भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 358
३००वेदान्तपरिभाषा[ अभावस्य चातुर्विध्यम् ]

तो ब्रह्म को ही समस्त जगत् का उपादान कारण क्यों नहीं मानते ? माया को उपादान मानकर बीच में माया की निरर्थक कल्पना क्यों करते हैं ? यह पूर्वपक्षी का कहना है।

'प्रपञ्च०' इत्यादि ग्रंथ से सिद्धान्ती उत्तर देता है कि यह तो हमें इष्ट है कि 'ब्रह्म प्रपञ्च का उपादान कारण है,' पर वह परिणामि उपादान नहीं है, किन्तु प्रपञ्च-भ्रमाधिष्ठान रूप 'विवर्तोपादान' है। उपादान तीन प्रकार का होता है—आरंभि, परिणामि, विवर्ति । उनमें से तन्तु, पट के आरंभोपादान हैं ऐसा नैयायिक कहते हैं। दूध जैसे दही का कारण है—ऐसे कारण को परिणामि उपादान, सांख्य मानते हैं। और हम वेदान्तियों के मत में रज्जु जैसे सर्प-भ्रम का अधिष्ठान है अर्थात् अधिष्ठान के रूप में रज्जु सर्पभ्रम का उपादानकारण है—वह विवर्तोपादान का कारण है। अतः सच्चिदानन्द ब्रह्म में उसको सत्ता से भासमान जगद्रूपी मिथ्या-प्रपंच का ब्रह्म, अधिष्ठान हैं अर्थात् विवर्तोपादान हैं।

अब ब्रह्म के विवर्तोपादान होने पर भी कार्य के लिये आवश्यक 'परिणामि उपादानत्व' ब्रह्म में नहीं संभव हो सकता, क्योंकि परिणाम ( पूर्वरूप को छोड़कर दूसरे रूप की प्राप्ति ) सावयव वस्तु का ही हुआ करता है। अवयवों के उपचयापचय से ही ( वृद्धि और ह्रास ) परिणाम होता है। परन्तु ब्रह्म में अवयव नहीं है, इसलिये निरवयव ब्रह्म में अवयव-विकृतिरूपी परिणाम सम्भव नहीं। इस कारण, प्रपंच के परिणाम्युपादान के रूप में माया का ( भावरूप अज्ञान का ) स्वीकार अवश्य करना पड़ता है। एवं च ब्रह्म, प्रपञ्च का परिणामि-उपादान नहीं, किन्तु माया ही उसका परिणामि-उपादान है। तस्मात् हमारे मत में ब्रह्म में परिणाम्युपादान मानने का तथा माया की व्यर्थता आदि का कोई दोष प्राप्त नहीं हो पाता।

अभाव-भ्रम कैसे होता है ? इस प्रासंगिक शंका के उठने से कार्य-कारण के सजातीय, विजातीय भाव का निरूपण करना पड़ा। अब मुख्य अनुपलब्धि रूप प्रकृत विषय के प्रतिपादनार्थ ग्रन्थकार कहते हैं कि इस अतिप्रसंग की ( प्रासंगिक विषय के निरूपण-रूपी विषयान्तर की ) चर्चा बहुत हुई। अब प्रकृत अनुपलब्धि प्रमाण का ही निरूपण करें।

इस प्रकार अनुपलब्धि प्रमाण के लक्षण आदि बताये। अब इस अनुपलब्धि के द्वारा जिसका प्रत्यक्ष होता है, उस प्रमेयभूत-अभाव का निरूपण करने के लिये अभाव के भेद बताते हैं।

स चाभावश्चतुर्विधः—प्रागभावः प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्योन्याभावश्चेति । तत्र¹ मृत्पिण्डादौ कारणे कार्यस्य घटादेरुत्पत्तेः पूर्वं योऽभावः स प्रागभावः, स च भविष्यतीति प्रतीतिविषयः ।


१. अभावचतुष्टयघटकः स प्रागभावः, यः घटादेरुत्पत्तेः पूर्वं मृत्पिण्डादौ कारणे कार्यस्य अभावः इति विज्ञेयः ।