार के कारण व्यापारी ( व्यापारवान् ) साधन की अन्यथासिद्धि नहीं होती। इस प्रकार पुरुष के स्वर्गगामित्व की उपपत्ति लगाने के लिए 'आत्मा देह से भिन्न है' ऐसी कल्पना करना भी अभिहितानुपपत्ति है।

इस रीति से श्रुतार्थापत्ति के दो प्रकार बताये गये। परन्तु इस पर नैयायिकों का कहना है कि 'अर्थापत्ति' कोई स्वतन्त्र प्रमाण न होकर अनुमान में ही उसका अन्तर्भाव होता है। प्रमाण तो चार ही हैं—प्रत्यक्ष, २-अनुमान, ३-उपमान और ४-शब्द। 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते'—देवदत्त पुष्ट है, किन्तु वह दिन में भोजन नहीं करता और बिना भोजन के पुष्ट होना सम्भव नहीं, अतः अर्थात् वह रात में भोजन करता होगा। यह कल्पना 'अर्थापत्ति' से मीमांसक लोग करते हैं। परन्तु वास्तव में यहाँ पर रात्रि-भोजन का अनुमान ही किया जाता है। तथाहि—१-देवदत्त रात में भोजन करता है, २-क्योंकि वह दिन में भोजन विना किये भी पुष्ट है, ३-व्यतिरेक से घट के समान जहाँ-जहाँ रात्रिभोजन का अभाव रहता है वहाँ दिन में भोजन न करने पर पीनत्व का भी अभाव रहता है, जैसे—घट दिन में या रात में कभी भी भोजन नहीं करता, तो वह पुष्ट हुआ भी नहीं दिखाई देता। ऐसी व्यतिरेकव्याप्ति से ही अर्थापत्ति चरितार्थ हो जाती है। इस कारण अर्थापत्ति को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं है।

नैयायिक के इस मत का निरसन करने के लिए ग्रंथकार कहते हैं—

न^१ चेयमर्थापत्तिरनुमानेऽन्तर्भवितुमर्हति। अन्वयव्याप्त्यज्ञाने-


१. तार्किकास्तावत् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावमिच्छन्ति, न तस्याः प्रमाणान्तरत्वं स्वीकुर्वन्ति। परं च ते प्रष्टव्याः यत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः व्यतिरेकिणि वा ? अन्वयिनि अन्तर्भावः इति वक्तुं न शक्यम्। यदि बहिः सत्त्व-जीवित्वसमानाधिकरण-गृहासत्त्वयोः अन्वयव्याप्तिज्ञानं स्यात् चेत् अर्थापत्तेः अन्वयिनि अन्तर्भावः स्यात्। किन्तु नास्ति तादृशो व्याप्तिग्रहः। 'न हि चैत्रशरीरे तादृशव्याप्तिग्रहः, तस्य पक्षत्वात्, नापि अन्यत्र, अन्येषां पक्षसमत्वात्। 'न हि पक्षे पक्षसमे वा अन्वयव्याप्तिग्रहः, तत्र साध्यसह-चारस्य अनिश्चयात्। अतः बहिः-सत्त्व-गृहाऽसत्त्वयोः स्वव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्य-रूपान्वयव्याप्तिग्रहो नैव संभवति। व्यतिरेकिणि चेत् अन्तर्भावः, सोऽपि न वक्तुं शक्यः। यतः गृहाऽसत्त्वमात्रं न बहिः सत्त्वस्य अनुमापकम्, मृते बहिः सत्त्वाभाववति गृहासत्त्व-दर्शनेन व्यभिचारात्। जीवित्वविशिष्टन्तु गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वस्य अनुमापकं भवेत्। तच्च

अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७५

नान्वयिन्यन्तर्भावात् । व्यतिरेकिणश्चानुमानत्वं प्रागेव निरस्तम् । अत एवार्थापत्तिस्थलेऽनुमिनोमीति नानुव्यवसायः, किं तु अनेनेदं कल्पयामीति ।

**अर्थ—**इस अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । क्योंकि अन्वय-व्याप्ति का ज्ञान न होने से अन्वयि लिंग (अनुमान) में इसका अन्तर्भाव नहीं होता, और व्यतिरेकी लिंग के अनुमानत्व का तो पहले ही निराकरण कर दिया है । इसी कारण अर्थापत्ति स्थल में 'मैं अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, अपितु 'इससे मैं इसकी कल्पना करता हूँ' ऐसा ही व्यवहार होता है ।

