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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 482 में से

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पृष्ठ 363

अत्यन्ताभावलक्षणम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०५


अधिष्ठान, चैतन्य से भिन्न विवक्षित है या चैतन्य रूप ब्रह्म ही जगत् के ध्वंस का आधार होने से 'जगत् के ध्वंस में नित्यत्व प्राप्त होगा' यह विवक्षित है। इसमें प्रथम पक्ष तो बन नहीं सकता। क्योंकि एक चैतन्यस्वरूप ब्रह्म को छोड़ संसार के किसी भी पदार्थ में अविनाशित्व नहीं है। क्योंकि ब्रह्म में कल्पित जगत् की, ब्रह्मज्ञान से निवृत्ति (बाध, नाश) होती है—यह हम विषय परिच्छेद में बतावेंगे। इस कारण आकाशनिष्ठ शब्द-ध्वंस में या 'अन्तरिक्ष में घट का ध्वंस हुआ' इस रीति से आकाश में प्रतीयमान घटध्वंस में नित्यत्व प्राप्त होने की आपत्ति हमारे पक्ष में नहीं हो पाती।

अब द्वितीय पक्ष (चैतन्य ही ध्वंस का अधिकरण है) का स्वीकार करें तो 'जगत् के ध्वंस में नित्यत्वापत्ति होगी' यह कथन नहीं बन सकेगा। क्योंकि जिस ध्वंस का प्रतियोगी आरोपित (मिथ्या) होता है, ऐसा ध्वंस, जो कि अधिष्ठानरूप से भासित होता है, वह अधिष्ठानरूप ही होता है। उदाहरणार्थ—शुक्ति में 'यह रजत है' यह मिथ्या रजत का ज्ञान होता है। परन्तु वह ज्ञान, उस पदार्थ को भलीभांति देखने पर बाधित हो जाता है ओर 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार उसके विपरीत ज्ञान होता है, अर्थात् इस ज्ञान में पूर्वभासित रजत नष्ट हुआ—यह अनुभव होता है। यहाँ रजतध्वंस का प्रतियोगी जो रजत, वह मिथ्या होने से उसका नाश, अर्थात् उस रजत का अधिष्ठान 'इदम्' इस आकार से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही है। इसी प्रकार जगत् मिथ्या है और ब्रह्म उस जगदाकार भ्रम का अधिष्ठान है। उस ब्रह्म में जगत् का जो ध्वंस होता है, वह अधिष्ठानरूप (ब्रह्मरूप) होता है, पृथक् नहीं। क्योंकि चैतन्यात्मक ब्रह्म में चैतन्यात्मकता का अभाव भासित होना ही प्रपञ्चभान है। प्रपञ्चध्वंस के समय उस चैतन्यात्मकता के अभाव का अभाव होता है, इसी कारण चैतन्यात्मकता भासती है। अत एव सुरेश्वराचार्य ने कहा है कि 'कल्पितवस्तु का नाश अधिष्ठानरूप होता है'। इस कारण चैतन्य में होनेवाले ध्वंस में भी नित्यत्व प्राप्त नहीं होता। इसी तरह रज्जु पर भासमान सर्प के ध्वंस को भी रज्जु से अवच्छिन्न चैतन्य ही समझना चाहिये। तस्मात् हमारे पक्ष में द्वैतापत्ति या उक्त दोष नहीं हो पाता।

अब क्रमशः प्राप्त अत्यन्ताभाव का निरूपण करते हैं—

यत्राधिकरणे यस्य कालत्रयेऽप्यभावः, सोऽत्यन्ताभावः। यथा वायौ रूपात्यन्ताभावः। $^{१}$सोऽपि $^{२}$घटादिवद् ध्वंसप्रतियोग्येव।


१. नैयायिकसम्मतमत्यन्ताभावस्य नित्यत्वं खण्डयति 'सोऽपी'त्यादिग्रन्थेन। अत्यन्ताभावस्य नश्वरत्वेऽपि तस्य नित्यत्वप्रसिद्धिः वियदादिवत् बहुकालस्थायित्वेनोपपद्यते। यथा वियदादिकं प्रलयकालध्वंसप्रतियोगी, तथा अत्यन्ताभावोऽपि प्रलयकालध्वंसप्रतियोगी। एवं च आकाशाधिकरणस्य नाशात् यथा आकाशस्य नाशः तथा अत्यन्ताभावाधिकरणस्य नाशात् अत्यन्ताभावस्यापि नाशः।
२. 'वियदादिवत्'—इति पाठान्तरम्।