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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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२९८ | वेदान्तपरिभाषा | अभावस्य मायोपादानकत्वम्

भले ही हो ) तथापि उसका उपादान कारण माया ही है क्योंकि उपादानकारण और उपादेय ( कार्य ) का अत्यन्त साजात्य ( सादृश्य ) रहना चाहिये—यह कोई नियम नहीं है । क्योंकि तन्तु और पट ये कारण-कार्यरूप पदार्थ भी तन्तुत्व और पटत्व धर्म से विजातीय ही हैं । यत्किंचित ( कुछ अंश में ) ( कार्य-कारण का ) सादृश्य यदि कहो तो मिथ्यात्व धर्म का सादृश्य, माया और अनिर्वचनीय घटाभाव में भी है। यह न माने तो माया को व्यावहारिक ( लौकिक ) घटाभाव का उपादानत्व कैसे ? यह शंका तुमने क्यों नहीं की ?

विवरण—सिद्धान्ती कहता है—'भ्रमस्थल में घटाभाव इन्द्रियसन्निकृष्ट न होने से अन्यथाख्याति नहीं मानी जा सकेगी' यह तुम्हारा कहना हो तो हम भी यहाँ प्रतियोगिमत् ( घटादिमत् ) भूतल पर जो घटाभाव भासता है, उसे अन्यथाख्याति नहीं मानते, किन्तु शुक्तिरजत के तुल्य अनिर्वचनीय घटाभाव ही उस समय उत्पन्न होता है—कहते हैं और आपने जो विकल्प किया था कि इस घटाभाव का उपादान माया है या नहीं ? उसमें हम प्रथम पक्ष का ही स्वीकार करते हैं अर्थात् उसका ( अनिर्वचनीय घटाभाव का उपादान माया ही है। अन्यथाख्याति के न मानने पर भी हमारे मत में दोष नहीं आता ।

'माया को उपादान कारण मानने पर 'माया' संज्ञक भावरूप पदार्थ से 'अनिर्वचनीय घटाभाव' यह अभावरूप कार्य नहीं हो सकता । यह अनुपपत्तिरूप दोष इस पक्ष में आता है।' यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि कारण, अपने सजातीय ( अपने जैसा ही ) कार्य को ही पैदा करता है, इसलिये कार्यकारण के सादृश्य की अपेक्षा रखनेवाले आप से हम ( सिद्धान्ती ) प्रश्न करते हैं कि कार्य-कारण का अत्यन्त साजात्य ( एकजातित्व ) होना चाहिये, या यत्किञ्चित् साजात्य होना चाहिये ? प्रथम पक्ष ( अत्यन्त साजात्य ) का तो संभव ही हो नहीं सकता । तन्तु और पट ये कारण और कार्यरूप पदार्थ, द्रव्यत्व या पृथ्वीत्व धर्म से तो सजातीय हो सकते हैं । परन्तु तन्तु में तन्तुत्व जाति रहती है, वह पट में नहीं, और पट में पटत्व जाति ( धर्म ) रहती है, वह तन्तु में नहीं । अतः कार्यकारण के साजात्य के प्रसिद्ध उदाहरण तन्तुपट में भिन्न धर्म के कारण विजातीयता प्राप्त होती है, इस कारण तन्तु और पट भी विजातीय होने से उनमें भी कार्यकारण-नहीं हो सकेगा । दूसरी बात यह भी है कि कार्यकारण अत्यन्त सजातीय यदि हों तो उनका कार्यकारणभाव ही नष्ट हो जायगा । तस्मात् अत्यंत साजात्य पक्ष सर्वथा अनुपपन्न है ।

अब द्वितीय पक्ष ( यत्किचित्साजात्य कुछ अंशों में सादृश्य ) को यदि आप स्वीकृत करें तो वह हमें भी इष्ट है ।

तन्तु और पट में जैसे शुक्लत्वादि सादृश्य होता है वैसे भावरूप 'माया' कारण का 'घटाभाव' इस अभावरूप कार्य से किसी प्रकार का सादृश्य नहीं बनता, तब प्रकृत में आप इनमें कार्यकारणभाव कैसे मानते हैं ? इस प्रश्न पर उत्तर यह है कि अनिर्वचनीय