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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९१

शंका—यदि इन्द्रियों से अभाव का अनुभव नहीं होता तो अधिकरण के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष होने पर ही भूतलनिष्ठ अभाव का प्रत्यक्ष होता है अन्यथा नहीं होता—इस अन्वयव्यतिरेक की क्या व्यवस्था होगी ? आप ही का तो कहना है कि कार्यकारण-भाव में निश्चायक अन्वयव्यतिरेक ही होते हैं । तब इस अन्वयव्यतिरेक से इन्द्रियाँ अभावप्रमा में जनक हैं यह क्यों नहीं कहते ? ।

समाधान—केवल अन्वयव्यतिरेक से ही कार्य-कारण-भाव का निश्चय नहीं किया जाता । क्योंकि दण्डरूप के होने पर घट होता है और उसके न होने पर नहीं होता—ऐसे अन्वयव्यतिरेक के भी संभव हो सकने से दण्ड के तुल्य दण्डरूप को भी ( दण्ड का नील पीतादिरूप भी ) घट के प्रति कारण मानना होगा । इसलिये आपको भी 'जो अनन्यथा-सिद्ध होता हुआ अन्वयव्यतिरेकशाली हो वही कारण होता है' यह कारण का स्वरूप मानना पड़ता है । ( अन्वयव्यतिरेक के रहते हुए भी जो पदार्थ अन्यथासिद्ध हो अर्थात् कार्यनिष्पत्ति में यदि उस पदार्थ का वास्तविक उपयोग न हो तो उस पदार्थ को आप कार्य के प्रति कारण नहीं मानते हैं ) इसी कारण घटरूप कार्य के प्रति दण्डरूप में कारणता सिद्ध नहीं होती । उसी प्रकार से हम कहते हैं कि अधिकरण के साथ इन्द्रियों का अन्वयव्यतिरेक होने पर भी अधिकरण के ज्ञान में ही इन्द्रियाँ असाधारणकारण ( करण ) होती हैं, इसलिये अभावप्रमा में वे इन्द्रियाँ अन्यथासिद्ध हैं । क्योंकि हमारे उपर्युक्त कथनानुसार अभाव के साथ इन्द्रियों का विशेषणतादि कोई संबंध ( संनिकर्ष ) हो नहीं सकता । इस कारण इन्द्रियाँ अभाव के अधिकरणभूत भूतलादि का ज्ञान-कराकर चरितार्थ हो जाती हैं । उनका अभावानुभव में कोई उपयोग नहीं । तस्मात् अभावप्रमा में इन्द्रियों को करणत्व न होने से ही वे अभाव-ग्राहकप्रमाण नहीं हैं अपितु प्रतियोगी की अनुपलब्धि को ही अभावप्रमापक छठा प्रमाण मानना उचित है ।

इस प्रकार नैयायिकों के मत का निरसन करने पर नैयायिक, 'तुम्हारे मत के अनुसार अधिकरणज्ञान में इन्द्रिय को कारण मानने पर भी वह अभावज्ञान में भी कारण हो सकता है' इस आशय से शंका उपस्थित करता है ।

न^१नु भूतले घटो नेत्याद्यभावानुभवस्थले भूतलांशे प्रत्यक्षत्व-मुभय^२सिद्धमिति तत्र वृत्तिनिर्गमनस्यावश्यकत्वेन भूतलावच्छिन्न-चैतन्यवत्तन्निष्ठघटाभावावच्छिन्न-चैतन्यस्यापि प्रमात्रभिन्नतया घटाभावस्य प्रत्यक्ष^३तैव सिद्धान्तेऽपि ।


१. नैयायिकः—वेदान्तिनां मतेऽपि अभावप्रमायाः प्रत्यक्षतैव समायाति अत कथं तत्करणमनुपलब्धिरिति शङ्कते ।
२. 'वादि'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'रूपतैव'—इति पाठान्तरम् ।