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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 482 में से

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पृष्ठ 365

अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०७

ब्रह्मणि¹ वा जीवभेदः । द्विविधोऽपि भेदो² ध्वंसप्रतियोग्येव, अविद्याया- निवृत्तौ तत्परतन्त्राणां निवृत्त्यवश्यम्भावात् ।

अर्थ—'यह, यह नहीं' ऐसी प्रतीति का विषय जो अभाव, वह अन्योन्याभाव है। विभाग, भेद, पृथक्त्व शब्दों से इसी का व्यवहार होता है। क्योंकि विभागादिकों को भेद से (अन्योन्याभाव से) पृथक् मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इस अन्योन्याभाव का अधिकरण यदि सादि (उत्पत्तिमत्) हो तो वह सादि (उत्पत्तिमान्) होता है। जैसे—घट में पट का भेद। परन्तु अधिकरण यदि अनादि हो तो वह भी अनादि ही होता है। जैसे—जीव में ब्रह्म का भेद या ब्रह्म में जीव का भेद। यह दोनों प्रकार का भेद ध्वंस का प्रतियोगी (विनाशी) होता है। क्योंकि मूल अविद्या की निवृत्ति होने पर उसके अधीन रहनेवाले भेदों की निवृत्ति होना अवश्यम्भावी है।

विवरण—'यह घट पट नहीं है' इस रीति से घट में वर्तमान जो पटरूपता का अभाव वह अन्योन्याभाव है। यह ध्यान में रखकर ही 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक' जो अभाव, उसे अन्योन्याभाव, कहते हैं, यह अन्योन्याभाव का लक्षण किया गया है। अत्यन्ताभाव की प्रतियोगिता, घटादि अनेक प्रतियोगियों के संयोग, समवाय आदि अनेक सम्बन्धों से अवच्छिन्न होती है। किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतियोगिता केवल तादात्म्य-सम्बन्ध से ही अवच्छिन्न रहती है। क्योंकि 'यह घट, पट नहीं है' इस स्थल में यह घट स्वरूपतः पट नहीं है, अर्थात् पट-भेद का प्रतियोगी जो पट, उसका स्वयं से (पट से) जैसा तादात्म्य (तद्रूपत्व) है, वैसा घट से नहीं—यही ज्ञान होता है। इस कारण तादात्म्य सम्बन्ध से अवच्छिन्न प्रतियोगितावाला अन्योन्याभाव माना गया है।

अन्योन्याभाव, भेद, विभाग, पृथक्त्व—ये सब पर्याय शब्द हैं। नैयायिकों का कहना है कि विभाग और पृथक्त्व गुण हैं, और वे अन्योन्याभाव से भिन्न हैं। परन्तु यह उचित नहीं है। क्योंकि वैसा मानने में कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ ग्रन्थकार का आशय यह है कि—'घट, पट से विभक्त है' और 'घट, पट से पृथक् है, ये दोनों प्रतीतियाँ क्रमशः विभाग और पृथक्त्व की हैं—ऐसा तार्किक कहते हैं। किन्तु वास्तव में इन दोनों ज्ञानों में कोई वैलक्षण्य नहीं है। अतः वे दोनों वाक्य एक ही प्रतीति की बोधक हैं। जैसे—हस्त और कर—एक ही प्रतीति के पैदा करने वाले शब्दों में भेद होने पर भी उनका अर्थ एक ही रहता है वैसे ही विभाग और पृथक्त्व शब्दों के अर्थ में भी एकता समझनी चाहिये। इसलिये विभाग और पृथक्त्व को परस्पर भिन्न एवं गुण नहीं कह सकते।


१. 'णिजीव'—इति पाठान्तरम् ।
२. भेदोऽपि नश्वर एवेत्यभिप्रायः ।
३. 'द्यानिवृ०'—इति पाठान्तरम् ।