वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् |
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स्यादित्यापादन-सम्भवात्तादृश-भूतले घटाभावोऽनुपलब्धिगम्यः । अन्धकारे तु तादृशापादना¹सम्भवान्नानुपलब्धि गम्यता । अत एव स्तम्भे² पिशाचसत्त्वे स्तम्भवत्प्रत्यक्षता³पत्त्या तदभावोऽनुपलब्धि-गम्यः । आत्मनि ⁴धर्मादिसत्त्वेऽ⁵प्यस्यातीन्द्रियतया निरुक्तोपलम्भा-पादनाऽसम्भवात् न ⁶धर्माद्यभावस्यानुपलब्धिगम्यत्वम् ।
**अर्थ—**ऐसा आक्षेप करोगे तो वह उचित न होगा । क्योंकि हमने 'योग्य जो अनुपलब्धि—वह योग्यानुपलब्धि' ऐसा कर्मधारय समास का आश्रय किया है ।
तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व ( अस्तित्व ) से प्राप्त हुआ प्रतियोगिकत्व ही अनुपलब्धि की योग्यता है, अर्थात् 'यदि यहाँ होता' इस रीति से तर्कित ( जो ), अभाव के प्रतियोगी का सत्त्व, उसके योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी प्रसंजित होता है—'तो वह उपलब्ध हुआ होता' इस रीति से प्राप्त होता है, इसी ज्ञान को योग्यता कहते हैं । जिसका अभाव ग्रहण किया जाता है उसके प्रतियोगी के अधिकरण में कल्पित-( कदाचित् हुआ हो इस आकार में कल्पना किया हुआ ) सत्त्व ( अस्तित्त्व, सत्ता ) योग से अनुपलब्धि का प्रतियोगी रूप उपलंभ ( उपलब्धि ) ( तो दिखाई देता इस ज्ञान के योग्य होना ) ही अनुपलब्धि की योग्यता है । जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ यदि घट होता तो वह दिखाई देता' कह सकते हैं, अतः ऐसे स्पष्ट प्रकाश से युक्त भूतल पर घटाभाव का जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, वह अनुपलब्धि प्रमाण से होता है । किन्तु अन्धकार में 'घट होता तो दिखाई देता' ऐसे आपादन का संभव नहीं है । इसलिये वहाँ पर स्थित घटाभाव का ज्ञान, अनुपलब्धि से नहीं होता । इसी कारण पिशाच का प्रत्यक्ष ज्ञान न होने पर भी 'स्तंभ में यदि वह होता तो उसका स्तंभ के समान ही प्रत्यक्ष हुआ होता' परन्तु वह होता नहीं, इसलिये स्तंभ में भी पिशाच का अभाव अनुपलब्धिप्रमाणगम्य है । किन्तु आत्मा में धर्माधर्मादि-यदि होते तो दिखाई देते' ऐसा ज्ञानापादन ( उसमें धर्माधर्मादि होने पर भी ) नहीं सकता इसलिये उन जैसे परोक्ष पदार्थों का अभाव, अनुपलब्धिप्रमाण वेद्य नहीं है ।
विवरण—'योग्यानुपलब्धि' में षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष समास मानने पर अव्याप्ति
१. 'नाभावान्ना'—इति पाठान्तरम्
२. 'तादात्म्येन पिशा०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'क्षत्वा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'धर्माधर्मस०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'तस्या' इति पाठान्तरम् ।
६. 'धर्माधर्माद्य०—इति पाठान्तरम् ।