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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 482 में से

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अनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१३

अविद्या के अनुमान में दिये हुए 'प्रागभावव्यतिरिक्त' विशेषण की और तत्त्वदीपिका के अविद्यालक्षण में निविष्ट किये हुए 'भावत्व' विशेषण की संगति लग जाती है। इस प्रकार इन चतुर्विध अभावों की योग्यानुपलब्धि के द्वारा प्रतीति होती है। (और इन अभावों की) प्रतीति में अनुपलब्धि नामक पृथक् प्रमाण है।

विवरण—श्रीमच्छङ्कराचार्य के शारीरक भाष्य के प्रथम चतुःसूत्री पर पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नाम की टीका है। उस पर प्रकाशात्म मुनि ने 'विवरण' नाम की टीका की है इसी को 'अहङ्कारटीका' के नाम से पीछे ग्रन्थकार ने संबोधित किया है। उसमें अविद्या का (अज्ञान का) सद्भाव सिद्ध करने के लिए अनुमान बताया है। यथा—(१) 'विवादगोचरापन्नं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्त-स्वविषयावरण-स्वनिवर्त्य-स्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं भवितुमर्हति'—(२) अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात् (३) अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रभावत्' इस अनुमान की साध्य कोटि में 'स्वप्रागभावव्यतिरिक्त' यह विशेषण 'वस्त्वन्तर' में दिया है। इससे यह सिद्ध होता है कि विवरणाचार्य को 'प्रागभाव' मान्य था। क्योंकि उन्हें यदि प्रागभाव मान्य न होता तो उस पर होनेवाली अतिप्रसक्ति (व्यभिचार) का वारण करने के लिये उन्हें 'स्वप्रागभावव्यतिरिक्त' विशेषण देने की आवश्यकता न पड़ती। अतः अभाव की चतुर्विधता पूर्वाचार्य को भी सम्मत थी यह सिद्ध होता है। अभाव के चार प्रकार मानने पर ही उसका विशेषण सफल होता है। अतः अभाव चतुर्विध है।

इसी प्रकार 'अभाव' पदार्थ ही यदि वेदान्तियों को सम्मत न होता तो श्री चित्सुखाचार्य ने अपनी तत्त्वदीपिका में (चित्सुखी में) 'अनादिभाव-रूपत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वमविद्यात्वम्'—अनादि भावरूप होकर जो ज्ञान से निवृत्त होने योग्य हो वह अविद्या है इस अविद्या के लक्षण में दिया हुआ 'भावत्व' विशेषण व्यर्थ हुआ होता। क्योंकि 'अभाव' नामक पदार्थ ही यदि न हो तो उस पर अतिव्याप्ति कैसी होती और उसके निरसनार्थ 'भावरूपत्व' विशेषण की भी गरज नहीं पड़ती। तस्मात् 'भविष्यति', 'ध्वस्तः', 'नास्ति' और 'न' इन प्रतीतियों की उपपत्ति लगाने के लिये 'अभाव' पृथक् पदार्थ है और वह प्रागभावादि भेद से चतुर्विध है। इन चारों अभावों की प्रतीति इन्द्रियादि (प्रत्यक्षादि) किसी भी प्रमाण से नहीं होती। इसलिये योग्यानुपलब्धि ही अभावग्राहक प्रमाण है। तस्मात् 'अनुपलब्धि' यह छठा पृथक् प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।

इति षट् प्रमाणनिरूपणं समाप्तम्।


स्वतःप्रामाण्यवादः

इस रीति से छह प्रमाणों का निरूपण कर अब नैयायिकों के परतःप्रामाण्य का निरास करने के लिये उक्त छह प्रमाणों से होनेवाले ज्ञान का प्रामाण्य (यथार्थता) स्वतःग्राह्य है, यह बताने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—