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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 482 में से

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अनुपलब्धिलक्षणम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८१

में व्याप्तिज्ञान करण है। इसलिये वह ज्ञानकरणाजन्य नहीं है, अतः उक्त दोष नहीं आने पाता।

प्रश्न— अभाव की अनुमिति कौन सी है?

उत्तर— देवदत्तादि किसी व्यक्ति को दुःखी देखकर हम १—'यह धर्माभाववान् है, २—क्योंकि यह दुःखी है' इस प्रकार उसके धर्माभाव का अनुमान करते हैं। यहाँ पर उसके धर्माभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि धर्मादि पदार्थों के अतीन्द्रिय होने से उनका अभाव भी अतीन्द्रिय ही होता है। यही अतीन्द्रियविषयक अनुमिति है। 'अनुमानादि०' यहाँ के आदि पद से आगम तथा अर्थापत्ति का ग्रहण करना चाहिये। 'चान्द्रायण से समस्त पापों का क्षय हो जाता है' इस आगम से ही समस्त पापों के क्षय (अभाव) का ज्ञान होता है। यह पापाभाव का अनुभव आगम—(शब्दप्रमाण) जन्य है। इसी तरह 'द्वयणुक सावयव है' यह वाक्य श्रवण होने पर वह परमाणु से भिन्न है। यह ज्ञान अर्थापत्ति से होता है। 'ज्ञानकरणाजन्य' पद के निवेश न करने पर उपर्युक्त दोनों स्थलों में अतिव्याप्ति हुई होती, (इनके करण भूत पदज्ञान और अनुपपत्तिज्ञान को भी अनुपलब्धि कहने का प्रसंग प्राप्त होता) अतः 'ज्ञानकरणाजन्य' पद आवश्यक है।

लक्षण में स्थित 'असाधारण' पद का प्रयोजन 'अदृष्टादि०' वाक्य से कहा गया है। प्रागभाव, अदृष्ट, काल आदि पदार्थ समस्त कार्यों में साधारण कारण माने गये हैं। इस कारण अभाव के अनुभव में भी अदृष्टादि कारण हैं। 'असाधारण कारण न कहकर केवल 'अभावानुभवकारणम्' लक्षण करें तो अदृष्टादि साधारण कारणों को भी 'अनुपलब्धि' कहना होगा। अतः उसके निरसनार्थ लक्षण में 'असाधारण' पद का निवेश करना चाहिये। अभाव के प्रत्यक्ष में अदृष्टादि साधारण कारण होते हैं। केवल अनुपलब्धि ही उसमें असाधारण कारण है। अतः उक्त अतिव्याप्ति नहीं है।

'अभावानुभवासाधारणकरणम्' लक्षण में 'अनुभव' शब्द के स्थान पर 'ज्ञान' शब्द को रखकर 'अभावज्ञानासाधारणकारणम्' यदि लक्षण करें तो अभावस्मृति के कारणभूत संस्कार में अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि अभाव के स्मृत्यात्मक ज्ञान में संस्कार, असाधारण कारण होते हैं 'संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यही स्मृति का लक्षण है। पूर्वानुभूत पदार्थ का पूर्वज्ञानसंस्कार से ही स्मरण होता है। अतः इस संस्कार में अतिव्याप्ति न हो इसलिये लक्षण में ज्ञान पद का प्रयोग न कर 'अनुभव' शब्द का प्रयोग किया गया है।

घटादि पदार्थों का अभाव जैसे अनुपलब्धि प्रमाण से ज्ञात होता है वैसे ही अतीन्द्रिय धर्माधर्मादिकों का अभाव भी अनुपलब्धि से ही ज्ञात होता है, मानना चाहिये, क्योंकि उभयत्र अनुपलब्धि तो समान ही है तब 'ज्ञानकरणाजन्य' पद का निवेश करने का क्या प्रयोजन है? इस आशय से शंका उपस्थित कर उसका समाधान भी करते हैं।

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