वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | वेदान्तपरिभाषा | [ ध्वंसस्य विनाशित्वम् |
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^१ 'अधिष्ठानावशेषो हि नाशः कल्पितवस्तुनः, । इति । 'एवं शुक्तिरूप्य-विनाशोऽपीदमवच्छिन्नं ^२चैतन्यमेव ।
**अर्थ—**ऐसा मानने पर भी जहां ध्वंस का अधिकरण नित्य होता है वहाँ उस ध्वंस का नाश कैसे होता है ? परन्तु यह शंका करना ठीक नहीं है । क्योंकि वैसा अधिकरण चैतन्य के अतिरिक्त ( भिन्न ) यदि हो तो उसमें नित्यत्व असिद्ध हैं । क्योंकि ब्रह्म से भिन्न समस्त जगत् में ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यत्व ( ब्रह्मज्ञान से निवृत्त होने की योग्यता ) है, ऐसा आगे बतावेंगे । और वह ध्वंसाधिकरण यदि चैतन्य ही हो तो ( उस ध्वंस में नित्यत्व की असिद्धि है । क्योंकि जिसका ( ध्वंस का ) प्रतियोगी आरोपित ( मिथ्या ) होता है, ऐसे अधिष्ठान में प्रतीयमान ध्वंस, अधिष्ठानस्वरूप रहता है । इसलिए अभियुक्तों का वचन है कि 'कल्पित वस्तु का नाश, अधिष्ठानावशेष ( जिसमें केवल अधिष्ठान अवशिष्ट रहता है ) रहता है' । इस प्रकार शुक्तिरूप्य का विनाश भी 'इदम्वृत्ति' से अवच्छिन्न चैतन्य ही है ।
**विवरण—**ध्वंस का ( प्रध्वंसाभाव का ) जो अधिकरण कपाल के समान अनित्य होता है, उस अधिकरण का ( कपाल का ) ध्वंस होने पर तन्निष्ठ घटध्वंस का भी ध्वंस होता है । इस कारण घटादि पदार्थों का ध्वंस नित्य न होकर विनाशी होता है । इसलिये उस ध्वंस के नित्यत्व के प्राप्त न होने पर भी जिस ध्वंस का अधिकरण नित्य रहता है उसका ध्वंस = नाश नहीं होता । क्योंकि नित्य-अधिकरणस्थित ध्वंस का नाश कैसे हो सकेगा ?
**उदाहरण—**आकाश नित्य है, उस आकाश में होने वाला जो-आकाशकार्यभूत शब्द का ध्वंस, उसका नाश कैसे संभव होगा ? क्योंकि उसके अधिकरणभूत आकाश का कभी नाश ही नहीं होता । और प्रतियोगी के उपादानकारण का नाश होने पर उस ध्वंस का भी नाश आप बताते हैं । तो जब कि आकाश का नाश ही नहीं होता तो उस ध्वंस का भी नाश कैसे होगा ? इसलिये ऐसे शब्दादिकों के ध्वंस में अविनाशित्व ही आपको मानना चाहिए । तब ध्वंस और ब्रह्म दोनों नित्य पदार्थ सिद्ध होने से द्वैतापत्ति होती है । एवं ब्रह्म में समस्त जगत् का लय ( नाश ) भी आप मानते हैं, तब अधिष्ठानभूत ब्रह्म नित्य होने से तन्निष्ठ जगत् का ध्वंस भी नित्य ही होगा, जिससे प्रलयावस्था में ब्रह्म और जगत् का ध्वंस दो पदार्थ मानने होंगे । उस कारण 'एकमेवाद्वितीय; ब्रह्म के अद्वैत का बाध होता है इस आशय से वादी ने 'यत्र०' इत्यादि वाक्य से शंका कर कोटि की है । इस पर धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं—'जिस ध्वंस का अधिकरण नित्य होता है, तन्निष्ठ ध्वंस का नाश कैसे होगा' यह आप जिस अधिकरण को उद्देश्य कर कहते हैं वह ध्वंस का नित्य
१. 'शमधिः'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'न्नचैः'-इति पाठान्तरम् ।