**विवरण—**नैयायिकों से हम ऐसा प्रश्न करते हैं कि 'आप अर्थापत्ति प्रमाण का अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव करना चाहते हैं या व्यतिरेकी-अनुमान में ? अन्वयी-अनुमान में अन्तर्भाव बताना ठीक नहीं, क्योंकि जो दिन में बिना भोजन किये पुष्ट रहता है वह रात्रि-भोजनवान् होता है अर्थात् रात में जीमता है, ऐसे सहचार दर्शन से हीन होने के कारण अन्वयी, लिंग का तो संभव नहीं । प्रत्युत जो पीन (पुष्ट) होता है वह भोजनवान् होता (जीमता) है। इस प्रकार भोजन और पीनत्व में व्याप्ति दीखती है। रात्रिभोजन और पीनत्व में व्याप्ति नहीं है। पीनत्व, भोजन का अनुमापक है और 'दिवा अभोजन'—दिन में भोजन न करना—रात्रि-भोजन का कल्पक है यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि 'दिवा अभोजन' और 'रात्रि-भोजन' में व्याप्ति नहीं है । तस्मात् अन्वयी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव नहीं कर सकते ।

अच्छा तो—'जो-जो रात्रि-भोजनाभाववान् होता है वह दिन में बिना भोजन किये पीनत्वाभाववान् (पुष्ट नहीं) होता है जैसे घट' ऐसी व्यतिरेक व्याप्ति का स्वीकार कर व्यतिरेकी अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव कहें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान अनुमिति में कारण ही नहीं बन सकता, यह पहले कह चुके हैं । साध्याभाव और साधनाभाव के व्याप्तिज्ञान का उपयोग, साधन से साध्य की अनुमिति होने में नहीं हो सकता, यह भी हम पहले बता चुके हैं । तस्मात् व्यतिरेकी अनुमान में भी अर्थापत्ति प्रमाण का अन्तर्भाव नहीं हो सकता । इसलिये अर्थापत्ति को अनुमान से भिन्न एवं स्वतंत्र प्रमाण मानना चाहिये । अनुभव भी इस बात का पोषक है । अर्थापत्ति प्रमाण से जो रात्रिभोजन का ज्ञान होता है वह यदि अनुमान से हुआ होता तो मैं 'रात्रि-भोजन का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय हुआ होता, प्रत्युत 'दिन में बिना भोजन किये पुष्ट दीखनेवाले पुरुष के पीनत्व से उसके रात्रि-भोजनत्व की कल्पना करता


अज्ञाते बहिः सत्त्वे ज्ञातुं न शक्यते । न च अज्ञातो हेतुरनुमापको भवति । एवं च अन्वयिनि व्यतिरेकिणि च अनन्तर्भावात् अर्थापत्तेः अनुमाने अन्तर्भावः न भवति ।

२७६ वेदान्तपरिभाषा [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्

हूँ' इस प्रकार अर्थापत्ति-प्रमाणजन्य ज्ञान का ही अनुभव होता है और वैसा अनुव्यवसाय भी होता है। मनुष्य के ज्ञान का ज्ञापक प्रमाण अनुव्यवसाय ही है। अतः अनुभव के अनुसार 'अर्थापत्ति' संज्ञक पृथक् प्रमाण की कल्पना करनी ही चाहिये।

'इसके बिना यह अनुपपन्न है' यह ज्ञान, व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है या उससे पृथक् है ? दिन में बिना भोजन किये किसी व्यक्ति का पुष्ट होना रात्रि-भोजन के अभाव में असंभव है—इस प्रकार जो अनुपपत्ति का ज्ञान होता है' वह व्यतिरेकव्याप्ति ज्ञान ही है ऐसा यदि आप कहें तो वह योग्य नहीं होगा। क्योंकि यह मानने पर तो हमारे सिद्धान्त को (अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव) स्वीकार किया-सा होगा। इसलिये द्वितीय पक्ष (व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से पृथक् ज्ञान) स्वीकार करें तो उसका निरूपण करना आपको अशक्य है। इस कारण द्वितीय पक्ष का भी स्वीकार आप नहीं कर सकते—इस आशय से से नैयायिक आक्षेप करता है और ग्रन्थकार उसका संक्षेप से समाधान करते हैं—

नन्वर्थापत्तिस्थले इदमनेन विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं करणमित्युक्तं, तत्र किमिदं तेन विनाऽनुपपन्नत्वम् ? । १'तदभावव्यापका२भावप्रतियोगित्वमिति ब्रूमः ।

