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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 482 में से

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पृष्ठ 360

३०२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ध्वंसस्य विनाशित्वम् ]

नष्ट होने के कारण पुनः घट उत्पन्न होने का प्रसंग प्राप्त होगा। परन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस (नाश) होता है वह घटप्रतियोगिक ही रहता है अर्थात् उसका प्रतियोगी घट ही होता है। अन्यथा प्रागभावध्वंस रूप जो घट उसका विनाश होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—मानना पड़ेगा।

विवरण—कार्यनाश के अनन्तर जो उसका अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। प्रागभाव के समान ही प्रध्वंसाभाव का भी अधिकरण, कार्य का उपादान कारण ही होता है। जैसे—उसी-मिट्टी के घट पर एक मुद्गर मारने पर वह फूट जाता है अर्थात् उस मृत्तिका को जो घट का आकार प्राप्त हुआ था वह नष्ट होता है। घटादिकों के इस ध्वंस को ही प्रध्वंसाभाव कहते हैं। उसका आधार घट के उपादान कारण कपाल ही हैं। क्योंकि कपाल की ओर देखकर ही 'यह घट नष्ट हुआ' यह प्रतीति होती है। इसलिये इस प्रध्वंसाभाव का अधिकरण भी घट का उपादान कारण मृत्तिका ही है। 'घटो ध्वस्तः' ही प्रध्वंसाभाव की प्रतीति होती है। 'सादिरनन्तःप्रध्वंसः'—सादि (उत्पत्तिमान्) होता हुआ जो अनन्त (नाशरहित) अभाव—वह प्रध्वंसाभाव, ऐसा नैयायिकों का मत है अर्थात् वे कहते हैं कि प्रध्वंसाभाव का कभी नाश नहीं होता। इसका निरसन 'ध्वंसस्यापि०' ग्रन्थ से किया जा रहा है। प्रध्वंसाभाव को विनाशरहित नहीं मान सकते। क्योंकि यह मानने पर प्रध्वंसाभाव एवं ब्रह्म ऐसे दो पदार्थ अविनाशी सिद्ध होंगे उससे द्वैतापत्ति होगी। इसलिये प्रध्वंसाभाव का जिस—मृत्तिकादि अधिकरण में ध्वस्तः' इत्याकारक प्रत्यय (बोध) होता है, उस मृत्तिकादि उपादान कारण का नाश होने पर उसमें स्थित घटध्वंस का भी ध्वंस (नाश) मानना होगा। क्योंकि ध्वंस के अधिकरण (आधार का ही नाश होने पर निराधार ध्वंस की स्थिति संभव नहीं। एवं कपालों के भी नाश होने पर वहां 'घटो ध्वस्तः' की प्रतीति भी नहीं होती। इस कारण ध्वंस के आधारभूत कपालों के नाश होने पर उस पर स्थित प्रध्वंस का भी ध्वंस मानना युक्त है।

शंका—ध्वंस का भी ध्वंस मानने पर पुनः घटोत्पत्ति का प्रसंग आवेगा। क्योंकि घटनाश (घटाभाव) का ध्वंस (अभाव) अर्थात् घटाभाव का अभाव घटस्वरूप ही होगा। जैसे—तेज के अभाव (तम) का अभाव अर्थात् तेज ही है, इसी तरह घटध्वंस था तब तक घट का अभाव था, परन्तु वह ध्वंस, का कारण के नाश से नष्ट होता है, ऐसा कहने पर वही घट पुनः उत्पन्न होता है; यही कहना होगा।

समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस होता है उसका प्रतियोगी घटध्वंस नहीं होता, किन्तु घट ही होता है। अर्थात् घटाभावरूप ध्वंस का जैसे घट प्रतियोगी होता है वैसे ही घटध्वंस के (अभाव) का भी वह प्रतियोगी होता है। इस कारण दूसरा अभाव, प्रथम अभाव के प्रतियोगी स्वरूप होता है—इस नियम के होने पर भी प्रकृत में अनुभवानुसार घटध्वंस के ध्वंस का प्रतियोगी घट को ही मानने