वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम् ] |
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इसी प्रकार पृथक्त्व को भेद से ( अन्योन्याभाव से ) भिन्न मानने में कोई प्रमाण नहीं है । 'घट, पट से पृथक् है' यह पृथक्त्व की प्रतीति और 'यह घट, पट नहीं है' यह अन्योन्याभाव की प्रतीति—इन दोनों में केवल शब्दों की ही विलक्षणता है, उनके अर्थों में कुछ भी भेद नहीं है ।
शंका—ऐसा मानने पर 'इदमस्मात् पृथक्' प्रयोग के समान 'इदमिदं न' प्रतीति के स्थान में 'इदमस्मात् न' प्रयोग भी होने लगेगा।
उत्तर—यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि 'अन्यारादितरर्ते०' ( पाणि० सू० २।३।२९) सूत्र के द्वारा 'अन्य' पद से अन्यार्थक 'पृथक्' इत्यादि पदों का भी ग्रहण किया होने से 'पृथक्' शब्द के योग में जैसे पंचमी का विधान किया गया है वैसे 'न' अव्यय के योग में पंचमी का विधान नहीं किया गया । इस कारण 'न' निपात के योग में 'अस्मात् न' ऐसा पञ्चमी का प्रसङ्ग नहीं आता । अन्य, पृथक्, विभक्त, भिन्न आदि शब्दों में ही भेद है । वस्तुतः ये शब्द अन्योन्याभाव के ही बोधक हैं ।
कुछ अन्योन्याभाव सादि ( उत्पत्तिमान् ) होते हैं और कुछ अनादि ( उत्पत्तिरहित ) होते हैं । जिस अन्योन्याभाव का अधिकरण उत्पत्तिशील होता है, वह अन्योन्याभाव उस अधिकरण की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न होता है । उदाहरण—पट भेद का ( पटान्योन्याभाव का ) अधिकरण घट, सादि ( उत्पत्तिशील है, इसलिये 'घट' उत्पन्न होते ही 'पटभेद' भी उत्पन्न होता है । इस कारण यह भेद सादि है ।
इसके विपरीत जिस अन्योन्याभाव का अधिकरण अनादि होता है वह अन्योन्याभाव भी अनादि ( उत्पत्तिरहित ) होता है । जैसे—जीव, ब्रह्म इत्यादि पदार्थ अनादि होते हैं । क्योंकि—
'जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा ।
अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥'
( जीव, ईश्वर, शुद्धचैतन्य, जीवेश्वर-भेद, अविद्या = माया और उसका—चैतन्य के साथ सम्बन्ध—ये छः पदार्थ वेदान्त मत में अनादि माने गये हैं ) यह वेदान्त सिद्धान्त है ।
इस कारण जीव में 'जीव, ब्रह्म नहीं है' इस प्रकार से प्रतीयमान ब्रह्म भेद या ब्रह्म में भासमान 'ब्रह्म, जीवो न'—ब्रह्म, जीव नहीं है—यह जीवभेद, ये अनादि अन्योन्याभाव हैं । तथापि सादि और अनादि दोनों प्रकार के अन्योन्याभाव नित्य नहीं हैं, अपितु आकाशादि के समान विनाशी ( ध्वंस के प्रतियोगी हो ) हैं । क्योंकि समस्त जगत् की मूलकारण अविद्या की विद्या से निवृत्ति होने पर उसके कार्यभूत ( उसके अधीन रहने वाले ) समस्त भेदों की निवृत्ति होनी ही चाहिये । इस कारण 'नेह नानास्ति किंचन' और 'अहं ब्रह्मास्मि' जानने वाले विद्वान् की दृष्टि से—घट-पट-भेद या 'जीवेश्वर भेद' यह द्विविध भेद भी नहीं है । तस्मात् जीवेश्वर भेद के अनादि होने पर भी—