भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 482 में से

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२८४ वेदान्तपरिभाषा [ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम्

होगा । परन्तु वह उचित नहीं । क्योंकि प्रतियोगी को सर्वत्र प्रत्यक्षायोग्य होना ही यदि मानें तो जिसका प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता ऐसे (प्रत्यक्षायोग्य) पिशाच का भेद प्रत्यक्षतः ज्ञात नहीं होगा । किसी स्तम्भ को देखने के पश्चात् प्रथमतः भ्रम से भासित हुए पिशाच की निवृत्ति होकर 'यह स्तम्भ, पिशाच नहीं' इत्याकारक स्तम्भ में पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है—वह अनुपपन्न होगा । अर्थात् वह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं होता है, कहना पड़ेगा । किन्तु ऐसा कहना तो अनुभव के विरुद्ध है । इस कारण योग्यता प्रतियोगी में होती है और उसकी अनुपलब्धि, अभाव-प्रत्यक्ष में कारण है—ऐसा नहीं कहा जा सकता । अच्छा तो इस दोष के परिहारार्थ आप यदि ऐसा कहें कि प्रतियोगीप्रत्यक्ष रहे चाहे न रहे, केवल उस प्रतियोगी का अधिकरण ( आधार प्रतियोगी जिस पर रहता है वह पदार्थ ) प्रत्यक्ष योग्य होने पर तन्निष्ठपदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा सप्तमी तत्पुरुष ( योग्‍ये अनुपलब्धिः ) मान लें । जैसे —स्तम्भ में 'यह पिशाच है' ऐसा ज्ञान होने पर भी पिशाच प्रत्यक्षयोग्य नहीं होता, यह प्रसिद्ध ही है । किन्तु उस पिशाच का कल्पित अधिकरण जो स्तम्भ है वह प्रत्यक्षयोग्य रहता है, इस कारण उसका यथार्थ ज्ञान हुआ, अर्थात् यह पिशाच नहीं है, पिशाच भिन्न स्तम्भ है इत्याकारक पिशाच भेद का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है । यह स्तम्भ पिशाच से भिन्न है, पिशाच नहीं है—ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होता है । इसलिए अधिकरण में ही प्रत्यक्षयोग्यता का होना उचित है, और उसके कारण ही तन्निष्ठ पदार्थ के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । 'योग्‍ये अधिकरणे अनुपलब्धिः' योग्य अधिकरण में प्रतियोगी की प्रतीति न होना इस प्रकार 'योग्यानुपलब्धि' शब्द की व्युत्पत्ति मानकर अधिकरण की जो योग्यता, वही अनुपलब्धि की योग्यता है, यदि कहें तो भी ठीक नहीं । ( प्रथम पक्ष में 'योग्यस्य अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः, षष्ठीतत्पुरुष और दूसरे पक्ष में 'योग्‍ये अनुपलब्धिः = योग्यानुपलब्धिः' सप्तमीतत्पुरुष समास मानकर दोष देने का प्रयत्न किया है । प्रथम पक्ष में स्तम्भ में पिशाच भेद अप्रत्यक्ष होने का प्रसङ्ग आवेगा । अब वादी दूसरे पक्ष में भी दोष देता है ) इस पक्ष में स्तम्भ आदि में पिशाच के भेद प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति न होने पर भी धर्माधर्मादि परोक्ष पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता । इस तुम्हारे सिद्धान्त पर दोष आता है क्योंकि उस अभाव के प्रतियोगीरूप धर्माधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं, किन्तु उनका अधिकरणभूत आत्मा प्रत्यक्षयोग्य-है । 'अहम्' इस रूप से उसका मानस प्रत्यक्ष होता है । कि बहुना वह साक्षात् अपरोक्ष है । इस कारण अधिकरण योग्यता का स्वीकार करने पर तन्निष्ठ धर्माधर्मों के अभाव का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि अभाव-प्रत्यक्ष में आवश्यक अधिकरणयोग्यता और धर्मादि की अनुपलब्धिरूप सामग्री वहाँ भी रहती है । परन्तु आप वैसा नहीं मानते । अतीन्द्रिय वस्तुओं के अभाव का ज्ञान अनुमान से ही होता है, अनुपलब्धि से नहीं—यह तुम्हारा मत योग्य है, क्योंकि जहाँ प्रतियोगी का ही प्रत्यक्ष नहीं होता वहाँ प्रति-