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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 482 में से

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पृष्ठ 343

योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८५

योगी के अभाव का ज्ञान भी होना सम्भव नहीं, तस्मात् ये दोनों पक्ष सम्भवनीय नहीं हैं।

उपर्युक्त आक्षेप का गूढ़ आशय इस प्रकार है--

भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरण, प्रत्यक्षयोग्य होना आवश्यक है और अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष के लिये प्रतियोगी की प्रत्यक्षयोग्यता आवश्यक है। स्तम्भ में पिशाच भेद का प्रत्यक्ष करने के लिये उसका अधिकरणरूप स्तम्भ प्रत्यक्ष योग्य होने से स्तंभ और पिशाच के अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। स्तंभ में स्थित जो पिशाच भेद है वह अन्योन्याभाव है। इस कारण अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो पिशाच, वह प्रत्यक्ष योग्य हो चाहे न हो तथापि उसका अधिकरण स्तंभ, प्रत्यक्ष योग्य होने से उस अन्योन्याभाव (भेद) का प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है।

किन्तु वेदान्त मत के अनुसार आत्मा में धर्माधर्म का अत्यंताभाव रहता है। इस कारण उसका अधिकरण प्रत्यक्ष हो चाहे न हो तथापि अनुपलब्धि का प्रतियोगी जो धर्माधर्म, उसमें प्रत्यक्षयोग्यता न होने से उससे अभाव का प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुपलब्धि प्रमाण से हो नहीं सकता। इसलिये प्रतियोगी की योग्यता का पक्ष स्वीकार किया जाय तो उसका उपयोग, अत्यन्ताभाव के प्रत्यक्ष में होता है। किन्तु अन्योन्याभाव के प्रत्यक्ष स्थल में उसकी अव्याप्ति होती है। और अधिकरणयोग्यता का पक्ष मानकर योग्यता का निरूपण करें तो अतीन्द्रिय पदार्थों के अत्यन्ताभाव में भी प्रत्यक्षत्वापत्ति होती है। इस रीति से अतिव्याप्ति होती है। एवं योग्यता का निरूपण ही आप नहीं कर सकते।

इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं—

इति चेत् । न । योग्या चासावनुपलब्धिश्चेति कर्मधारयाश्रयणात् । अनुपलब्धेर्योग्यता च—¹तर्कित-प्रतियोगिसत्त्वप्रसञ्जित-प्रतियोगिकत्वम् । यस्याभावो गृह्यते, तस्य यः प्रतियोगी, तस्य सत्त्वेनाधिकरणे तर्कितेन ²प्रसञ्जनयोग्यमापादनयोग्यं ³यत्प्रतियोग्युपलब्धिस्वरूपं यस्यानुपलम्भस्य⁴ तदनुपलब्धेर्योग्यत्वमित्यर्थः ।

तथा हि, स्फीतालोकवति भूतले यदि घटः स्यात्तदा घटोपलम्भः


१. तर्कितेति। तर्कितेन प्रतियोगिसत्त्वेन प्रसञ्जितः आपादानयोग्यः प्रतियोगी यस्य अनुपलम्भस्य तत्त्वम्' इति विग्रहः।
२. 'प्रसञ्जितमापादनयोग्य०'–इति पाठान्तरम् ।
३. 'यत्' इति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।
४. 'स्य तत्त्वम्'–इति पाठान्तरम्।

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