**अर्थ—**शंका—अर्थापत्ति के स्थल में 'यह इसके बिना अनुपपन्न है' यह ज्ञान करण (साधन) है—ऐसा आपने बताया। किन्तु 'उसके बिना अनुपपन्न होना' क्या है ? तो इसके उत्तर में हम कहते हैं—उस अभाव का व्यापक बना जो अभाव उसका प्रतियोगित्व—अनुपपन्नत्व है।

**विवरण—**किसी वाक्य के प्रसिद्ध अर्थ की अनुपपत्ति हुए बिना उसके भिन्न अर्थ की कल्पना नहीं की जाती इसलिये अर्थापत्तिज्ञान को अर्थापत्ति में आप करण बताते हैं परन्तु उस अनुपपत्ति का स्वरूप, नैयायिक के द्वारा पूछे जाने पर धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते


१. उपपाद्यज्ञानरूपा अर्थापत्तिः इत्युच्यते, तत्र उपपाद्यलक्षणं प्रदर्शयति—'तदभावव्यापकाभावप्रतियोगित्वम्।' अत्र 'तत्' पदमुपपादकत्वेन अभिमतवस्तुपरम्। 'पीनो देवदत्तः' अत्र तत्पदेन उपपादकस्य रात्रिभोजनस्य परिग्रहः, तदभावव्यापकः दिवा अभुञ्जानत्वसमानाधिकरणपीनत्वाऽभावः, तत्प्रतियोगित्वं पीनत्वस्य, इति 'पीनत्वे' उपपाद्यलक्षणसमन्वयः।

एवं 'तदभावव्याप्याभावप्रतियोगित्वमुपपादकत्वम्।' इति उपपादकलक्षणम्। अत्र 'तत्' पदमुपपाद्यत्वेन अभिमततादृशपीनत्वपरम्। तदभावव्याप्यः रात्रिभोजनाभावः, तत्प्रतियोगित्वं रात्रिभोजनस्य इति उपपादके रात्रिभोजने उपपादकलक्षणसमन्वयः।

२. 'कीभूताभा'—इति पाठान्तरम्।

अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम् ] अथोर्पात्तपरिच्छेदः २७७

हैं—अपने अभाव का व्यापक जो अभाव उसका प्रतियोगित्व ही अनुपपत्ति है। जैसे—जहाँ भोजन का अभाव रहता है, वहाँ पीनत्व का भी अभाव रहता है। क्योंकि भोजन नहीं और पुष्टत्व हो—यह कभी संभव नहीं। इसलिये 'पीनत्वाभाव', भोजनाभाव का व्यापक है और 'भोजनाभाव' पीनत्वाभाव का व्याप्त है। इसी प्रकार जहाँ रात्रि-भोजन का अभाव हो वहाँ दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष के पीनत्व का भी अभाव रहता है। दिन में न जीमने वाले पुरुष का पीनत्वाभाव, रात्रि-भोजन का व्यापक है, ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगित्व 'पीनत्व' में होना ही अनुपपन्नत्व है। यही उपपाद्यज्ञान है। देवदत्त में वैसा पीनत्वाभाव नहीं है। किन्तु पीनत्वाभाव का अभाव है—अर्थात् वह पुष्ट है। इसकारण उसमें रात्रि-भोजन का अभाव होना शक्य नहीं। इसलिये पीनत्व, रात्रि-भोजन का उपपाद्य है, अर्थात् रात्रि-भोजनाभाव का व्यापक जो पीनत्वाभाव उसका प्रतियोगी पीनत्व है, इसी ज्ञान को अनुपपत्ति ज्ञान कहते हैं। और इसी के बल पर रात्रि-भोजन की कल्पना होती है इसलिये आपका उपर्युक्त प्रश्न अयोग्य है, क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिरूप अनुपपन्नत्व को न मानकर ही हमें दूसरी उपपत्ति का निरूपण करते बनता है।

'एवमर्थापत्तेर्मानान्तरत्वसिद्धौ व्यतिरेकि नानुमानान्तरम्, पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते इत्यादौ गन्धवत्त्वमितरभेदं विनाऽनुपपन्नमित्यादिज्ञानस्य करणत्वात्। अत एवानुव्यवसायः पृथिव्यामितरभेदं कल्पयामीति^२

श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
अर्थापत्ति-परिच्छेदः समाप्तः ॥ ५ ॥

