वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ वेदान्तपरिभाषा [ अभावग्रहे इन्द्रियस्याप्रमाणत्वम्
हमारे माने हुए योग्यानुपलब्धि के स्वरूप में आप के दिये हुए वैकल्पिक दोष भी नहीं हो सकते । तथाहि—'यह स्तंभ है, पिशाच नहीं' इसप्रकार से स्तंभमें पिशाच के भेद ( अन्योन्याभाव ) का प्रत्यक्षज्ञान होता है। यदि यहाँ पिशाच होता तो स्तंभ के समान दिखाई देता-ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस कारण लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'आत्मा में धर्मादि के अभाव का भी प्रत्यक्ष होगा और उस कारण लक्षण की अतिव्याप्ति होगी' यह दूसरा आक्षेप भी कर्मधारय पक्ष में नहीं हो सकेगा। क्योंकि आत्मामें धर्माधर्मादि रहते हैं, ऐसा मान भी लें तथापि उनके अतीन्द्रिय (परोक्ष) होने के कारण 'यहाँ धर्माधर्म होते तो दीखते' यह नहीं कह सकते, क्योंकि उनमें इन्द्रियप्रत्यक्ष होने की योग्यता ही नहीं है, और योग्यानुपलब्धि के अभाव के कारण उनके अभाव का प्रत्यक्ष भी नहीं होता है, इसी कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। 'होता तो दीखता' ऐसा जिसके विषय में कह सकते हैं उस अनुपलब्धि को ही हम योग्यानुपलब्धि कहते हैं और वही अभावप्रत्यक्ष में कारण होती है। केवल अनुपलब्धि, अभाव के प्रत्यक्ष में कारण नहीं है। क्योंकि उसमें योग्यता नहीं होती। इस कारण ऐसे प्रत्यक्षायोग्य पदार्थ के अभाव का ज्ञान, अनुमानादि से होता है। तस्मात् अनुपलब्धि का पूर्वोक्त लक्षण सर्वथा उचित है। इस रीति से पदार्थों के ज्ञानाभाव से योग्य पदार्थों के अभाव का प्रत्यक्ष होता है।
जिस इन्द्रिय से पदार्थ का प्रत्यक्षज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से उसके अभाव का भी प्रत्यक्ष होता है--अतः अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—
$^१$'ननुक्तरीत्याऽधिकरणेन्द्रिय-सन्निकर्ष-स्थले अभावस्यानुपलब्धि-गम्यत्वं$^२$मनुमतं । तत्र कॢप्तेन्द्रियमेवाभावाकार-वृत्तावपि करणम्, $^३$इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकानुविधानादिति चेत् । "$^४$न, तत्प्रतियोग्यनुपलब्धेरपि अभावग्रहे हेतुत्वेन कॢप्तत्वेन करणत्वमात्रस्य कल्पनात् । इन्द्रियस्य चाभावेन स$^५$मं सन्निकर्षाभावेनाभावग्रहाहेतुत्वात् । इन्द्रियान्वय-व्यतिरेकयोरधिकरणज्ञानाद्युपक्षीणत्वेनान्यथासिद्धेः ।
१. नानुपलब्धेः प्रमाणान्तरत्वमिति नैयायिकः शङ्कते 'नन्वि' त्यादिना ।
२. 'त्वं त्वदभिमतम्'-इति पाठान्तरम् ।
३. इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानात् इन्द्रियसत्त्वे अभावज्ञानं, तदभावे तदभावः इति अन्वयव्यतिरेकयोः अनुरोधात् ।
४. 'ने' तिग्रन्थेन समाधानमाह--नास्ति ममाद्वैतिनो गौरवं प्रहु। नैयायिकस्य महद् गौरवम् ।
५. 'सह'-इति पाठान्तरम् ।