वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् |
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अद्वैत ब्रह्म में प्रपञ्च के कल्पित होने में वार्तिककार सुरेश्वराचार्य की सम्मति बताते हैं—'ब्रह्म, जगत् का साधक ( उत्पादक ) है' ऐसी कल्पना करने में ही तुम्हें इतनी असूया क्यों होती है ? यह तुम्हारी असहिष्णुता उचित नहीं है । क्योंकि ब्रह्म में ही यह प्रपञ्च, अज्ञान से कल्पित है, क्या यह तुम्हें प्रत्यक्ष दीखता नहीं है ? और तुम्हें 'मिथ्या-ज्ञान से ही प्रपञ्च कल्पित है' यह समझता है तो उस भ्रम के अधिष्ठानभूत ब्रह्म को कारण मानने में ही तुम्हें क्यों बुरा लग रहा है ? अर्थात् 'अज्ञानकल्पित संसार का अधिष्ठानभूत ब्रह्म कारण है' यह अवश्य स्वीकार करना ही होगा । सारांश यह है कि सुरेश्वराचार्य के इस वचन से भी संसार का अज्ञानकल्पितत्व सिद्ध होता है । अतः आकाश आदि अनेक पदार्थों के मानने पर भी इन व्यावहारिक पदार्थों से पारमार्थिक ब्रह्म के अद्वैत में कोई बाधा नहीं होती ।
शंका—मीमांसक तो अभाव पदार्थ को ही नहीं मानते तो आप अभाव का वर्णन कैसे कर रहे हैं ? भाट्ट चार ही पदार्थ 'द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य' मानते हैं । और प्राभाकर द्रव्यादि छह, सादृश्य और शक्ति—ऐसे आठ पदार्थ मानते हैं । घटादिकों का अभाव तो भूतलादि अधिकरणों का एक विशेष परिणाम है । कदाचित् अभाव को मान भी लें तो उसे चतुर्विध मानना वेदान्त सिद्धान्त के विरुद्ध है क्योंकि नृसिंहाश्रम मुनि ने अद्वैतदीपिका नामक ग्रन्थ में प्रागभाव का खण्डन किया है। ऐसी स्थिति में आप अभाव को चतुर्विध कैसे बता रहे हैं ? यह शंका यदि कोई करे तो ग्रन्थकार पूर्वाचार्यों की सम्मति बताते हैं ।
अत एव¹ विवरणेऽविद्यानुमाने प्रागभाव-व्यतिरिक्तत्व²विशेषणम्, तत्त्वप्रदीपिकाया³मविद्यालक्षणे भावत्वविशेषणं⁴ च सङ्गच्छते । एवं⁵ चतुर्विधा⁶भावानां योग्यानुपलब्ध्या प्रतीतिः । तत्रानुपलब्धि-र्मानान्तरम् ।
**अर्थ—**इसीलिये ( अभाव के चार प्रकार स्वीकार करने के कारण ही ) विवरण में
१. विवरणकारस्य अविद्यानुमानम्—'प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषया-वरणस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् ।' तथा च यदि वेदान्तिनां मते अभावो नाम कश्चित् पदार्थो न स्यात् तर्हि प्रागभावव्यावृत्त्यर्थमिदं विशेषणदानं व्यर्थं स्यात् । अतः अभावो नाम भावातिरिक्तः कश्चित् पदार्थः अस्त्येव । चित्सुखाचार्यैरपि तत्त्व-प्रदीपिकायामभावपदार्थः स्वीकृतोऽस्ति । तथा च—'अनादित्वे सति भावरूपं विज्ञान-निरस्यमज्ञानम्' इति अज्ञानलक्षणे ज्ञानप्रागभावव्यावृत्त्यर्थं भावरूपं विशेषणं प्रदत्तमस्ति ।
२. 'क्त्व'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'यां वावि'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'णं संग'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'वमुक्तानां'—इति पाठान्तरम् ।
६. 'द्यानामभा'—इति पाठान्तरम् ।