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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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२८२वेदान्तपरिभाषा[ अनुपलब्धिलक्षणम्

न चाती१न्द्रियाभावानुमिति-स्थलेऽप्यनुपलब्ध्यैवाभावो गृह्यतां विशेषाभावादिति वाच्यम्। २धर्माधर्माद्यनुपलब्धिसत्त्वेऽपि तदभावानिश्चयेन योग्यानुपलब्धेरेवाभाव-ग्राहकत्वात्।

अर्थशंका—'अतीन्द्रिय पदार्थ के अभावातुमितिकस्थल में भी अभाव का ग्रहण अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय, क्योंकि अतीन्द्रिय भावपदार्थ की अनुपलब्धि और अभाव की अनुपलब्धि में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

समाधान—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि धर्माधर्म की अनुपलब्धि होने पर भी उनके अभाव का निश्चय नहीं हो पाता। इसलिये योग्यानुपलब्धि ही अभावग्राहक है, अर्थात् वही अभाव की ज्ञापिका है।

विवरणशंका—आप अभाव के प्रत्यक्ष में प्रतियोग्यानुपलब्ध (प्रतियोगी का ज्ञान न होना) को कारण बताते हैं। धर्मादिकों का भी प्रत्यक्षज्ञान न होने से उनके अभाव का ज्ञान, इस अनुपलब्धि प्रमाण से ही माना जाय। सर्वत्र अभाव-प्रमा में केवल एक अनुपलब्धि को ही कारण मानने में लाघव है। ऐसी स्थिति में धर्मादि अतीन्द्रिय पदार्थों का अभाव अनुमानादि प्रमाणों से ज्ञात होता है—यह आप कैसे कह रहे हैं? जैसी घटादिकों की अनुपलब्धि वैसी ही धर्म-अधर्मादिकों की भी अनुपलब्धि है। इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के द्वारा धर्मादिकों के अभाव का ज्ञान होता है। यह स्वीकार करने पर लक्षण में 'ज्ञानकरणाजन्य' विशेषण देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

समाधान—हम अभाव-प्रमा में प्रतियोग्यनुपलब्धि को अनुपलब्धित्वेन रूपेण कारण नहीं मानते। अपितु योग्यानुपलब्धित्वेन रूपेण (योग्यानुपलब्धिस्त्वधर्म से) अनुपलब्धि को अभावातुभव में कारण मानते हैं। अर्थात् जिस प्रतियोगी में प्रत्यक्षयोग्यता होती है ऐसे ही प्रतियोगी की अनुपलब्धि, उसके (प्रतियोगीके) अभाव की प्रमापक (प्रमाण, प्रमाजनक) होती है। धर्माधर्म की चक्षुरादि से अनुपलब्धि होती है (ज्ञान होता नहीं) परन्तु इतने ही से उनके अभाव का निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगी स्वरूप अतीन्द्रिय धर्माधर्मादि पदार्थों में प्रत्यक्ष योग्यता नहीं होती। इस कारण उनके अभावों का एवं उनका भी ज्ञान केवल अनुमानादि प्रमाणों से ही मानना चाहिये। इसीलिये अभाव की ग्राहक योग्यानुपलब्धि ही है—ऐसा हम कहते हैं।

ऐसी योग्यानुपलब्धि का होना तो असम्भव ही है—इस आशय से वादी विकल्प-पूर्वक प्रश्न करता है।


१. 'वाभावा'—इति पाठान्तरम्।
२. धर्मप्रमाणाभावेऽपि तदभावविषयकसत्तानिश्चयरूपग्रहणात्मकज्ञानाभावेन प्रत्यक्षयोग्यप्रतियोगिविषयकप्रमाणाभावस्यैव सत्तानिश्चयात्मकानुभवहेतुत्वात्।