अर्थ— इस रीति से 'अर्थापत्ति' पृथक् प्रमाण है, यह सिद्ध होने पर दूसरा व्यतिरेकी अनुमान मानने की आवश्यकता नहीं रहती। पृथिवी अन्य पदार्थों से भिन्न है आदि स्थलों में पृथिवी का 'गन्धवत्त्व' इतर भेद के विना अनुपपन्न है। वह पृथिवी से भिन्न पदार्थों में ही हो सकता है, पृथिवी में नहीं। यही ज्ञान कारण है। इसी कारण 'मैं पृथिवी में इतर भेद की कल्पना करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है।


१. तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्य उपपाद्यत्वे सति अर्थापत्तेः व्यतिरेक्यनुमानत्वमेव किं न स्वीक्रियते यतः 'तदभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वस्यैव व्यतिरेक्यनुमानत्वम्' इति पूर्वपक्षे समाधीयते व्यतिरेकिणः अनुमित्यकरणत्वात् नानुमानत्वम् किन्तु अर्थापत्तित्वमेव।

२. 'पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा जलम्'
अत्र पृथिव्यां या इतरभेदप्रमा सा अर्थापत्तिरेव, नानुमितिः। यदि सा अनुमितिः स्यात्, अनुमिनोमीत्यनुव्यवसायः स्यात्, अनुव्यवसायस्यैव ज्ञानसाक्षित्वात्। किन्तु न तथा अनुव्यवसायः। अत्रार्थापत्तित्वसाधक एवानुव्यवसायः।

२७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अर्थापत्तेः प्रमाणान्तरत्वम्

विवरण—'अनेन इदं कल्पयामि' इस अनुव्यवसाय से 'अर्थापत्ति' पृथक् प्रमाण सिद्ध होता है। ऐसा स्वीकार करने पर अन्वयरूप एक ही अनुमान मानने योग्य रहता है। अर्थापत्तिका स्वतंत्र प्रमाण मानने पर 'व्यतिरेकी' नामक अनुमान का दूसरा प्रकार मानने का प्रयोजन ही नहीं रहता। क्योंकि अन्वयी लिंग से ही अनुमित्यात्मक ज्ञान हो जाता है। किन्तु नैयायिक जिसे व्यतिरेकी अनुमान कहते हैं और उससे होने वाले ज्ञान को अनुमिति ज्ञान समझते हैं, वह वस्तुतः अनुमिति ज्ञान न होकर अर्थापत्तिज्ञान ही है और उस ज्ञान में कारण भी अर्थापत्ति ही है।

शंका—१. पृथ्वी, जलादि अन्य पदार्थों से भिन्न है,
२. क्योंकि उसमें गन्ध है,
३. व्यतिरेक से जल के तुल्य,

इस उदाहरण में जिस पर से उसे अर्थापत्ति कहा जा सके ऐसा कौनसा अनुपपत्ति ज्ञान है ? इसके उत्तर में कहते हैं—पृथ्वी का गन्धवत्त्व ही उसका उपपादक है। अन्य (इतर) पदार्थों से भिन्न हुए बिना पृथ्वी में गन्धवत्त्व (गन्ध) का होना अनुपपन्न है। यह अनुपपत्तिज्ञान ही वहाँ कारण है। क्योंकि इतरभेद के अभाव का व्यापक जो गन्धाभाव उसका प्रतियोगी गंध है। क्योंकि जल में इतर भेद नहीं होता तो वहाँ गंध भी नहीं रहता। इसलिये इतरभेदज्ञान, अर्थापत्ति ही है। व्यतिरेकी अनुमान के अन्य समस्त उदाहरण, अर्थापत्ति प्रमाण के ही हैं। तस्मात् यह पृथक् प्रमाण सिद्ध हुआ।

श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे
अर्थापत्ति-परिच्छेदः समाप्तः ॥

—:०:—

अथानुपलब्धिपरिच्छेदः ६

इस प्रकार प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों के लक्षण प्रमाण आदि बताये गये, अब ग्रन्थकार षष्ठ प्रमाण का प्रतिज्ञापूर्वक निरूपण करते हैं ।

इदानीं षष्ठं ¹प्रमाणं निरूप्यते । ²ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणमनुपलब्धिरूपं प्रमाणम् । अनुमान³जन्यातीन्द्रियाभावानुभव हेतावनुमानादावतिव्याप्तिवारणाय अजन्यान्तं पदम् । अदृष्टादौ साधारणकारणेऽतिव्याप्तिवारणाय असाधारणेति पदम् । अभावस्मृत्यसाधारणहेतु-संस्कारेऽतिव्याप्तिवारणाय अनुभवेति विशेषणम् ।

