वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
ध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०१
अर्थ—वह अभाव चार प्रकार का है। प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव। इनमें से मृत्पिण्डादि कारणों में घटरूप कार्य का उत्पत्ति से पूर्व जो अभाव वह प्रागभाव है। वह 'भविष्यति' होगा--इत्याकारक प्रतीति का विषय होता हैं।
विवरण—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव-इस रीति से अनुपलब्धि प्रमाण के प्रमेयभूत अभाव के चार भेद होते हैं। उनमें से प्रागभाव का स्वरूप इस प्रकार है—प्राक् ( कार्य उत्पन्न होने के पूर्व ) उस कार्य का जो अभाव रहता है उसे प्रागभाव कहते हैं। जैसे—घटरूप कार्य उत्पन्न होने के पूर्व जो घटाभाव वह घट-प्रागभाव है। प्रागभाव, कार्य के उपादान कारण में रहता है। घटरूप कार्य का अभाव मृत्पिण्डरूप कारण में रहता है। क्योंकि प्रागभाव की प्रतीति 'भविष्यति' यहां कार्य होगा—इस प्रकार से मृत्पिण्ड में ही होती है। उस प्रतीति की उपपत्ति के लिये ही प्रागभाव का स्वीकार करना पड़ता है। मृत्पिण्ड के अतिरिक्त तन्तु आदि कारणों में 'यहाँ घट होगा' ऐसी प्रतीति नहीं होती, इसलिये घट का प्रागभाव मृत्पिण्ड में ही रहता है—यह मानना होगा। इस प्रकार कार्य उत्पन्न होने से अव्यवहित पूर्वक्षण तक कार्य का कारण में जो अभाव प्रतीत होता है, वह प्रागभाव है।
अब प्रध्वंसाभाव का निरूपण करते हैं—
'तत्रैव घटस्य मुद्गर-पातानन्तरं योऽभावः स^२ प्रध्वंसाभावः ; ध्वंसस्यापि^३ स्वाधिकरणकपालनाशे नाश एव। न^४ चैवं घटोन्मज्जनापत्तिः, '^५घटध्वंसस्यापि घटप्रतियोगिक-ध्वंसत्वात्। अन्यथा प्रागभावध्वंसात्मक-घटस्य^६ विनाशे प्रागभावोन्मज्जनापत्तिः।
अर्थ—वहीं पर ( मृत्पिण्ड में ) घट का मुद्गरपात के अनन्तर जो अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। ध्वंस का भी ( प्रध्वंसाभाव का ) अपने अधिकरणभूत कपाल के नाश होने पर नाश होता ही है। इस प्रकार ध्वंस का ध्वंस मानने पर घट का ध्वंस
१. तत्रैव मृतपिण्डे एव घटस्य यः अभावः प्रतियोगितासंबंधेन घटजन्यः योऽभावः इति विज्ञेयम्। तेन प्रतियोगिजन्याभावत्वं ध्वंसत्वमिति फलति। २. यत्तु नैयायिकाः—ध्वंसोऽपि नित्य एवेति वदन्ति, तन्निरसनार्थं 'ध्वंसस्यापी'ति ग्रंथो बोद्धव्यः। आश्रयनाशे आश्रितनाशनियमो वर्तते। ३. ध्वंसे ध्वंसध्वंसे च एकम्प्रतियोगितावच्छेदकम्। ४. 'सध्वंसा०'-इति पाठान्तरम्। ५. 'न च घटो०'-इति पाठान्तरम्। ६. 'स्यनाशे०'-इति पाठान्तरम्।
३०२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ध्वंसस्य विनाशित्वम् ]
नष्ट होने के कारण पुनः घट उत्पन्न होने का प्रसंग प्राप्त होगा। परन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस (नाश) होता है वह घटप्रतियोगिक ही रहता है अर्थात् उसका प्रतियोगी घट ही होता है। अन्यथा प्रागभावध्वंस रूप जो घट उसका विनाश होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—मानना पड़ेगा।
