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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 482 में से

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पृष्ठ 352
२९४वेदान्तपरिभाषा[ अनुपलब्धेः पृथक् प्रमाणत्वम्

न्द्रियजन्या, इन्द्रियस्य विषयेणाऽसन्निकर्षात् । किन्तु घटानुपलब्धि-रूप-मानान्तरजन्या, इति भवत्यनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् ।

अर्थ—'फलों में वैजात्य ( भिन्नता ) के बिना रहे, उनके प्रमाणों में कैसे भेद होगा ! यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि वृत्ति में भिन्नता होने से ही प्रमाणों में भेद उपपन्न होता है। इसलिये घटाभावाकारवृत्ति, इन्द्रियजन्य नहीं है, क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय का घटाभावादि विषयों के साथ संनिकर्ष नहीं होता, अपितु घट की अनुपलब्धि ( ज्ञान का अभाव ) प्रमाण से ही वह ( अभावाकारवृत्ति ) जन्य है। इसलिये अभावाकारवृत्ति का जनक अनुपलब्धिसंज्ञक पृथक् प्रमाण है।

विवरण—यदि अभावज्ञान प्रत्यक्षात्मक ही है तो एक ही प्रत्यक्षप्रमा के लिए प्रत्यक्ष और अनुपलब्धि दो प्रमाणों को क्यों मानना चाहिये। प्रत्यक्ष प्रमा की अपेक्षा अनुमित्यात्मक प्रमा भिन्न होने से उन प्रमाओं के साधक प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण मानने पड़ते हैं। अर्थात् प्रमाओं में भेद होने पर प्रमाणों में भी भेद होता है। घट प्रत्यक्ष और उसके अभाव के प्रत्यक्ष में प्रत्यक्षरूपता समान होने पर भी उनके ग्राहक प्रमाणों को भिन्न मानना योग्य नहीं। अतः प्रत्यक्ष-प्रमाकरणं प्रत्यक्षम्' यह नियम भी नहीं किया जा सकता। इसलिये अभाव-प्रमा में प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना योग्य है यह इस पक्ष में लाघव भी है।

इस पर ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—'प्रमाओं में भेद होने पर प्रमाणों में भेद होता है' यह नियम नहीं है। अर्थात् प्रमाओं का भेद, प्रमाओं के भेद में प्रयोजक ( कारण ) नहीं होता। किन्तु वृत्तियों में भी भेद होने पर प्रमाणों में भेद हो सकता है। इसीलिये 'दशमस्त्वमसि' इस शब्द से प्रमा प्रत्यक्षात्मक ही होती है, तथापि उसका प्रमाण प्रत्यक्ष न होकर शब्द है, इस रीति से प्रमा में भेद न होने पर भी प्रमाणों में भेद हो जाता है—यह अनुभव होने से वृत्ति की भिन्नता ही प्रमाण के भेद में प्रयोजक ( कारण ) माननी चाहिये। इसलिये प्रत्यक्षता में भेद न होने पर भी अभावाकारवृत्ति का जनक प्रमाण अनुपलब्धि है और इतर विषयाकार वृत्तियों में इन्द्रिय ही प्रमाण है। यह हमारा मत है।

'अभावाकार वृत्ति और इतर विषयाकार वृत्ति में भी वैजात्य ( भिन्नता ) किस प्रकार है ? यह प्रश्न हो तो उत्तर इस प्रकार है—इतर विषयाकारवृत्तियां इन्द्रियजन्य होती हैं, वैसी अभावाकार वृत्ति नहीं होती—यही भिन्नता है। इन्द्रियों का अभाव के साथ सन्निकर्ष नहीं होता। क्योंकि इन्द्रियां अधिकरणों के साथ संबद्ध होकर भूतलादि अधिकरणाकार वृत्ति को उत्पन्न कर चरितार्थ हो जाती हैं। आपने स्वीकृत किया हुआ विशेषणतादि संनिकर्ष का तो सम्भव ही नहीं रहता, यह पीछे बता चुके हैं। अतः


प्रमाणवैजात्यमित्यर्थः । एवञ्च भूतलाकारवृत्तेः इन्द्रियजन्यत्वात् अभावाकारवृत्तेश्च इन्द्रियाऽजन्यत्वात् वृत्तिवैजात्यम् ।