वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०१
अर्थ—वह अभाव चार प्रकार का है। प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव। इनमें से मृत्पिण्डादि कारणों में घटरूप कार्य का उत्पत्ति से पूर्व जो अभाव वह प्रागभाव है। वह 'भविष्यति' होगा--इत्याकारक प्रतीति का विषय होता हैं।
विवरण—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव-इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के प्रमेयभूत अभाव के चार भेद होते हैं। उनमें से प्रागभाव का स्वरूप इस प्रकार है—प्राक् ( कार्य उत्पन्न होने के पूर्व ) उस कार्य का जो अभाव रहता है उसे प्रागभाव कहते हैं। जैसे—घटरूप कार्य उत्पन्न होने के पूर्व जो घटाभाव वह घट-प्रागभाव है। प्रागभाव, कार्य के उपादान कारण में रहता है। घटरूप कार्य का अभाव मृत्पिण्डरूप कारण में रहता है। क्योंकि प्रागभाव की प्रतीति 'भविष्यति' यहां कार्य होगा—इस प्रकार से मृत्पिण्ड में ही होती है। उस प्रतीति की उपपत्ति के लिये ही प्रागभाव का स्वीकार करना पड़ता है। मृत्पिण्ड के अतिरिक्त तन्तु आदि कारणों में 'यहाँ घट होगा' ऐसी प्रतीति नहीं होती, इसलिये घट का प्रागभाव मृत्पिण्ड में ही रहता है—यह मानना होगा। इस प्रकार कार्य उत्पन्न होने से अव्यवहित पूर्वक्षण तक कार्य का कारण में जो अभाव प्रतीत होता है, वह प्रागभाव है।
अब प्रध्वंसाभाव का निरूपण करते हैं—
'तत्रैव घटस्य मुद्गर-पातानन्तरं योऽभावः स^२ प्रध्वंसाभावः ; ध्वंसस्यापि^३ स्वाधिकरणकपालनाशे नाश एव। न^४ चैवं घटोन्मज्जनापत्तिः, '^५घटध्वंसस्यापि घटप्रतियोगिक-ध्वंसत्वात्। अन्यथा प्रागभावध्वंसात्मक-घटस्य^६ विनाशे प्रागभावोन्मज्जनापत्तिः।
अर्थ—वहीं पर ( मृत्पिण्ड में ) घट का मुद्गरपात के अनन्तर जो अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। ध्वंस का भी ( प्रध्वंसाभाव का ) अपने अधिकरणभूत कपाल के नाश होने पर नाश होता ही है। इस प्रकार ध्वंस का ध्वंस मानने पर घट का ध्वंस
१. तत्रैव मृतपिण्डे एव घटस्य यः अभावः प्रतियोगितासंबंधेन घटजन्यः योऽभावः इति विज्ञेयम्। तेन प्रतियोगिजन्याभावत्वं ध्वंसत्वमिति फलति। २. यत्तु नैयायिकाः—ध्वंसोऽपि नित्य एवेति वदन्ति, तन्निरसनार्थं 'ध्वंसस्यापी'ति ग्रंथो बोद्धव्यः। आश्रयनाशे आश्रितनाशनियमो वर्तते। ३. ध्वंसे ध्वंसध्वंसे च एकम्प्रतियोगितावच्छेदकम्। ४. 'सध्वंसा०'-इति पाठान्तरम्। ५. 'न च घटो०'-इति पाठान्तरम्। ६. 'स्यनाशे०'-इति पाठान्तरम्।