विवरण—कार्यनाश के अनन्तर जो उसका अभाव होता है वह प्रध्वंसाभाव है। प्रागभाव के समान ही प्रध्वंसाभाव का भी अधिकरण, कार्य का उपादान कारण ही होता है। जैसे—उसी-मिट्टी के घट पर एक मुद्गर मारने पर वह फूट जाता है अर्थात् उस मृत्तिका को जो घट का आकार प्राप्त हुआ था वह नष्ट होता है। घटादिकों के इस ध्वंस को ही प्रध्वंसाभाव कहते हैं। उसका आधार घट के उपादान कारण कपाल ही हैं। क्योंकि कपाल की ओर देखकर ही 'यह घट नष्ट हुआ' यह प्रतीति होती है। इसलिये इस प्रध्वंसाभाव का अधिकरण भी घट का उपादान कारण मृत्तिका ही है। 'घटो ध्वस्तः' ही प्रध्वंसाभाव की प्रतीति होती है। 'सादिरनन्तःप्रध्वंसः'—सादि (उत्पत्तिमान्) होता हुआ जो अनन्त (नाशरहित) अभाव—वह प्रध्वंसाभाव, ऐसा नैयायिकों का मत है अर्थात् वे कहते हैं कि प्रध्वंसाभाव का कभी नाश नहीं होता। इसका निरसन 'ध्वंसस्यापि०' ग्रन्थ से किया जा रहा है। प्रध्वंसाभाव को विनाशरहित नहीं मान सकते। क्योंकि यह मानने पर प्रध्वंसाभाव एवं ब्रह्म ऐसे दो पदार्थ अविनाशी सिद्ध होंगे उससे द्वैतापत्ति होगी। इसलिये प्रध्वंसाभाव का जिस—मृत्तिकादि अधिकरण में ध्वस्तः' इत्याकारक प्रत्यय (बोध) होता है, उस मृत्तिकादि उपादान कारण का नाश होने पर उसमें स्थित घटध्वंस का भी ध्वंस (नाश) मानना होगा। क्योंकि ध्वंस के अधिकरण (आधार का ही नाश होने पर निराधार ध्वंस की स्थिति संभव नहीं। एवं कपालों के भी नाश होने पर वहां 'घटो ध्वस्तः' की प्रतीति भी नहीं होती। इस कारण ध्वंस के आधारभूत कपालों के नाश होने पर उस पर स्थित प्रध्वंस का भी ध्वंस मानना युक्त है।
शंका—ध्वंस का भी ध्वंस मानने पर पुनः घटोत्पत्ति का प्रसंग आवेगा। क्योंकि घटनाश (घटाभाव) का ध्वंस (अभाव) अर्थात् घटाभाव का अभाव घटस्वरूप ही होगा। जैसे—तेज के अभाव (तम) का अभाव अर्थात् तेज ही है, इसी तरह घटध्वंस था तब तक घट का अभाव था, परन्तु वह ध्वंस, का कारण के नाश से नष्ट होता है, ऐसा कहने पर वही घट पुनः उत्पन्न होता है; यही कहना होगा।
समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि घटध्वंस का जो ध्वंस होता है उसका प्रतियोगी घटध्वंस नहीं होता, किन्तु घट ही होता है। अर्थात् घटाभावरूप ध्वंस का जैसे घट प्रतियोगी होता है वैसे ही घटध्वंस के (अभाव) का भी वह प्रतियोगी होता है। इस कारण दूसरा अभाव, प्रथम अभाव के प्रतियोगी स्वरूप होता है—इस नियम के होने पर भी प्रकृत में अनुभवानुसार घटध्वंस के ध्वंस का प्रतियोगी घट को ही मानने
ध्वंसस्य विनाशित्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०३
