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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 482 में से

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योग्यानुपलब्धिस्वरूपम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८७

अतिव्याप्ति आदि दोष आते हैं—यह तुम्हारा आक्षेप है, परन्तु वह ठीक नहीं। क्योंकि हम उसमें षष्ठी, या सप्तमी समास नहीं मानते। हमने तो उसमें कर्मधारय-समास (योग्य ऐसी जो अनुपलब्धि) माना है। इस कारण हमारे मत में उक्त दोष नहीं हो पाता। क्योंकि उसका उपयोग, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव दोनों अभावों के प्रत्यक्षज्ञान में होता है।

अनुपलब्धि का अर्थ है ज्ञानाभाव। उस अभाव में योग्यता कैसी? जिसके न होने से 'योग्य जो अनुपलब्धि' यह अर्थ भी कैसे सम्भव हो सकेगा? ऐसा यदि कोई पूछे तो उत्तर देते हैं—(अभाव के—प्रतियोगी के तर्कितत्व से) तर्क से अनुपलब्धि के प्रतियोगी की उपलब्धि की प्राप्ति कर सकना ही अनुपलब्धि की योग्यता है। अनुपलंभ के सर्वत्र समान होने पर भी जिस अनुपलब्धि के प्रतियोगी की (उपलब्धि की) 'हुआ होता' तर्क के द्वारा कल्पित सत्ता से 'तो दीखता' यह आपादन किया जा सकता है वही योग्यानुपलब्धि है। उस अनुपलब्धि से अभाव का प्रत्यक्ष-ज्ञान होता है।

तात्पर्य यह है कि—जिस अनुपलब्धि के विषय में 'अमुक पदार्थ यहाँ होता तो दिखाई देता, वह दीखता नहीं, अतः नहीं है', ऐसा कहा जा सकता है, वही योग्यानुपलब्धि है और वही अभाव प्रमा में छठा प्रमाण है। जैसे—स्पष्ट प्रकाश वाले भूतल पर 'यहाँ घट होता तो दीखता, जब कि वह नहीं दीखता तो वह नहीं है' यह कह सकते हैं। इसलिये ऐसे भूतल पर जो घटाभाव का ज्ञान होता है वह अनुपलब्धि प्रमाण से ही होता है—यह मानना चाहिये।

इस उदाहरण में घटाभाव अनुपलब्धिप्रमाण से ग्राह्य है। 'घट' उसका प्रतियोगी है। और उस प्रतियोगी के—'घट होता' इत्याकारक तर्क से कल्पना किये हुए अस्तित्व से—'तो दीखता, किन्तु दीखता नहीं-अतः नहीं है' इस प्रकार की-घटानुपलब्धि की प्रतियोगिनी जो घटोपलब्धि, उसका अपादान किया जा सकता है। इसलिये योग्य घट की अनुपलब्धि, छठे प्रमाण से ज्ञात होती है।

अंधकार में स्थित घट का भी ज्ञान नहीं होता। तथापि वह इस अनुपलब्धि प्रमाण से होता है-ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि यहाँ 'घट होता' इस तर्कित प्रतियोगी के सत्त्व से 'तो दीखता' इस प्रकार अनुपलब्धि के प्रतियोगी का (घटोपलब्धिका) आपादन (घट होता तो दिखाई देता) नहीं कर सकते। अंधकार में अनुपलब्धि के होने पर भी वह योग्य नहीं होती। इसीलिये उसके बलपर 'इस भूतलपर घटाभाव है' ऐसा भी निश्चित ज्ञान नहीं होता। कदाचित् 'यहाँ घटाभाव है' इस निश्चित ज्ञान से घटाभाव का ज्ञान होनेपर भी उसे प्रत्यक्ष नहीं कह सकते। अतः उसमें अनुपलब्धि को कारण नहीं कह सकते। वह ज्ञान अनुमित्यादिरूप हो सकता है और उसमें अनुमानादि को कारण भी कह सकते हैं।