वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभावस्य मायोपादानकत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः २९१
घटाभावरूप कार्य का और मायारूप कारण का 'मिथ्यात्व' यह समान ( सजातीय ) धर्म है। इसलिये 'मिथ्यात्व' धर्म से ही माया और घटाभाव में साजात्य है। अतः वे भावत्व और अभावत्व धर्म से विजातीय होने पर भी मिथ्यात्व धर्म से तो सजातीय हैं ही। इसलिये उनमें कार्यकारणभाव बन जाता है। अतः अनिर्वचनीय घटाभाव को मानकर उसका कारण 'माया' ही है।
इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—
'न च विजातीययोरप्युपादानोपादेयभावे ब्रह्मैव जगदुपादानं स्यादिति वाच्यम्। प्रपञ्च-विभ्रमाधिष्ठानत्वरूपेण^२ तस्येष्टत्वात्^३। परिणामित्व-रूपस्योपादानत्वस्य निरवयवे ब्रह्मण्यनुपपत्तेः। तथा^४ च प्रपञ्चस्य परिणाम्युपादानं माया, न ब्रह्म इति सिद्धान्त इत्यलमतिमसङ्गेन।
**अर्थ—**विजातीय पदार्थों में भी यदि कार्यकारणभाव को आप स्वीकार करते हैं तो ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण मान लीजिये 'माया' को मानने की क्या आवश्यकता ? परन्तु यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि प्रपञ्चरूप विभ्रम के अधिष्ठानत्व स्वरूप से ब्रह्म में जगदुपादानत्व हमें इष्ट ही है। प्रपञ्च का परिणामि उपादानकारण ब्रह्म नहीं हो सकता क्योंकि परिणामित्वरूप उपादानकारणत्व की निरवयव ब्रह्म में अनुपपत्ति है। इसलिये प्रपंच का परिणामि उपादान कारण माया है, ब्रह्म नहीं—ऐसा वेदान्त सिद्धान्त है। अतः इस वादविवाद के—अतिप्रसंग को अब यहीं समाप्त करते हैं।
**विवरण—**विजातीय पदार्थों में कार्यकारणभाव के न बन सकने से चेतनब्रह्म, अचेतन जगत् का कारण नहीं होता—यह हम कहते हैं, परन्तु आप यदि विजातीय पदार्थों में भी यत्किञ्चित्साजात्य से—उपादानोपादेयभाव ( कार्यकारणभाव ) मानते हैं
१. विजातीययोः उपादानोपादेयभावाभ्युपगमे ब्रह्मैव जगतः उपादानं भवेत्, माया न भवेत्, तदा सिद्धान्त विरोधः स्यादित्याशंकाऽत्रोत्पद्यते। २. 'रूपस्य' इति पाठान्तरम्। ३. ब्रह्म, जगतः उपादानमिति त्विष्टमेव। उपादानं तावत् द्विविधं—विवर्तोपादानं परिणाम्युपादानञ्चेति। तत्र विवर्तोपादानत्वं ब्रह्मण्येव अभिमतं न मायायाम्। ब्रह्मणि परिणाम्युपादनत्वं न संभवति, यतः अवयवान्यथाभाव एव परिणामः। निरवयवे ब्रह्मणि तदयोगः। ४. भ्रमोपादानभूतस्य अज्ञानस्य विषय एव अधिष्ठानं भवति। जडभूताया मायाया अज्ञानविषयत्वाभावेन भ्रमाधिष्ठानत्वायोगाद् विवर्तोपादानत्वस्य संभावाभावेऽपि त्रिगुणात्मकत्वात् परिणाम्युपादानत्वं संभवितुमर्हति।