भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

३०६ वेदान्तपरिभाषा [ अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम्

अर्थ—जिस अधिकरण में जिसका कालत्रय में भी ( तीनों काल में ) अभाव रहता है, उसे ( अभाव को ) अत्यन्ताभाव कहते हैं। जैसे-वायु में रूप का अत्यन्ताभाव है, वह भी घटादि के समान ध्वंस का प्रतियोगी ही होता है।

विवरण—जहाँ पर जिस वस्तु की तीनों काल में प्रतीति न होती हो, वहाँ उस वस्तु का अत्यन्ताभाव समझना चाहिये। यहाँ के 'सोऽत्यन्ताभावः' से पूर्व 'तत्र' पद का अध्याहार करना चाहिये और 'स:' पद का 'तदीय' = उसका--अर्थ समझना चाहिये। तीनों काल में वर्तमान जो अभाव, उसे अत्यन्ताभाव कहते हैं।

नैयायिक अत्यन्ताभाव के उदाहरण में 'इह भूतले घटो नास्ति' = इस भूतल पर घट नहीं है; देते हैं, पर वह सर्वसम्मत न होने से निर्विवाद उदाहरण ग्रंथकार ने बताया है। वायु में रूप किसी काल में भी नहीं होता, इसलिये वायु में जो रूप का अभाव, वह अत्यन्ताभाव है। 'यहाँ अमुक नहीं' इस आकार में ही अत्यन्ताभाव की प्रतीति होती है। तार्किक अत्यन्ताभाव को नित्य मानते हैं, उसका निरसन करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—घटादि पदार्थ जैसे ध्वंस के प्रतियोगी होते हैं ( उनका ध्वंस होता है ), वैसे ही अत्यन्ताभाव भी ध्वंसप्रतियोगी ही है। उसका भी प्रलयकाल में ध्वंस ( नाश ) होता ही है। इस कारण ध्वंसाप्रतियोगित्वरूप नित्यत्व अत्यन्ताभाव में नहीं होता। कुछ पुस्तकों में 'घटादिवत्' के स्थान में 'वियदादिवत्' पाठ है, वह उचित है। क्योंकि जिस प्रकार 'वियदादिक' ( आकाशादिक ) पदार्थ यावत् प्रपंचभावी हैं, किन्तु प्रलयकाल में नष्ट होते हैं, उसी प्रकार यह अत्यन्ताभाव भी जब तक जगत् है तब तक ही रहता है, और प्रलयावस्था में समस्त पदार्थों का ध्वंस होने पर उन पर अवलम्बित होकर रहने-वाले अत्यन्ताभाव का नाश होता ही है। प्रलयकाल में ब्रह्मातिरिक्त सत्ता ही नहीं होती।

अन्योन्याभाव का स्वरूप बताते हैं—

इदमिदं नेति प्रतीतिविषयोऽन्योऽन्याभावः । अयमेव विभागो भेदः पृथक्त्वं चेति ¹व्यवह्रियते । भेदातिरिक्तविभागादौ प्रमाणाभावात् । अयं चान्योऽन्याभावोऽधिकरणस्य सादित्वे सादिः, यथा घटे पटभेदः । अधिकरणस्यानादित्वेऽनादिरेव², यथा जीवे ब्रह्मभेदः,


१. 'व्यपदिश्यते'-इति पाठान्तरम् ।
२. अन्योन्याभावाधिकरणस्य अन्योन्याभावप्रतियोगिनश्च सादित्वे अन्योन्याभावस्य सादित्वम् । यथा—'घटे पटभेद:' । अत्र भेदाधिकरणस्य घटस्य उत्पत्तिमत्त्वात् पटप्रतियोगिकभेदस्योत्पत्तिमत्त्वम् । जीवब्रह्मणोश्चानादित्वात् तत्प्रतियोगिकतदधिकरणभेदस्य अनादित्वम् । एवं जीवेशादिभेदोऽपि अनादिरेव । सादिरनादिर्द्विविधोऽपि भेदः विनाशी वर्तते यतः अविद्याकल्पितानामविद्यानिवृत्तौ निवृत्तिः ।