पर यह आपत्ति नहीं आती क्योंकि हम आप से यह पूछते हैं कि कार्य तो प्रागभाव-ध्वंसरूप होता है। अर्थात् घटप्रागभाव-ध्वंस ही घट है, यह आप मानते ही हैं। तब घट प्रागभावध्वंसरूप घट पदार्थ का ध्वंस होने पर पुनः घट का प्रागभाव उत्पन्न होता है—ऐसा क्यों नहीं मानते ? और ऐसा मानने पर घट के नष्ट होने पर 'इन कपालों का घट होगा' ऐसी प्रागभाव की प्रतीति होनी चाहिये, परन्तु अनुभव तो ऐसा होता नहीं। इसलिये मूलध्वंस का जो प्रतियोगी होता है वही ध्वंस के ध्वंस का भी प्रतियोगी होता है—यह अनुभवानुसार मानना ही चाहिये। अर्थात् घट का मुद्गरपात के अनन्तर कपाल रूप ध्वंस होता है और उसका भी कपालनाश के अनन्तर जो ध्वंस होता है, वह घट का ही चूर्णरूप से ध्वंस है, इसी प्रकार घटध्वंस-ध्वंसस्थल में भी 'घटो विनष्टः' घट नष्ट हुआ—यही प्रतीति होती है। इसी प्रकार प्रागभाव के ध्वंस रूप घट का जो नाश होता है, उसका भी प्रतियोगी प्रागभाव ही समझना चाहिये। इस कारण प्रागभाव की उत्पत्ति का प्रसंग भी नहीं आता। ध्वंस का ध्वंस मानने पर भी एक दूसरी आपत्ति आती है—इस प्रकार वादी की शंका और उसका समाधान अग्रिम ग्रंथ से कहते हैं—
न^१ चैवमपि यत्र ध्वंसाधिकरणं नित्यं तत्र कथं ध्वंसनाश इति वाच्यम्। तादृशाधिकरणं^२ यदि चैतन्यव्यतिरिक्तं, तदा तस्य नित्यत्वमसिद्धम्, ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य ब्रह्मज्ञान-निवर्त्यतया वक्ष्यमाणत्वात्। यदि च ध्वंसाधिकरणं चैतन्यं, तदाऽसिद्धिः, आरोपित-प्रतियोगिक-ध्वंसस्याधिष्ठाने प्रतीयमानस्याधिष्ठानमात्रत्वात्। तदुक्तम्^३ —
१. ननु सर्वस्यापि ध्वंसस्य अनित्यत्वमुत यस्य कस्यचित् ? नाद्यः नित्यस्य अधिकरणस्य नाशाऽसिद्धया तद्वृत्तिध्वंसस्य अनित्यत्वाऽसिद्धेः। यतः इदानीं घटो नष्टः, अन्तरिक्षे घटो नष्टः इत्यादौ कालाकाशादीनां ध्वंसाधिकरणत्वं विज्ञायते, तयोश्च नित्यत्वमिष्यते नैयायिकादिभिः। नाऽपि द्वितीयः, नित्याधिकरणकध्वंससामान्यात्सर्वस्यापि नित्यत्वाश्रयणौचित्यात् इति शंकाकर्तुराशयः।
२. आरोपितप्रतियोगिकध्वंसस्य अधिष्ठानमात्रत्वे सुरेश्वराचार्यवचनं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यते। ननु अधिकरणपदेन आधारस्वरूपं विवक्षितम् उत स्वजनकाज्ञान विषयत्वरूपाधिष्ठानत्वम्। आद्ये तादृशनित्यपदार्थाऽप्रसिद्धिः, द्वितीये आधारनाशस्यैव ध्वंसनाशसामग्रीत्वान्न कोऽपि दोषः इति 'तादृशाधिकरणम्'त्यादिग्रन्थेनोच्यते।
३. यथा व्यावहारिकस्य नाशः अधिष्ठानरूपः तथैवेत्यर्थः।
| ३०४ | वेदान्तपरिभाषा | [ ध्वंसस्य विनाशित्वम् |
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^१ 'अधिष्ठानावशेषो हि नाशः कल्पितवस्तुनः, । इति । 'एवं शुक्तिरूप्य-विनाशोऽपीदमवच्छिन्नं ^२चैतन्यमेव ।
