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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 482 में से

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पृष्ठ 355

अभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९७

जहाँ आरोप्य पदार्थ हमें प्रत्यक्षतः ज्ञात होता है वहाँ अन्यथाख्याति मानने का ही हमारा सिद्धान्त है। अतः कोई दोष नहीं है। भूतलरूप धर्मी का भूतलत्व धर्म से ज्ञान न होकर उसका भूतल के रूप में वर्तमान घटाभाव रूप धर्म से 'यह भूतल घटाभाववत् है' इत्याकारक ज्ञान होना—अन्यथाख्याति है। इसलिये सिद्धान्त में उक्त दोष नहीं आ पाते। क्योंकि अन्यथाख्यातिपक्ष में घटाभाव प्रातिभासिक नहीं होता, अपितु लौकिक (पारमार्थिक, व्यावहारिक) होता है। क्योंकि जहाँ आरोप्यपदार्थ इन्द्रिय से असन्निकृष्ट होता है, वहीं पर प्रातिभासिक वस्तु की उत्पत्ति का हम स्वीकार करते हैं।

शंका—अन्यथाख्याति में 'भ्रमविषयभूत पदार्थ इन्द्रिय-संनिकृष्ट होना चाहिये' आपने बताया है। परन्तु यहाँ घटाभावरूप आरोप्य पदार्थ, इन्द्रिय के साथ संनिकृष्ट कहाँ है? क्योंकि 'अभाव के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष नहीं होता' यह आपने अभी-अभी बताया है। इसी कारण तो अभावाकार वृत्ति की जनक अनुपलब्धि को प्रमाणत्वेन स्वीकार करना पड़ा है। तब यहाँ इन्द्रियसन्निकर्ष के न होने पर भी घटाभाव भ्रमको आप अन्यथाख्याति कैसे कहते हैं? अतः प्रकृत में आप अन्यथाख्याति के द्वारा व्यवस्था नहीं लगा सकते। पूर्व समाधान की इस अरुचि से ही अब घटाभावभ्रमस्थल में घटाभाव की अनिर्वचनीय उत्पत्ति को मानकर ही परम समाधान बताते हैं।

'अस्तु वा प्रतियोगिमति तदभाव-भ्रमस्थले तदभावस्यानिर्वचनीयत्वम्, तथाऽपि तदुपादानं मायैव। न ह्युपादानोपादेयोरत्यन्तसाजात्यम्, तन्तुपटयोरपि तन्तुत्व-पटत्वादिना वैजात्यात्। यत्किञ्चित्साजात्यस्य मायाया अनिर्वचनीय^२त्वस्य घटाभावस्य च मिथ्यात्वधर्मस्य विद्यमानत्वात्। ^३अन्यथा व्यावहारिक^४घटाद्यभावं प्रति कथं मायोपादानमिति कुतो नाशङ्केथाः ?।

**अर्थ—**अथवा प्रतियोगिमद् भूतल पर उसके (प्रतियोगी) अभाव का जो भ्रम होता है, वहाँ पर उस अभाव को भले ही अनिर्वचनीयत्व रहे (वह अभाव अनिर्वचनीय


१. आरोप्यसन्निकर्षस्थले अन्यथाख्यातिः स्वीक्रियते चेत् लब्धप्रसरा भवन्तीयमन्यथाख्यातिः सर्वत्रैव दुर्वारा भविष्यति। तथाचोक्तं तन्त्रवार्तिके—'प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः। नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे'॥ तथाच अनिर्वचनीयख्यातेर्लोप एव स्यादित्याशंकया मायायाः भावत्वमङ्गीकरोति सिद्धान्तीत्याशयः। अनिर्वचनीयमात्रं प्रति माया उपादानमस्ति, नान्यत्।
२. 'यघटा'—इति पाठान्तरम्।
३. भावाऽभावत्वेन विजातीययोः उपादानोपादेयभावानभ्युपगमे सतीत्यर्थः।
४. 'कं घटाभावं'—इति पाठान्तरम्।