**अर्थ—**अब छठे प्रमाण का निरूपण किया जाता है। ज्ञान रूप करण से उत्पन्न न होने वाला जो अभावानुभव का (अभाव प्रत्यक्ष का) असाधारण कारण हो वही अनुपलब्धि रूप छठा प्रमाण है। अनुमानप्रमाणजन्य जो अतीन्द्रिय अभाव का अनुमिति रूप अनुभव, उसका कारण अनुमानादि होता है, उसमें अतिव्याप्ति न हो इसलिये अनुपलब्धि लक्षण में 'अजन्यान्त' (ज्ञानकरणाजन्य) पद आवश्यक है, एवं अदृष्टादि साधारण


१. षष्ठं प्रमाणाभावरूपम्प्रमाणं निरूप्यते । अनुपलब्धिप्रमाणाङ्गीकारस्य प्रयोजनं श्लोकवार्तिके 'वस्त्वसंकरसिद्धिश्च तत्प्रामाण्यसमाश्रया' इत्यादिना असद्रूपेण घटादिज्ञानमित्युक्तम् । एवञ्च ब्रह्मणि प्रपञ्चाभावसिद्धिद्वारा अद्वितीयब्रह्मस्वरूपसिद्धिः अद्वैतिनामसाधारणं फलमिति न तत्प्रमाणविचारः अद्वैतिनां निष्प्रयोजनः ।

२. ज्ञानकरणाजन्येति अनुमानादिनिरासः । अभावानुभवेत्यनेन प्रत्यक्ष-स्मृत्योर्निरासः इत्थं श्लोकवार्तिकादिसिद्धमनुपलब्धिलक्षणमेवेदम् । तथा च श्लोकवार्तिककाराः—
"प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते । वस्तुसत्तावबोधार्थं तत्राभावप्रमाणता ॥" इत्युक्त्या 'प्रमाणपञ्चकाभावः'—अनुपलब्धिप्रमाणलक्षणम्, इत्युक्तं भवति । भाष्यकाराः शबरस्वामिनोऽपि—'अभावोऽपि प्रमाणाभावोऽपि नास्तीत्यस्यार्थस्य असन्निकृष्टस्य' इति वदन्त एतमेवार्थमभिप्रयन्ति । अत्र च प्रमाणाभावः स्वरूपत एव चक्षुरादीन्द्रियवत् प्रमाणम्, न तु ज्ञायमानः ज्ञानद्वारेति न अभावहेतुकानुमानस्यापि अनुपलब्धित्वम् इति न दोषः । तथा च अनुपलब्धेः स्वरूपं तावदिदम्—ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणमनुपलब्धिः ।' अर्थात् ज्ञानरूपं यत् करणं तदजन्यो यः अभावानुभवः तस्य असाधारणकारणम् । एवञ्च लक्षणास्यायमाकारः—ज्ञानकरणाजन्याभावानुभवासाधारणकारणत्वम् ।

३. 'नादि'—इति पाठान्तरम् ।

२८० वेदान्तपरिभाषा [ अनुपलब्धिलक्षणम्

कारणों में अतिव्याप्ति न हो इसलिये 'असाधारण ( कारण ) पद आवश्यक है। अभाव स्मृति का असाधारण कारण जो संस्कार, उसमें अतिव्याप्ति न हो ईसलिये 'अनुभव' पद आवश्यक है।

विवरण—अब छह प्रमाणों में से अन्त्य षष्ठ अनुपलब्धि प्रमाण का निरूपण ( लक्षण प्रमाणादि कथन, ) कर्तव्य है। ज्ञानरूपी करण जिसका जनक न हो, ऐसा जो अभाव का अनुभव, ( अभाव प्रत्यक्ष ) उसका जो असाधारण कारण —उसे अनुपलब्धि प्रमाण कहते हैं। अनुमितिप्रमा में व्याप्तिज्ञान, एवं उपमितिप्रमा में सादृश्यज्ञान, तथा शाब्दप्रमा में पदज्ञान—करण होता है, और उससे अनुमिति उपमिति तथा शाब्दप्रमा होती है। परन्तु अभावप्रमा, ज्ञानकरणजन्य नहीं है। अभाव का अनुभव प्रत्यक्ष-ज्ञान से नहीं होता। इसलिये वह ज्ञानकरणजन्य होता है। ऐसे अनुभव का आसाधारण कारण अनुपलब्धि ( ज्ञानाभाव ) है। उपलब्धि = ज्ञान और अनुपलब्धि = ज्ञान का अभाव, अतः अनुपलब्धि का यह लक्षण उचित है।