**अर्थ—**ऐसा मानने पर भी जहां ध्वंस का अधिकरण नित्य होता है वहाँ उस ध्वंस का नाश कैसे होता है ? परन्तु यह शंका करना ठीक नहीं है । क्योंकि वैसा अधिकरण चैतन्य के अतिरिक्त ( भिन्न ) यदि हो तो उसमें नित्यत्व असिद्ध हैं । क्योंकि ब्रह्म से भिन्न समस्त जगत् में ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यत्व ( ब्रह्मज्ञान से निवृत्त होने की योग्यता ) है, ऐसा आगे बतावेंगे । और वह ध्वंसाधिकरण यदि चैतन्य ही हो तो ( उस ध्वंस में नित्यत्व की असिद्धि है । क्योंकि जिसका ( ध्वंस का ) प्रतियोगी आरोपित ( मिथ्या ) होता है, ऐसे अधिष्ठान में प्रतीयमान ध्वंस, अधिष्ठानस्वरूप रहता है । इसलिए अभियुक्तों का वचन है कि 'कल्पित वस्तु का नाश, अधिष्ठानावशेष ( जिसमें केवल अधिष्ठान अवशिष्ट रहता है ) रहता है' । इस प्रकार शुक्तिरूप्य का विनाश भी 'इदम्वृत्ति' से अवच्छिन्न चैतन्य ही है ।
**विवरण—**ध्वंस का ( प्रध्वंसाभाव का ) जो अधिकरण कपाल के समान अनित्य होता है, उस अधिकरण का ( कपाल का ) ध्वंस होने पर तन्निष्ठ घटध्वंस का भी ध्वंस होता है । इस कारण घटादि पदार्थों का ध्वंस नित्य न होकर विनाशी होता है । इसलिये उस ध्वंस के नित्यत्व के प्राप्त न होने पर भी जिस ध्वंस का अधिकरण नित्य रहता है उसका ध्वंस = नाश नहीं होता । क्योंकि नित्य-अधिकरणस्थित ध्वंस का नाश कैसे हो सकेगा ?
**उदाहरण—**आकाश नित्य है, उस आकाश में होने वाला जो-आकाशकार्यभूत शब्द का ध्वंस, उसका नाश कैसे संभव होगा ? क्योंकि उसके अधिकरणभूत आकाश का कभी नाश ही नहीं होता । और प्रतियोगी के उपादानकारण का नाश होने पर उस ध्वंस का भी नाश आप बताते हैं । तो जब कि आकाश का नाश ही नहीं होता तो उस ध्वंस का भी नाश कैसे होगा ? इसलिये ऐसे शब्दादिकों के ध्वंस में अविनाशित्व ही आपको मानना चाहिए । तब ध्वंस और ब्रह्म दोनों नित्य पदार्थ सिद्ध होने से द्वैतापत्ति होती है । एवं ब्रह्म में समस्त जगत् का लय ( नाश ) भी आप मानते हैं, तब अधिष्ठानभूत ब्रह्म नित्य होने से तन्निष्ठ जगत् का ध्वंस भी नित्य ही होगा, जिससे प्रलयावस्था में ब्रह्म और जगत् का ध्वंस दो पदार्थ मानने होंगे । उस कारण 'एकमेवाद्वितीय; ब्रह्म के अद्वैत का बाध होता है इस आशय से वादी ने 'यत्र०' इत्यादि वाक्य से शंका कर कोटि की है । इस पर धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं—'जिस ध्वंस का अधिकरण नित्य होता है, तन्निष्ठ ध्वंस का नाश कैसे होगा' यह आप जिस अधिकरण को उद्देश्य कर कहते हैं वह ध्वंस का नित्य
१. 'शमधिः'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'न्नचैः'-इति पाठान्तरम् ।
अत्यन्ताभावलक्षणम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०५
