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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 482 में से

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पृष्ठ 361

ध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०३

पर यह आपत्ति नहीं आती क्योंकि हम आप से यह पूछते हैं कि कार्य तो प्रागभाव-ध्वंसरूप होता है। अर्थात् घटप्रागभाव-ध्वंस ही घट है, यह आप मानते ही हैं। तब घट प्रागभावध्वंसरूप घट पदार्थ का ध्वंस होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—ऐसा क्यों नहीं मानते ? और ऐसा मानने पर घट के नष्ट होने पर 'इन कपालों का घट होगा' ऐसी प्रागभाव की प्रतीति होनी चाहिये, परन्तु अनुभव तो ऐसा होता नहीं। इसलिये मूलध्वंस का जो प्रतियोगी होता है वही ध्वंस के ध्वंस का भी प्रतियोगी होता है—यह अनुभवानुसार मानना ही चाहिये। अर्थात् घट का मुद्गरपात के अनन्तर कपाल रूप ध्वंस होता है और उसका भी कपालनाश के अनन्तर जो ध्वंस होता है, वह घट का ही चूर्णरूप से ध्वंस है, इसी प्रकार घटध्वंस-ध्वंसस्थल में भी 'घटो विनष्टः' घट नष्ट हुआ—यही प्रतीति होती है। इसी प्रकार प्रागभाव के ध्वंस रूप घट का जो नाश होता है, उसका भी प्रतियोगी प्रागभाव ही समझना चाहिये। इस कारण प्रागभाव की उत्पत्ति का प्रसंग भी नहीं आता। ध्वंस का ध्वंस मानने पर भी एक दूसरी आपत्ति आती है—इस प्रकार वादी की शंका और उसका समाधान अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—

न^१ चैवमपि यत्र ध्वंसाधिकरणं नित्यं तत्र कथं ध्वंसनाश इति वाच्यम्। तादृशाधिकरणं^२ यदि चैतन्यव्यतिरिक्तं, तदा तस्य नित्यत्वमसिद्धम्, ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य ब्रह्मज्ञान-निवर्त्यतया वक्ष्यमाणत्वात्। यदि च ध्वंसाधिकरणं चैतन्यं, तदाऽसिद्धिः, आरोपित-प्रतियोगिक-ध्वंसस्याधिष्ठाने प्रतीयमानस्याधिष्ठानमात्रत्वात्। तदुक्तम्^३ —


१. ननु सर्वस्यापि ध्वंसस्य अनित्यत्वमुत यस्य कस्यचित् ? नाद्यः नित्यस्य अधिकरणस्य नाशाऽसिद्धया तद्वृत्तिध्वंसस्य अनित्यत्वाऽसिद्धेः। यतः इदानीं घटो नष्टः, अन्तरिक्षे घटो नष्टः इत्यादौ कालाकाशादीनां ध्वंसाधिकरणत्वं विज्ञायते, तयोश्च नित्यत्वमिष्यते नैयायिकादिभिः। नाऽपि द्वितीयः, नित्याधिकरणकध्वंससामान्यात्सर्वस्यापि नित्यत्वाश्रयणौचित्यात् इति शंकाकर्तुराशयः।

२. आरोपितप्रतियोगिकध्वंसस्य अधिष्ठानमात्रत्वे सुरेश्वराचार्यवचनं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यते। ननु अधिकरणपदेन आधारस्वरूपं विवक्षितम् उत स्वजनकाज्ञान विषयत्वरूपाधिष्ठानत्वम्। आद्ये तादृशनित्यपदार्थाऽप्रसिद्धिः, द्वितीये आधारनाशस्यैव ध्वंसनाशसामग्रीत्वान्न कोऽपि दोषः इति 'तादृशाधिकरणम्'त्यादिग्रन्थेनोच्यते।

३. यथा व्यावहारिकस्य नाशः अधिष्ठानरूपः तथैवेत्यर्थः।