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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 482 में से

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पृष्ठ 367

सोपाधिकनिरूपाधिकभेदः ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०९

आविद्यक होने से उसका नाश हो ही जाता है। इसलिये पहले जो जीवेश्वर भेद बताया था वह संसारदशा में ही समझना चाहिये।

अन्योन्याभाव के और भेदों को भी बताते हैं।

पुनरपि भेदो द्विविधः—सोपाधिको निरुपाधिकश्चेति। ^१तत्रोपाधिसत्ता-व्याप्य-सत्ताकत्वं सोपाधिकत्वं, तच्छून्यत्वं निरुपाधिकत्वम्। तत्राद्यो यथा—एक^२स्यैवाकाशस्य घटाद्युपाधिभेदेन भेदः। यदा वा^३ एकस्यैव सूर्यस्य जलभाजनभेदेन भेदः। ^४तथा च एकस्यैव ब्रह्मणोऽन्तःकरणभेदाद्भेदः। निरुपाधिकभेदो यथा घटे पटभेदः।

**अर्थ—**फिर भी भेद (अन्योन्याभाव) दो प्रकार का है। सोपाधिक और निरुपाधिक (उसके भेद हैं)। उन दोनों में से जिसकी सत्ता, उपाधि की सत्ता से व्याप्य होती है वह सोपाधिक भेद है। और वैसी सत्ता से रहित जो भेद वह निरुपाधिक भेद है। उनमें से प्रथम भेद का उदाहरण इस प्रकार है—एक ही आकाश का घटादि उपाधियों के भेद से जो (घटाकाश, मठाकाश नहीं है) भेद होता है वह, या एक ही सूर्य का पात्रों (कलशों) के भेद से जो भेद होता है वह सोपाधिक भेद है। इसी प्रकार एक ही ब्रह्म का अन्तःकरणभेद से जो भेद होता है वह भी सोपाधिक भेद ही होता है। निरुपाधिक भेद का उदाहरण इस प्रकार है—घट में पट का भेद निरुपाधिक होता है।

**विवरण—**अन्योन्याभाव के सादि एवं अनादि जैसे भेद होते हैं वैसे ही सोपाधिक एवं निरुपाधिक दो प्रकार और भी हैं, जिसकी सत्ता उपाधिकी सत्ता से व्याप्य हो वह सोपाधिक भेद है अर्थात् जब तक उपाधि रहे तब तक जिसकी सत्ता हो—ऐसे अन्योन्याभाव को सोपाधिक कहते हैं। जैसे—आकाश एक ही है, उसमें वस्तुतः भेद नहीं है। तथापि उस आकाश का घटादि उपाधि के कारण भेद हो जाता है। जब तक घट


१. सोपाधिक भेदो नाम—उपाधिसत्ताव्याप्या सत्ता यस्य भेदस्य स भेदः उपाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकः तत्त्वम् = सोपाधिकत्वम्। तच्छून्यत्वं नाम—उपाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकत्वात्यन्ताभाववत्त्वम्। ब्रह्मणः एकत्वेऽपि तदुपाधेरन्तःकरणस्य भेदात् ब्रह्मणो भेदः। यावदन्तःकरणं तावदेव अस्य भेदस्य स्थितिः। निवृत्ते तु अन्तःकरण तस्यापि निवृत्तिः।
२. 'स्याकाश'—इति पाठान्तरम्।
३. 'चैकस्य सू'—इति पाठान्तरम्।
४. 'यथा'—इति पाठान्तरम्।

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