अधिष्ठान, चैतन्य से भिन्न विवक्षित है या चैतन्य रूप ब्रह्म ही जगत् के ध्वंस का आधार होने से 'जगत् के ध्वंस में नित्यत्व प्राप्त होगा' यह विवक्षित है। इसमें प्रथम पक्ष तो बन नहीं सकता। क्योंकि एक चैतन्यस्वरूप ब्रह्म को छोड़ संसार के किसी भी पदार्थ में अविनाशित्व नहीं है। क्योंकि ब्रह्म में कल्पित जगत् की, ब्रह्मज्ञान से निवृत्ति (बाध, नाश) होती है—यह हम विषय परिच्छेद में बतावेंगे। इस कारण आकाशनिष्ठ शब्द-ध्वंस में या 'अन्तरिक्ष में घट का ध्वंस हुआ' इस रीति से आकाश में प्रतीयमान घटध्वंस में नित्यत्व प्राप्त होने की आपत्ति हमारे पक्ष में नहीं हो पाती।
अब द्वितीय पक्ष (चैतन्य ही ध्वंस का अधिकरण है) का स्वीकार करें तो 'जगत् के ध्वंस में नित्यत्वापत्ति होगी' यह कथन नहीं बन सकेगा। क्योंकि जिस ध्वंस का प्रतियोगी आरोपित (मिथ्या) होता है, ऐसा ध्वंस, जो कि अधिष्ठानरूप से भासित होता है, वह अधिष्ठानरूप ही होता है। उदाहरणार्थ—शुक्ति में 'यह रजत है' यह मिथ्या रजत का ज्ञान होता है। परन्तु वह ज्ञान, उस पदार्थ को भलीभांति देखने पर बाधित हो जाता है ओर 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार उसके विपरीत ज्ञान होता है, अर्थात् इस ज्ञान में पूर्वभासित रजत नष्ट हुआ—यह अनुभव होता है। यहाँ रजतध्वंस का प्रतियोगी जो रजत, वह मिथ्या होने से उसका नाश, अर्थात् उस रजत का अधिष्ठान 'इदम्' इस आकार से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य ही है। इसी प्रकार जगत् मिथ्या है और ब्रह्म उस जगदाकार भ्रम का अधिष्ठान है। उस ब्रह्म में जगत् का जो ध्वंस होता है, वह अधिष्ठानरूप (ब्रह्मरूप) होता है, पृथक् नहीं। क्योंकि चैतन्यात्मक ब्रह्म में चैतन्यात्मकता का अभाव भासित होना ही प्रपञ्चभान है। प्रपञ्चध्वंस के समय उस चैतन्यात्मकता के अभाव का अभाव होता है, इसी कारण चैतन्यात्मकता भासती है। अत एव सुरेश्वराचार्य ने कहा है कि 'कल्पितवस्तु का नाश अधिष्ठानरूप होता है'। इस कारण चैतन्य में होनेवाले ध्वंस में भी नित्यत्व प्राप्त नहीं होता। इसी तरह रज्जु पर भासमान सर्प के ध्वंस को भी रज्जु से अवच्छिन्न चैतन्य ही समझना चाहिये। तस्मात् हमारे पक्ष में द्वैतापत्ति या उक्त दोष नहीं हो पाता।
अब क्रमशः प्राप्त अत्यन्ताभाव का निरूपण करते हैं—
यत्राधिकरणे यस्य कालत्रयेऽप्यभावः, सोऽत्यन्ताभावः। यथा वायौ रूपात्यन्ताभावः। $^{१}$सोऽपि $^{२}$घटादिवद् ध्वंसप्रतियोग्येव।
१. नैयायिकसम्मतमत्यन्ताभावस्य नित्यत्वं खण्डयति 'सोऽपी'त्यादिग्रन्थेन। अत्यन्ताभावस्य नश्वरत्वेऽपि तस्य नित्यत्वप्रसिद्धिः वियदादिवत् बहुकालस्थायित्वेनोपपद्यते। यथा वियदादिकं प्रलयकालध्वंसप्रतियोगी, तथा अत्यन्ताभावोऽपि प्रलयकालध्वंसप्रतियोगी। एवं च आकाशाधिकरणस्य नाशात् यथा आकाशस्य नाशः तथा अत्यन्ताभावाधिकरणस्य नाशात् अत्यन्ताभावस्यापि नाशः।
२. 'वियदादिवत्'—इति पाठान्तरम्।
३०६ वेदान्तपरिभाषा [ अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम्
