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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 482 में से

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पृष्ठ 350

२९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अभावज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम्

अर्थ--'भूतल पर घट नहीं है' इस अभावानुभव स्थल में भूतल का प्रत्यक्ष तो उभयवादिसिद्ध है। अतः वहाँ पर ( भूतल पर ) वृत्ति का निर्गमन तो अवश्य ही है। अतः भूतलावच्छिन्न चैतन्य के समान भूतलनिष्ठ अभावावच्छिन्न चैतन्य भी प्रमाता से अभिन्न होने के कारण सिद्धान्त में घटाभाव में भी प्रत्यक्षता है ही।

**विवरण--**वादी कहता है-'भूतलो घटो नास्ति' इस अभाव के ज्ञान में आप का हमारा विवाद रहने पर भी भूतलरूप अधिकरण के अंश में प्रत्यक्ष तो दोनों को सम्मत है ही। इस पर हमारा यह कहना है कि तुम्हारे कथनानुसार विषय के प्रत्यक्ष से तात्पर्य यह है कि घटादि विषय का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद रहना।

इस रीति से भूतल के प्रत्यक्ष में भूतलरूप विषय से अवच्छिन्न चैतन्य का प्रमातृ-चैतन्य के साथ अभेद मानना आवश्यक है। इस प्रकार भूतलावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता के साथ अभेद होता है। अर्थात् भूतलनिष्ठ जो घटाभाव, उससे अवच्छिन्न चैतन्य के साथ भी प्रमाता का अभेद होता है। इसलिये जैसे 'भूतल' अंश में आप प्रत्यक्षात्मक ज्ञान मानते हैं वैसे ही घटाभाव-ज्ञानांश में भी आपको प्रत्यक्षज्ञान ही मानना चाहिये। अर्थात् घटाभाव का ज्ञान भी प्रत्यक्षात्मक है—यह सिद्ध होता है। प्रत्यक्षज्ञान का करण तो प्रत्यक्ष ही होता है यह आपने प्रत्यक्षज्ञान परिच्छेद में बताया है। तब आप ही के मतानुसार घटाभावप्रत्यक्ष में कारण क्या प्रत्यक्ष, ( इन्द्रिय ही ) सिद्ध नहीं होता है? ऐसी स्थिति में अभावानुभव के कारण इन्द्रिय को न मानकर यह छठा अनुपलब्धि प्रमाण ही उसमें कारण है, यह कैसे कह रहे हैं?

नैयायिकों के इस आक्षेप का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—

इति चेत्। सत्यम्। ^१अभावप्रतीतेः प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करण- स्यानुपलब्धेर्मानान्तरत्वात्। न हि फलीभूत-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे तत्करणस्य प्रत्यक्षप्रमाणता-नियतत्वमस्ति, दशमस्त्वमसीत्यादिवाक्य- जन्य-ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि तत्करणस्य ^२वाक्यस्य प्रत्यक्षप्रमाणभिन्न- प्रमाणत्वाभ्युपगमात्।

**अर्थ—**आपका कहना सत्य है। अभावप्रतीति प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें करण


१. यथा शब्दस्य अतिरिक्तप्रमाणत्वेऽपि विषयविशेषे शब्दः प्रत्यक्षप्रमाकरणमिति दशमस्त्वमसीत्यादौ क्लृप्तम्, तत्र हि विषयविशेषे शब्दस्य प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वं न प्रमाण-स्वभावविशेषकृतं, किन्तु विषयस्वभावकृतमिति तत्र अतिरिक्तस्यैव शब्दप्रमाणस्य प्रत्यक्ष-प्रमाकरणत्वमपि अर्थतः पर्यवस्यति, एवं विषयविशेषे अनुपलब्धिजन्यवृत्त्यवच्छिन्नस्य विषयचैतन्याभेदेन अनुपलब्धेः अप्रमाणान्तरत्वेऽपि तस्या अतिरिक्तप्रमाणत्वं नानुपपन्नम्।
२. 'वाक्यस्ये'ति पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके।

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