इस लक्षण में 'अभावानुभव' पद का निवेश न कर 'ज्ञानकरणाजन्य अनुभवासाधारणकारण' इतना ही लक्षण यदि करते तो उसकी प्रत्यक्ष प्रमाण में अतिव्याप्ति हुई होती, इसीलिये तो नैयायिकों ने 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण किया है। लक्षण में 'अभाव' पद का निवेश करने पर अतिव्याप्ति का निरसन हो जाता है। क्योंकि प्रत्यक्ष ( चक्षुरादि प्रमाण ) अभावप्रत्यक्षज्ञान के करण नहीं होते। अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि से होता है, अर्थात् घट ज्ञानाभाव के कारण घटाभाव का ज्ञान होता है। यदि अत्र भूतले घटः स्यात्, तर्हि उपलभ्येत नोपलभ्यते तस्मान्नास्ति।' —यदि इस भूतल पर घट होता तो दिखाई देता। जबकि नहीं दीखता तो वह नहीं है— इसी तरह अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होता है। इसी कारण उस पदार्थ के ज्ञान का अभाव, उस पदार्थ के अभाव ज्ञान में कारण होता है। इसलिए इस प्रमाण की 'अनुपलब्धि' संज्ञा अन्वर्थक है।

शंका—'अभावानुभवासाधारणकारणम्' इतना ही अनुपलब्धि का लक्षण किया जाय। उसमें 'ज्ञानकरणाजन्य' पद किसलिये निविष्ट किया है? ऐसा कौन सा 'अभावानुभव' है कि जो ज्ञानकरणजन्य है, जिसमें अतिव्याप्ति हो जाने के भय से 'अजन्यान्त' पद की आवश्यकता होगी।

समाधान—'ज्ञानकरणाजन्य' पद का लक्षण में यदि निवेश न किया गया तो अतीन्द्रिय अभाव की जो अनुमित्यात्मक प्रमा उसके करण रूप अनुमान में अनुपलब्धि लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि अभाव की अनुमिति में अनुमान असाधारण कारण है। इस अतिव्याप्ति के निरासार्थ 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण का निवेश अवश्य करना चाहिये। अभावाऽनुमिति, अनुभवव्याप्तिज्ञानरूप अनुमान से जन्य है अर्थात् उस अनुमिति

अनुपलब्धिलक्षणम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८१

में व्याप्तिज्ञान करण है। इसलिये वह ज्ञानकरणाजन्य नहीं है, अतः उक्त दोष नहीं आने पाता।

प्रश्न— अभाव की अनुमिति कौन सी है?

उत्तर— देवदत्तादि किसी व्यक्ति को दुःखी देखकर हम १—'यह धर्माभाववान् है, २—क्योंकि यह दुःखी है' इस प्रकार उसके धर्माभाव का अनुमान करते हैं। यहाँ पर उसके धर्माभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि धर्मादि पदार्थों के अतीन्द्रिय होने से उनका अभाव भी अतीन्द्रिय ही होता है। यही अतीन्द्रियविषयक अनुमिति है। 'अनुमानादि०' यहाँ के आदि पद से आगम तथा अर्थापत्ति का ग्रहण करना चाहिये। 'चान्द्रायण से समस्त पापों का क्षय हो जाता है' इस आगम से ही समस्त पापों के क्षय (अभाव) का ज्ञान होता है। यह पापाभाव का अनुभव आगम—(शब्दप्रमाण) जन्य है। इसी तरह 'द्वयणुक सावयव है' यह वाक्य श्रवण होने पर वह परमाणु से भिन्न है। यह ज्ञान अर्थापत्ति से होता है। 'ज्ञानकरणाजन्य' पद के निवेश न करने पर उपर्युक्त दोनों स्थलों में अतिव्याप्ति हुई होती, (इनके करण भूत पदज्ञान और अनुपपत्तिज्ञान को भी अनुपलब्धि कहने का प्रसंग प्राप्त होता) अतः 'ज्ञानकरणाजन्य' पद आवश्यक है।

