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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 482 में से

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पृष्ठ 369

सोपाधिकनिरुपाधिकभेदः ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३११

अक्षमा भवतः केयं साधकत्व-प्रकल्पने ।
किन्न पश्यसि संसारं तत्रैवाज्ञान-कल्पितम् ॥

**अर्थ—**ब्रह्म में प्रपञ्च भेद का ( संसारभेद का ) यदि स्वीकार करें तो अद्वैत के साथ विरोध होगा। यह शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि—हमने तात्त्विक ( पारमार्थिक ) भेदादि पदार्थों का स्वीकार नहीं किया होने से आकाशादिकों के समान ( वह भेद ) अद्वैत का व्याघातक ( विनाशक ) नहीं होता। क्योंकि अद्वैत ब्रह्म में प्रपञ्च कल्पित है, यह हमारा सिद्धान्त है। इसीलिये सुरेश्वराचार्य ने कहा है कि ( ब्रह्म के ) साधकत्व की कल्पना के विषय में ( जगदुत्पादकत्व की कल्पना करने में ) तुम्हारी यह अक्षमा ( असहिष्णुता ) क्यों ? क्या तुम उस ब्रह्म में ही अज्ञानकल्पित संसार को नहीं देखते हो ?

**विवरण—**उक्त प्रकार से चैतन्यरूप जीव और ब्रह्म का जो भेद है, वह अन्तःकरण और माया की उपाधि के कारण होते रहने से सोपाधिक है, और उस उपाधि की ब्रह्मज्ञान के द्वारा निवृत्ति होते ही उस भेद की भी निवृत्ति होगी। किन्तु जड़ प्रपञ्च और चेतन ब्रह्म का जो भेद है उसमें किसी प्रकार की कोई उपाधि नहीं है। इस कारण वह जड़-चेतन भेद निरुपाधिक है, यही कहना चाहिये। और इस भेद के मानने पर प्रपञ्चभेद और ब्रह्म दो वस्तुओं की सिद्धि होने से द्वैतापत्ति हो जाती है अर्थात् तुम्हारे अद्वैत सिद्धान्त से विरोध होता है।

**समाधान—**ब्रह्म में प्रपञ्च का ( संसाररूप समस्त जगत् का ) भेद मानने पर भी हमारे मत में द्वैतापत्ति नहीं होती है। क्योंकि ब्रह्म में समस्त जगत् जैसे कल्पित है, वैसे ही उस प्रपञ्च का भेद भी तात्त्विक न होकर कल्पित ( आरोपित ) ही है। इस कारण आकाशादिकों के तुल्य ही यह भेद भी प्रलय तक ही रहनेवाला है। प्रलय की अवस्था में या ज्ञान से संसारमिथ्यात्व का अनुभव होने पर ब्रह्म, एकमेवाद्वितीय ही रहता है। वैसे ही इस प्रपंच के कल्पित होने के कारण ही रज्जु या शुक्ति के समान अधिष्ठानभूत ब्रह्म के अद्वैत में कोई बाध नहीं हो पाता। क्योंकि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, संहार रूप तीनों अवस्थाओं में अधिष्ठान ब्रह्म, रज्जु आदि के समान निर्विकार ही रहता है। इस कारण ऐसे हजारों कल्पित पदार्थों के अंगीकार से ब्रह्म के अद्वैत में कोई व्याघात ( बाधा ) नहीं होता, क्योंकि कल्पित प्रपञ्च का भेद कभी तात्त्विक हो ही नहीं सकता।


साधकत्वप्रकल्पने = ब्रह्मणो जगद्धेतुत्वकल्पने भवतः इयमक्षमा = असहिष्णुता का ? अर्थात् इयमक्षमा न उचिता। कुतो नोचिता ? इत्यत्राह—किं नेतितत्रैव ब्रह्मण्येव अज्ञानकल्पितम् अज्ञानेन अविद्यया कल्पितं संसारं प्रपञ्चं किं न पश्यसि ? भावरूपत्वाद्ज्ञानस्य आवरण-विक्षेपशक्तिद्वयस्य स्वीकारात् तस्य कल्पकत्वमित्यभिप्रायः।