अर्थ—जिस अधिकरण में जिसका कालत्रय में भी ( तीनों काल में ) अभाव रहता है, उसे ( अभाव को ) अत्यन्ताभाव कहते हैं। जैसे-वायु में रूप का अत्यन्ताभाव है, वह भी घटादि के समान ध्वंस का प्रतियोगी ही होता है।
विवरण—जहाँ पर जिस वस्तु की तीनों काल में प्रतीति न होती हो, वहाँ उस वस्तु का अत्यन्ताभाव समझना चाहिये। यहाँ के 'सोऽत्यन्ताभावः' से पूर्व 'तत्र' पद का अध्याहार करना चाहिये और 'स:' पद का 'तदीय' = उसका--अर्थ समझना चाहिये। तीनों काल में वर्तमान जो अभाव, उसे अत्यन्ताभाव कहते हैं।
नैयायिक अत्यन्ताभाव के उदाहरण में 'इह भूतले घटो नास्ति' = इस भूतल पर घट नहीं है; देते हैं, पर वह सर्वसम्मत न होने से निर्विवाद उदाहरण ग्रंथकार ने बताया है। वायु में रूप किसी काल में भी नहीं होता, इसलिये वायु में जो रूप का अभाव, वह अत्यन्ताभाव है। 'यहाँ अमुक नहीं' इस आकार में ही अत्यन्ताभाव की प्रतीति होती है। तार्किक अत्यन्ताभाव को नित्य मानते हैं, उसका निरसन करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—घटादि पदार्थ जैसे ध्वंस के प्रतियोगी होते हैं ( उनका ध्वंस होता है ), वैसे ही अत्यन्ताभाव भी ध्वंसप्रतियोगी ही है। उसका भी प्रलयकाल में ध्वंस ( नाश ) होता ही है। इस कारण ध्वंसाप्रतियोगित्वरूप नित्यत्व अत्यन्ताभाव में नहीं होता। कुछ पुस्तकों में 'घटादिवत्' के स्थान में 'वियदादिवत्' पाठ है, वह उचित है। क्योंकि जिस प्रकार 'वियदादिक' ( आकाशादिक ) पदार्थ यावत् प्रपंचभावी हैं, किन्तु प्रलयकाल में नष्ट होते हैं, उसी प्रकार यह अत्यन्ताभाव भी जब तक जगत् है तब तक ही रहता है, और प्रलयावस्था में समस्त पदार्थों का ध्वंस होने पर उन पर अवलम्बित होकर रहने-वाले अत्यन्ताभाव का नाश होता ही है। प्रलयकाल में ब्रह्मातिरिक्त सत्ता ही नहीं होती।
अन्योन्याभाव का स्वरूप बताते हैं—
इदमिदं नेति प्रतीतिविषयोऽन्योऽन्याभावः । अयमेव विभागो भेदः पृथक्त्वं चेति ¹व्यवह्रियते । भेदातिरिक्तविभागादौ प्रमाणाभावात् । अयं चान्योऽन्याभावोऽधिकरणस्य सादित्वे सादिः, यथा घटे पटभेदः । अधिकरणस्यानादित्वेऽनादिरेव², यथा जीवे ब्रह्मभेदः,
१. 'व्यपदिश्यते'-इति पाठान्तरम् ।
२. अन्योन्याभावाधिकरणस्य अन्योन्याभावप्रतियोगिनश्च सादित्वे अन्योन्याभावस्य सादित्वम् । यथा—'घटे पटभेद:' । अत्र भेदाधिकरणस्य घटस्य उत्पत्तिमत्त्वात् पटप्रतियोगिकभेदस्योत्पत्तिमत्त्वम् । जीवब्रह्मणोश्चानादित्वात् तत्प्रतियोगिकतदधिकरणभेदस्य अनादित्वम् । एवं जीवेशादिभेदोऽपि अनादिरेव । सादिरनादिर्द्विविधोऽपि भेदः विनाशी वर्तते यतः अविद्याकल्पितानामविद्यानिवृत्तौ निवृत्तिः ।
अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०७
ब्रह्मणि¹ वा जीवभेदः । द्विविधोऽपि भेदो² ध्वंसप्रतियोग्येव, अविद्याया- निवृत्तौ तत्परतन्त्राणां निवृत्त्यवश्यम्भावात् ।
