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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 482 में से

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पृष्ठ 351

अनुपलब्धेः पृथक्प्रमाणत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९३

अनुपलब्धिसंज्ञक पृथक् प्रमाण ही है (ऐसा हम कहते हैं) क्योंकि फलभूत (साध्यभूत) ज्ञान के प्रत्यक्ष होने से उसका करण (साधन) प्रत्यक्ष ही हो—यह नियम नहीं। 'तू दशवां है' इत्यादि वाक्य से उत्पन्न हुए ('मैं दसवां हूँ') ज्ञान में प्रत्यक्षत्व होने पर भी उसका (ज्ञान का) कारण जो वाक्य है, वह प्रत्यक्षप्रमाण से भिन्न (शब्द रूप) प्रमाण है—ऐसा हमने माना है।

विवरण—'अनुपलब्धिजन्य अभावज्ञान प्रत्यक्षात्मक होना चाहिये' यह आप का कथन ठीक है। किन्तु अभावज्ञान के प्रत्यक्ष होने पर भी उसका करण 'प्रत्यक्षप्रमाण' नहीं हो सकता (इन्द्रिय नहीं हो सकता)। अपितु अनुपलब्धि ही अभाव की ज्ञापिका है। आपने जो शंका की है वह 'साध्यप्रमाप्रत्यक्षात्मक होने पर उसका साधनभूत प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिए' इस नियम को मानकर की है। परन्तु फलभूत ज्ञानप्रमा यदि प्रत्यक्ष हो तो प्रमाण भी प्रत्यक्ष ही होना चाहिये—यह नियम नहीं हो सकता। क्योंकि कोई मूर्ख मनुष्य अपने को छोड़कर शेष नौ को गिने और अपना दसवाँ मित्र नष्ट हुआ—ऐसी कल्पना कर रोने लगे। ऐसी स्थिति में कहीं से दूसरा आदमी आकर कहे कि 'अरे, तेरा दसवाँ मित्र मरा नहीं किन्तु 'तू ही दसवाँ है' अपने को गृहीत कर (अपने समेत) गिनकर देखो, तब तुम्हें विश्वास होगा। यहाँ पर उस आदमी को 'तू दसवाँ है' इस वाक्य से ही 'मैं दसवां हूँ' इस प्रकार दसवें का प्रत्यक्ष होता है। इस प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं किन्तु 'तू दसवां है' इस प्रकार उस आदमी का वाक्य (शब्द) ही है, अर्थात् यह प्रत्यक्ष, प्रत्यक्षप्रमाणजन्य नहीं किन्तु शब्दजन्य है। इस कारण 'प्रमा के प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण भी प्रत्यक्ष होना चाहिये' इस नियम का भंग हो जाता है। इसीलिये हम कहते हैं कि अभाव का ज्ञान प्रत्यक्ष रहने पर भी उसका प्रमाण (साधन) प्रत्यक्ष (इन्द्रिय) नहीं। अपितु उक्त प्रकार से अनुपलब्धि ही अभावप्रत्यक्ष में करण है। अतः अभाव को प्रत्यक्ष मानकर भी हमारे मत में दोष नहीं है।

'प्रमा यदि प्रत्यक्षात्मक ही है तो उसके लिये दो प्रमाण क्यों मानते हो' वादी की इस आशय की शंका का अनुवाद कर उसका निरसन करते हैं—

'फलवैजात्यं विना कथं प्रमाणभेद इति चेत्²। न। वृत्तिवैजात्यमात्रेण प्रमाणवैजात्योपपत्तेः³। तथा च घटाद्यभावाकार⁴वृत्तिर्ने-


१. 'ननुफल०' इति पाठान्तरम् ।
२. फलवैजात्यं नाम प्रमाभेदः । प्रमाणभेदः एव प्रमाणभेदप्रयोजकः, तस्मात् प्रमाभेदाऽभावे प्रमाणभेदः कथमिति शंकाकर्तुराशयः ।
३. 'रा' इति पाठान्तरम् ।
४. प्रमाणभेदे फलवैजात्यं न प्रयोजकम्, अपितु वृत्तिवैजात्यम् । वृत्तिवैजात्यं नाम