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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 482 में से

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पृष्ठ 353

अभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९५

इन्द्रियों से अभावाकारवृत्ति के उत्पन्न न होने के कारण अभावाकार वृत्ति का जनक अनुपलब्धि-प्रमाण पृथक् ही मानना पड़ता है।

घट होता तो दीखता, जब कि वह नहीं दीखता, अतः 'वह यहाँ नहीं है' इस रीति से घट की अनुपलब्धि से ही घटाभाव का ज्ञान होता है, अर्थात् अनुपलब्धि से ही अभावाकार वृत्ति उत्पन्न होती है। तस्मात् फलभूत ज्ञान में भेद न होने पर भी वृत्तियों में भेद होने से अभावाकार वृत्ति का जनक अनुपलब्धि-प्रमाण पृथक् रूप से स्वीकार करना ही चाहिये। इस पर वादी की शंका—

नन्वनुपलब्धिरूप-मानान्तर-पक्षेऽप्यभाव-प्रतीतेः प्रत्यक्षत्वे घटवति घटाभाव-भ्रमस्यापि प्रत्यक्षत्वापत्तौ तत्राप्यनिर्वचनीय-घटाभावोऽभ्युपगम्येत। न चेष्टापत्तिः, तस्य मायोपादानकत्वेऽभावत्वानुपपत्तेः, मायोपादानकत्वाभावे मायायाः सकल-कार्योपादानत्वानुपपत्तिः।

अर्थ—अनुपलब्धि को पृथक् रूप से प्रमाण माननेवाले के पक्ष में भी अभाव प्रतीति का प्रत्यक्ष होने से घटवद्भूतल पर जो घटाभाव (यहाँ घट नहीं है) का भ्रम होता है, उसमें भी प्रत्यक्षत्व प्राप्त होता है। तब आपको ऐसे अभावभ्रम के स्थल में भी अनिर्वचनीय घटाभाव वहाँ उत्पन्न होता है, यह मानना पड़ेगा। उसे आप इष्ट (अभिमत) नहीं कह सकते। क्योंकि वह घटाभाव मायोपादानक है, अर्थात् 'उसका उपादान-कारण माया है' ऐसा मानें तो उस अभाव में अभावत्व उपपन्न नहीं होगा। यदि ऐसा कहें कि वह मायोपादानक नहीं है तो 'माया समस्त कार्य का उपादान (कारण) है, इस तुम्हारे सिद्धान्त की अनुपपत्ति होती है।

विवरण—वादी कहता है—आपके कहने के अनुसार अनुपलब्धि को अभाव-प्रमा का पृथक् प्रमाण हम मान लेते हैं, किन्तु इस पक्ष में भी अनेक दोष आते हैं। जैसे—जब कि आपके मत में भी घटाभावज्ञान, प्रत्यक्षात्मक ही है, तब मान लीजिये किसी व्यक्ति को भूतल पर घट के रहते हुए भी वह नहीं दिखाई दिया तो 'इस भूतल पर घट नहीं है' यह भ्रमात्मक जो घटाभाव का ज्ञान होता है। उसे प्रत्यक्षात्मक ही कहना होगा, क्योंकि वह घटाभावज्ञान, अनुपलब्धिजन्य ही है। प्रत्यक्ष परिच्छेद में आपने यह सिद्ध किया है कि भ्रम का विषयभूत पदार्थ उस समय में अनिर्वचनीय उत्पन्न होता है। वैसे ही इस भ्रम के विषयभूत घटाभाव को भी अनिर्वचनीय पैदा हुआ ही कहना होगा।

इस पर यदि कदाचित् आप कहें कि हमभी घटाभाव-भ्रम-स्थल में घटाभाव का अनिर्वचनीय उत्पन्न होना ही मानते हैं। अतः आपकी शंका हमारे लिये तो इष्टापत्ति है। परन्तु आप वैसा कह नहीं सकते हैं। क्योंकि हम आप से (सिद्धान्ती से) ऐसा


१. 'क्षेऽभाव'-इति पाठान्तरम् ।

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