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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 482 में से

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पृष्ठ 368

३१० | वेदान्तपरिभाषा | [ सोपाधिकनिरुपाधिकभेदः

मठादि उपाधियां हैं तब तक 'जो घटाकाश है वह मठाकाश नहीं, जो मठाकाश है वह करकाकाश (कमण्डलु से अवच्छिन्न आकाश) नहीं। इस रीति से आकाश के भेद की प्रतीति होती है। परन्तु वास्तव में उपाधियों का विवेक कर यदि विचार किया जाय तो आकाश सर्वत्र एक ही है। घटाकाशादि व्यवहार केवल घटादि उपाधियों के भेद से होते हैं और घटादि उपाधियों के अधीन रहते हैं। अथवा सूर्य एक रहते हुए भी भिन्न-भिन्न जल-भाजनों में (जल के पात्रों में या वापी, तडागादि में) उसका प्रतिबिम्ब गिरने पर आकाशस्थ सूर्य, तडागस्थ सूर्य, आदि भेद होते हैं। वे भी सब सोपाधिक ही हैं। ये भेद उपाधिभेद के कारण ही होते हैं। जब तक उपाधि की सत्ता होगी तभी तक इनकी सत्ता रहेगी। किन्तु वास्तव में एक आकाशस्थ सूर्य ही सत्य है। इस रीति से जहां पर आकाशादिकों के भेद की सत्ता है वहां घटादि उपाधियों की सत्ता है। घटादि उपाधियों के न रहने पर आकाश सूर्य आदि का भेदेन व्यवहार नहीं होता। इस कारण भेद और उपाधियों की सत्ता में व्याप्य-व्यापक-भाव रहता है। अर्थात् भेद-सत्ता व्याप्य और उपाधि-सत्ता उसकी व्यापक होती है। सोपाधिक भेद का वेदान्तोपयोगी उदाहरण इस प्रकार है—वास्तव में ब्रह्म, अखण्डैकरस एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न अन्तःकरणरूप उपाधियों के कारण ब्रह्म में नाना जीव रूपसे भेद व्यवहार होता है। घटाकाश के समान अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुए अथवा पात्रस्थ सूर्य के समान भिन्न-भिन्न अन्तःकरणों में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य को ही देवदत्त, यज्ञदत्त आदि संज्ञाएँ प्राप्त होती हैं। किन्तु ये प्रयोग उपाधिसत्ता के अधीन होते हैं। ज्ञान के द्वारा इस अविद्या के निवृत्ति होते ही (उपाधि का त्याग करते ही) शुद्ध चैतन्यरूप ब्रह्म एकमेवाद्वितीय ही शेष रहता है।

जिस भेद में उपाधिसत्ता की अपेक्षा नहीं होती उसे निरुपाधिक भेद कहते हैं। जैसे घट, पट से स्वाभाविक ही भिन्न है। उनका भेद, उपाधि के अधीन नहीं है। इस कारण घट में विद्यमान पटभेद या पट में विद्यमान घट-मठादिकों का भेद, निरुपाधिक (उपाधिरहित) भेद है। इनका 'घटः पटो न' इस रीति से अनुभव होता है।

इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—

न च ब्रह्मण्यपि प्रपञ्चभेदाम्युपगमेऽद्वैतविरोधः। तात्त्विकभेदा¹देरनभ्युपगमेन वियदादिवदद्वैताव्याघात²त्वात्। प्रपञ्चस्याद्वैते ब्रह्मणि कल्पितत्वाङ्गीकारात्। ³तदुक्तं सुरेश्वराचार्यैः—


१. 'दानभ्यु'–इति पाठान्तरम्।
२. 'तात्'–इति पाठान्तरम्।
३. प्रपञ्चस्य अज्ञानकल्पितत्वे वार्तिकम्प्रमाणयति—तदुक्तमिति।