वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९० वेदान्तपरिभाषा [ इन्द्रियस्याभावाग्राहकत्वम्
के साथ संनिकर्ष हुए बिना हो नहीं सकता, अतः तुम अनुपलब्धवादियों को भी इन्द्रिय-संनिकर्ष का तो अवश्य स्वीकार करना ही पड़ता है । और इस कल्पना में लाघव भी है, क्योंकि इन्द्रिय में 'विषयाकारवृत्तिजनकत्व' कल्पित है और 'अनुपलब्धि' कल्प्य है । इस कारण से उसमें अभावप्रत्यक्ष का करणत्व भी कल्प्य है । इसलिये जैसे अधिकरणाकार-वृत्ति, चक्षुरादि इन्द्रियों से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही अभावाकार-वृत्ति को भी इन्द्रिय-जन्य ही मानना युक्त है । अतः अभाव-प्रमा के लिये अनुपलब्धि-प्रमाण का अभ्युपगम करने की कोई आवश्यकता नहीं—ऐसा नैयायिक कहते हैं ।
'न' इत्यादि ग्रंथ से उपर्युक्त मत का निरसन करते हैं । भाव यह है कि--तुम नैयायिकों ने 'इन्द्रियों में अभाव-प्रमापकत्व क्लृप्त हैं, अनुपलब्धि में अभाव-ग्राहकत्व कल्प्य है, जो कहा वह ठीक नहीं है, क्योंकि इन्द्रियों के समान प्रतियोगी की अनुपलब्धिमें 'अभावप्रत्यक्षहेतुत्व' भी क्लृप्त ही है, क्योंकि अधिकरण के साथ इन्द्रियसंनिकर्ष के होने पर भी यदि वहां प्रतियोगी का ज्ञान ( उपलब्धि ) हो तो उसके अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता । इस कारण अनुपलब्धि यदि हो तो अभाव का प्रत्यक्ष होता है—यह अन्वय, और इन्द्रियसंनिकर्ष होते हुए भी अनुपलब्धि यदि न हो तो अभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता--यह व्यतिरेक । 'अन्वयव्यतिरेक' अनुपलब्धि में प्रमाण होने से इन्द्रियों के समान अनुपलब्धि में भी कारणत्व क्लृप्त है, कल्प्य नहीं । इस कारण कल्पना-गौरवदोष हमारे पक्ष में नहीं आता, क्योंकि उस अनुपलब्धि में ही करणत्व होता है ।
इन्द्रियां और अनुपलब्धि दोनों क्लृप्त होने पर भी उनमें से अनुपलब्धि में ही कारणत्व मानने में विनिगमक ( एक पक्ष का ही आश्रय करने में युक्ति ) क्या है ? इसके विपरीत अभावप्रमा में इन्द्रियसंनिकर्ष ही कारण है—यह मानकर इन्द्रियों में ही कारणत्व क्यों न माना जाय ? इस पक्ष में पृथक् छठे प्रमाण की कल्पना नहीं करनी पड़ती—यह लाघव ही विनिगमक होने से इन्द्रियों में ही करणत्व माना जाय—यह शंका उचित नहीं है । क्योंकि इन्द्रियों में अभावप्रमा का कारणत्व ही असिद्ध होने से ( कारणत्व का ही एक विशेष ) करणत्व का भी असंभव है । जिसमें कारणत्व होगा उसी में करणत्व का संभव हो सकता है । परन्तु अभावप्रमा में इन्द्रियों की कारणता ही असिद्ध है । तथाहि—आप अभाव के साथ इन्द्रियों का 'संयुक्तविशेषणता' संनिकर्ष बताते हैं, किन्तु वास्तव में इन्द्रियों का अधिकरण से ही संबंध रहता है, अभाव से नहीं आपका बताया हुआ 'इन्द्रिय-संबद्ध-विशेषणता' संबंध बन नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर परमाणुओं के साथ चक्षु का संयोगसंनिकर्ष होने से उस इन्द्रियसंबद्ध पृथ्वी-परमाणुओं में जलत्वाभाव का भी प्रत्यक्ष होना आपके मत में मानना होगा । इस-कारण अभावप्रमा का जनक विशेषणतासंबंध ( संनिकर्ष ) है, नहीं कहा जा सकता । अतः अभाव के साथ इन्द्रियों का संनिकर्ष नहीं बन सकता और अभावानुभव की इन्द्रियों में कारणता नहीं मानी जा सकती । तस्मात् अभावप्रमा में अनुपलब्धि ही प्रमाण है ।