लक्षण में स्थित 'असाधारण' पद का प्रयोजन 'अदृष्टादि०' वाक्य से कहा गया है। प्रागभाव, अदृष्ट, काल आदि पदार्थ समस्त कार्यों में साधारण कारण माने गये हैं। इस कारण अभाव के अनुभव में भी अदृष्टादि कारण हैं। 'असाधारण कारण न कहकर केवल 'अभावानुभवकारणम्' लक्षण करें तो अदृष्टादि साधारण कारणों को भी 'अनुपलब्धि' कहना होगा। अतः उसके निरसनार्थ लक्षण में 'असाधारण' पद का निवेश करना चाहिये। अभाव के प्रत्यक्ष में अदृष्टादि साधारण कारण होते हैं। केवल अनुपलब्धि ही उसमें असाधारण कारण है। अतः उक्त अतिव्याप्ति नहीं है।

'अभावानुभवासाधारणकरणम्' लक्षण में 'अनुभव' शब्द के स्थान पर 'ज्ञान' शब्द को रखकर 'अभावज्ञानासाधारणकारणम्' यदि लक्षण करें तो अभावस्मृति के कारणभूत संस्कार में अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि अभाव के स्मृत्यात्मक ज्ञान में संस्कार, असाधारण कारण होते हैं 'संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यही स्मृति का लक्षण है। पूर्वानुभूत पदार्थ का पूर्वज्ञानसंस्कार से ही स्मरण होता है। अतः इस संस्कार में अतिव्याप्ति न हो इसलिये लक्षण में ज्ञान पद का प्रयोग न कर 'अनुभव' शब्द का प्रयोग किया गया है।

घटादि पदार्थों का अभाव जैसे अनुपलब्धि प्रमाण से ज्ञात होता है वैसे ही अतीन्द्रिय धर्माधर्मादिकों का अभाव भी अनुपलब्धि से ही ज्ञात होता है, मानना चाहिये, क्योंकि उभयत्र अनुपलब्धि तो समान ही है तब 'ज्ञानकरणाजन्य' पद का निवेश करने का क्या प्रयोजन है? इस आशय से शंका उपस्थित कर उसका समाधान भी करते हैं।

२८२वेदान्तपरिभाषा[ अनुपलब्धिलक्षणम्

न चाती१न्द्रियाभावानुमिति-स्थलेऽप्यनुपलब्ध्यैवाभावो गृह्यतां विशेषाभावादिति वाच्यम्। २धर्माधर्माद्यनुपलब्धिसत्त्वेऽपि तदभावानिश्चयेन योग्यानुपलब्धेरेवाभाव-ग्राहकत्वात्।

अर्थशंका—'अतीन्द्रिय पदार्थ के अभावातुमितिकस्थल में भी अभाव का ग्रहण अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय, क्योंकि अतीन्द्रिय भावपदार्थ की अनुपलब्धि और अभाव की अनुपलब्धि में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

समाधान—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि धर्माधर्म की अनुपलब्धि होने पर भी उनके अभाव का निश्चय नहीं हो पाता। इसलिये योग्यानुपलब्धि ही अभावग्राहक है, अर्थात् वही अभाव की ज्ञापिका है।

विवरणशंका—आप अभाव के प्रत्यक्ष में प्रतियोग्यानुपलब्ध (प्रतियोगी का ज्ञान न होना) को कारण बताते हैं। धर्मादिकों का भी प्रत्यक्षज्ञान न होने से उनके अभाव का ज्ञान, इस अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय। सर्वत्र अभाव-प्रमा में केवल एक अनुपलब्धि को ही कारण मानने में लाघव है। ऐसी स्थिति में धर्मादि अतीन्द्रिय पदार्थों का अभाव अनुमानादि प्रमाणों से ज्ञात होता है—यह आप कैसे कह रहे हैं? जैसी घटादिकों की अनुपलब्धि वैसी ही धर्म-अधर्मादिकों की भी अनुपलब्धि है। इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के द्वारा धर्मादिकों के अभाव का ज्ञान होता है। यह स्वीकार करने पर लक्षण में 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

समाधान—हम अभाव-प्रमा में प्रतियोग्यनुपलब्धि को अनुपलब्धित्वेन रूपेण कारण नहीं मानते। अपितु योग्यानुपलब्धित्वेन रूपेण (योग्यानुपलब्धिस्त्वधर्म से) अनुपलब्धि को अभावातुभव में कारण मानते हैं। अर्थात् जिस प्रतियोगी में प्रत्यक्षयोग्यता होती है ऐसे ही प्रतियोगी की अनुपलब्धि, उसके (प्रतियोगीके) अभाव की प्रमापक (प्रमाण, प्रमाजनक) होती है। धर्माधर्म की चक्षुरादि से अनुपलब्धि होती है (ज्ञान होता नहीं) परन्तु इतने ही से उनके अभाव का निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगी स्वरूप अतीन्द्रिय धर्माधर्मादि पदार्थों में प्रत्यक्ष योग्यता नहीं होती। इस कारण उनके अभावों का एवं उनका भी ज्ञान केवल अनुमानादि प्रमाणों से ही मानना चाहिये। इसीलिये अभाव की ग्राहक योग्यानुपलब्धि ही है—ऐसा हम कहते हैं।

