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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 482 में से

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पृष्ठ 347

इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २८९

अर्थ— "पूर्वोक्त प्रकार से जहाँ अधिकरण और इन्द्रिय का संनिकर्ष होता है वहाँ अभाव, अनुपलब्धिगम्य होता है" यह तुम्हें संमत है। "किन्तु वहाँ क्लृप्त (निश्चित) इन्द्रिय ही अभावाकारवृत्ति के विषय में भी करण होता है, क्योंकि वहाँ इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक का अनुविधान रहता है। 'इन्द्रिय होगा तो अभाव का प्रत्यक्षज्ञान होगा और वह न हो तो नहीं होगा' इन्द्रिय के इस अन्वयव्यतिरेक का अनुरोध अनुभूत होता है। ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं क्योंकि अभावप्रत्यक्ष के प्रतियोगी की उपलब्धि तो कल्पित है, अब तो केवल करणत्व की ही कल्पना करनी पड़ती है। 'तो फिर इन्द्रिय की ही कल्पना क्यों न की जाय ?' यह कहें तो इन्द्रिय का अभाव के साथ सन्निकर्ष नहीं होता । इस कारण से अभावज्ञान में इन्द्रिय को हेतुत्व भी नहीं है। 'तब इन्द्रिय के अन्वयव्यतिरेक की क्या गति है ?' यदि पूछो तो अधिकरण ज्ञान से अन्वय-व्यतिरेक उपक्षीण होते हैं (अन्वयव्यतिरेकादि अधिकरण का ज्ञान कराकर चरितार्थ हो जाते हैं) इसलिये वे अभाव-प्रत्यक्ष के विषय में अन्यथासिद्ध हैं।

विवरण— हमें 'जिस इन्द्रिय से पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी इन्द्रिय से पदार्थ के अभाव का भी ज्ञान होता है, नील-घट में पीत-रूप के अभाव का जो ज्ञान होता है वह चक्षुरिन्द्रिय से ही होता है क्योंकि नील-घट में पीतरूप है या नहीं, यह जानने के लिये नेत्र से ही देखना पड़ता है। चक्षुभिन्न किसी इन्द्रिय से रूप का या रूपाभाव का प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता। अतः इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष होने पर उस इन्द्रिय से ही तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि 'यह भूतल घटाभाववत् है' इस प्रकार हमें जब भूतल का ज्ञान होता है, तब हम भूतल के विशेषण-रूप में घटाभाव भासित होता है। वहाँ पर भूतल के साथ चक्षुरिन्द्रिय का 'संयोगसंबन्ध' होता है और भूतल के विशेषणरूप घटाभाव के साथ चक्षु का 'विशेषणता-संबन्ध' रहता है अर्थात् चक्षु का घटाभाव के साथ 'संयुक्त-विशेषणता' संबंध होता है, तब प्रत्यक्ष होता है। इसी प्रकार रूपाभाव प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेत-विशेषणता' संबंध से, रूपत्वाभाव का प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेतसमवेत-विशेषणता' संबंध से, ककारादिशब्दों में खकारादिकों के अभाव का प्रत्यक्ष समवेत-विशेषणता' संबंध से, कत्व में खत्व के अभाव का प्रत्यक्ष- 'समवेतसमवेत-विशेषणता' सम्बन्ध से होता है। उसी प्रकार अनुपलब्धि के होने पर इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष यदि हो तो तन्निष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय है, और इन्द्रिय का अधिकरण के साथ संनिकर्ष न हो तो अनुपलब्धि के होने पर भी रूपादि के अभाव का चक्षूरहित घ्राणादिकों से प्रत्यक्ष न होना—यह व्यतिरेक है इस अन्वय व्यतिरेक से भी अभाव-प्रमा में करण इन्द्रिय ही सिद्ध होता है। तस्मात् जहाँ पर 'यदि घट होता तो दीखता' यह ज्ञान अनुपलब्धि-प्रमाण से होता है—ऐसा आप कहते हैं। वहाँ अधिकरणज्ञान के साथ इन्द्रिय को ही क्लृप्तकरण-मानना उचित है। क्योंकि घट होता तो दीखता' यह आपादन भी इन्द्रिय का अधिकरण