वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१६ | वेदान्तपरिभाषा | [ अभावस्य मायोपादानकत्वम्
प्रश्न करते हैं कि उस अनिर्वचनीय घटाभाव का कारण ( उपादान कारण ) माया है या नहीं ? माया को आप घटाभाव में कारण नहीं कह सकते, क्योंकि माया तो भाव-रूप पदार्थ होने के कारण उससे 'घटाभाव' इस अभाव रूप कार्य की उत्पत्ति होना संभव नहीं । भावरूप पदार्थ को अभाव में कारण मानने पर असत्कार्यवाद प्राप्त होती है । इस दोष को दूर करने के लिये यदि माया को घटाभाव में कारण न मानें तो 'माया समस्त कार्य के प्रति उपादान है' इस सिद्धान्त का बाध होता है । ऐसी स्थिति में इस अनुपपत्ति का परिहार आप कैसे कर सकते हैं ? इस शंका का समाधान ग्रन्थकार कर रहे हैं—
इति चेत् । न । घटवति घटाभावभ्रमो न तत्कालोत्पन्नघटा-भाव-विषयकः, किन्तु भूतलरूपादौ विद्यमानो लौकिको घटाभावो भूतले आरोप्यत इत्यन्यथाख्यातिरेव । आरोप्यसन्निकर्ष-स्थले सर्वत्रा-न्यथाख्यातेरेव व्यवस्थापनात् ।
**अर्थ—**ऐसा कहें तो वह उचित नहीं क्योंकि 'घटवद्-भूतल' पर घटाभाव का जो भ्रम होता है उसका उस समय में उत्पन्न हुआ ( अनिर्वचनीय ) घटाभाव विषय नहीं होता किन्तु भूतल के रूप आदि में स्थित लौकिक ( व्यावहारिक ) घटाभाव, भूतल पर आरोपित किया जाता है, अतः वह अन्यथा ख्याति ही है । क्योंकि जहाँ पर आरोप्य पदार्थ के साथ इन्द्रियों का सन्निकर्ष होता है वहाँ पर अन्यथाख्याति को मानकर ही हम व्यवस्था करते हैं ।
**विवरण—**यदि हम अनिर्वचनीय घटाभाव का स्वीकार करते तो आपके दिये दोषों का हमारे पक्ष में संभव होता । परन्तु भूतल पर घट के रहते हुए भी 'यह भूतल घटाभाववत् है' इस भ्रम में अनिर्वचनीय एवं उस समय पैदा हुए घटाभाव ( अर्थात् प्रातिभासिक सत्तावाले ) को हम विषय नहीं मानते ।
आपने जो पीछे बताया है कि 'भ्रमस्थल में भ्रम का विषय प्रातिभासिक एवं तत्का-लोत्पन्न घटाभाव ही रहता है' इसका तात्पर्य क्या होगा ? उत्तर देते हैं कि पहले प्रत्यक्षपरिच्छेद में ही हमने 'जहाँ जपापुष्प इन्द्रिय सन्निकृष्ट होगा वहाँ स्फटिक में भासमान रक्तत्व प्रातिभासिक उत्पन्न नहीं होता, अपितु पुष्पगत लौहित्य ही स्फटिक में भासता है, यह मानकर ऐसे स्थल में अन्यथाख्याति मानकर ही व्यवस्था लगानी चाहिये' बताया है । उसी प्रकार प्रकृत में भी भ्रम में भासमान जो घटाभाव, वह प्राति-भासिकसत्ताक उत्पन्न नहीं होता अपितु भूतल के रूप में जो घटाभाव है और जिसकी अनु-लब्धिप्रमाण से 'इस भूतल के रूप में घट नहीं है, इत्याकारक प्रतीति होती है, उसी घटा-भाव का भूतल में आरोप किया जाता है । अतः यह घटाभाव-भ्रम अन्यथाख्याति ही है । क्योंकि यहाँ पर भी आरोप्य ( भ्रम का विषय ) जो घटाभाव, वह सन्निकृष्ट ही है, और