ऐसी योग्यानुपलब्धि का होना तो असम्भव ही है—इस आशय से वादी विकल्प-पूर्वक प्रश्न करता है।


१. 'वाभावा'—इति पाठान्तरम्।
२. धर्मप्रमाणाभावेऽपि तदभावविषयकसत्तानिश्चयरूपग्रहणात्मकज्ञानाभावेन प्रत्यक्षयोग्यप्रतियोगिविषयकप्रमाणाभावस्यैव सत्तानिश्चयात्मकानुभवहेतुत्वात्।

योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८३

'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः ? । किं योग्यस्य प्रतियोगिनोऽनुप- लब्धिरुत योग्या^२धिकरणे प्रतियोग्यनुपलब्धिः ? । नाद्यः, स्तम्भे पिशाचादि-भेदस्याप्रत्यक्षत्वापत्तेः । नान्त्यः, आत्मनि धर्माधर्माद्य भावस्या^३पि प्रत्यक्षता^४पत्तेः ।

अर्थ—प्रश्न—यह योग्यानुपलब्धि क्या है ? अर्थात् उसका स्वरूप क्या है । (१) योग्य-प्रतियोगी की अनुपलब्धि = ज्ञान न होना ( इसे योग्यानुपलब्धि कहते हो, ) ( २ ) अथवा योग्य = प्रत्यक्षयोग्य अधिकरण में प्रतियोगी की अनुपलब्धि ( को योग्या नुपलब्धि कहते हो ) ।

इनमें से प्रथम पक्ष तो सम्भवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर स्तंभ में पिशा- चादि के भेद की अप्रत्यक्षत्वापत्ति होगी ( स्तम्भ में 'यह पिशाच नहीं' इत्याकारक प्रत्यक्ष नहीं होगा ) ।

इसी तरह 'अधिकरण योग्य चाहिये' यह द्वितीय पक्ष भी संभवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर आत्मा में धर्माधर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । तस्मात् दोनों कल्प ( पक्ष ) संभवनीय न होने से योग्यानुपलब्धि का निरूपण नहीं किया जा सकता ।

विवरण—इस ग्रन्थ के द्वारा केवल वादी की शंका का अनुवाद किया गया है । अनुपलब्धि में प्रत्यक्षयोग्यता चाहिए और ऐसी योग्यानुपलब्धि ही अभाव प्रत्यक्ष में कारण होती है । परन्तु इस योग्यानुपलब्धि का स्वरूप क्या है ? अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव । उस अभाव के बल पर पदार्थ में योग्यता क्या होगी ? जिस पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वह पदार्थ अनुपलब्धि का प्रतियोगी और प्रत्यक्षयोग्य होना चाहिए— यह आपको सम्मत है, या उस प्रतियोगी की जिस अधिकरण में प्रतीति होती है, वह अधिकरण प्रत्यक्षयोग्य होता है—यह सम्मत हैं ? परन्तु ये दोनों पक्ष नहीं बन सकते । क्योंकि प्रतियोगी योग्य होना चाहिए—ऐसा यदि कहो अर्थात् 'योग्यस्य अनुपलब्धिः' ऐसा षष्ठी-समास यदि किया जाय तो 'प्रत्यक्ष योग्य प्रतियोगी की अनुपलब्धि' यह अर्थ


१. प्रत्यक्षानुमानादिभिरेव घटाद्यभावः अनुभूयते इति न अनुपलब्धिः प्रमाणान्तर- मिति शङ्कते 'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः' इति । अत्र 'योग्यस्यानुपलब्धिः' इति षष्ठी- समासः' किंवा 'योग्ये अनुपलब्धिः' इति सप्तमीसमासो न कार्यः, अपि तु 'योग्याचासौ अनुपलब्धि'-रिति कर्मधारयसमासो विधेयः । २. 'ग्येधि०'—इति पाठान्तरम् । ३. 'स्यप्र०'—इति पाठान्तरम् । ४. क्षत्वाप०'—इति पाठान्तरम् ।