वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयोग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८३
'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः ? । किं योग्यस्य प्रतियोगिनोऽनुप- लब्धिरुत योग्या^२धिकरणे प्रतियोग्यनुपलब्धिः ? । नाद्यः, स्तम्भे पिशाचादि-भेदस्याप्रत्यक्षत्वापत्तेः । नान्त्यः, आत्मनि धर्माधर्माद्य भावस्या^३पि प्रत्यक्षता^४पत्तेः ।
अर्थ—प्रश्न—यह योग्यानुपलब्धि क्या है ? अर्थात् उसका स्वरूप क्या है । (१) योग्य-प्रतियोगी की अनुपलब्धि = ज्ञान न होना ( इसे योग्यानुपलब्धि कहते हो, ) ( २ ) अथवा योग्य = प्रत्यक्षयोग्य अधिकरण में प्रतियोगी की अनुपलब्धि ( को योग्या नुपलब्धि कहते हो ) ।
इनमें से प्रथम पक्ष तो सम्भवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर स्तंभ में पिशा- चादि के भेद की अप्रत्यक्षत्वापत्ति होगी ( स्तम्भ में 'यह पिशाच नहीं' इत्याकारक प्रत्यक्ष नहीं होगा ) ।
इसी तरह 'अधिकरण योग्य चाहिये' यह द्वितीय पक्ष भी संभवनीय नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर आत्मा में धर्माधर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । तस्मात् दोनों कल्प ( पक्ष ) संभवनीय न होने से योग्यानुपलब्धि का निरूपण नहीं किया जा सकता ।
विवरण—इस ग्रन्थ के द्वारा केवल वादी की शंका का अनुवाद किया गया है । अनुपलब्धि में प्रत्यक्षयोग्यता चाहिए और ऐसी योग्यानुपलब्धि ही अभाव प्रत्यक्ष में कारण होती है । परन्तु इस योग्यानुपलब्धि का स्वरूप क्या है ? अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव । उस अभाव के बल पर पदार्थ में योग्यता क्या होगी ? जिस पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वह पदार्थ अनुपलब्धि का प्रतियोगी और प्रत्यक्षयोग्य होना चाहिए— यह आपको सम्मत है, या उस प्रतियोगी की जिस अधिकरण में प्रतीति होती है, वह अधिकरण प्रत्यक्षयोग्य होता है—यह सम्मत हैं ? परन्तु ये दोनों पक्ष नहीं बन सकते । क्योंकि प्रतियोगी योग्य होना चाहिए—ऐसा यदि कहो अर्थात् 'योग्यस्य अनुपलब्धिः' ऐसा षष्ठी-समास यदि किया जाय तो 'प्रत्यक्ष योग्य प्रतियोगी की अनुपलब्धि' यह अर्थ
१. प्रत्यक्षानुमानादिभिरेव घटाद्यभावः अनुभूयते इति न अनुपलब्धिः प्रमाणान्तर- मिति शङ्कते 'ननु केयं योग्यानुपलब्धिः' इति । अत्र 'योग्यस्यानुपलब्धिः' इति षष्ठी- समासः' किंवा 'योग्ये अनुपलब्धिः' इति सप्तमीसमासो न कार्यः, अपि तु 'योग्याचासौ अनुपलब्धि'-रिति कर्मधारयसमासो विधेयः । २. 'ग्येधि०'—इति पाठान्तरम् । ३. 'स्यप्र०'—इति पाठान्तरम् । ४. क्षत्वाप०'—इति पाठान्तरम् ।