अर्थ—'यह, यह नहीं' ऐसी प्रतीति का विषय जो अभाव, वह अन्योन्याभाव है। विभाग, भेद, पृथक्त्व शब्दों से इसी का व्यवहार होता है। क्योंकि विभागादिकों को भेद से (अन्योन्याभाव से) पृथक् मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इस अन्योन्याभाव का अधिकरण यदि सादि (उत्पत्तिमत्) हो तो वह सादि (उत्पत्तिमान्) होता है। जैसे—घट में पट का भेद। परन्तु अधिकरण यदि अनादि हो तो वह भी अनादि ही होता है। जैसे—जीव में ब्रह्म का भेद या ब्रह्म में जीव का भेद। यह दोनों प्रकार का भेद ध्वंस का प्रतियोगी (विनाशी) होता है। क्योंकि मूल अविद्या की निवृत्ति होने पर उसके अधीन रहनेवाले भेदों की निवृत्ति होना अवश्यम्भावी है।
विवरण—'यह घट पट नहीं है' इस रीति से घट में वर्तमान जो पटरूपता का अभाव वह अन्योन्याभाव है। यह ध्यान में रखकर ही 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताक' जो अभाव, उसे अन्योन्याभाव, कहते हैं, यह अन्योन्याभाव का लक्षण किया गया है। अत्यन्ताभाव की प्रतियोगिता, घटादि अनेक प्रतियोगियों के संयोग, समवाय आदि अनेक सम्बन्धों से अवच्छिन्न होती है। किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतियोगिता केवल तादात्म्य-सम्बन्ध से ही अवच्छिन्न रहती है। क्योंकि 'यह घट, पट नहीं है' इस स्थल में यह घट स्वरूपतः पट नहीं है, अर्थात् पट-भेद का प्रतियोगी जो पट, उसका स्वयं से (पट से) जैसा तादात्म्य (तद्रूपत्व) है, वैसा घट से नहीं—यही ज्ञान होता है। इस कारण तादात्म्य सम्बन्ध से अवच्छिन्न प्रतियोगितावाला अन्योन्याभाव माना गया है।
अन्योन्याभाव, भेद, विभाग, पृथक्त्व—ये सब पर्याय शब्द हैं। नैयायिकों का कहना है कि विभाग और पृथक्त्व गुण हैं, और वे अन्योन्याभाव से भिन्न हैं। परन्तु यह उचित नहीं है। क्योंकि वैसा मानने में कोई प्रमाण नहीं है। यहाँ ग्रन्थकार का आशय यह है कि—'घट, पट से विभक्त है' और 'घट, पट से पृथक् है, ये दोनों प्रतीतियाँ क्रमशः विभाग और पृथक्त्व की हैं—ऐसा तार्किक कहते हैं। किन्तु वास्तव में इन दोनों ज्ञानों में कोई वैलक्षण्य नहीं है। अतः वे दोनों वाक्य एक ही प्रतीति की बोधक हैं। जैसे—हस्त और कर—एक ही प्रतीति के पैदा करने वाले शब्दों में भेद होने पर भी उनका अर्थ एक ही रहता है वैसे ही विभाग और पृथक्त्व शब्दों के अर्थ में भी एकता समझनी चाहिये। इसलिये विभाग और पृथक्त्व को परस्पर भिन्न एवं गुण नहीं कह सकते।
१. 'णिजीव'—इति पाठान्तरम् ।
२. भेदोऽपि नश्वर एवेत्यभिप्रायः ।
३. 'द्यानिवृ०'—इति पाठान्तरम् ।
| ३०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ अन्योन्याभावस्यानित्यत्वम् ] |
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इसी प्रकार पृथक्त्व को भेद से ( अन्योन्याभाव से ) भिन्न मानने में कोई प्रमाण नहीं है । 'घट, पट से पृथक् है' यह पृथक्त्व की प्रतीति और 'यह घट, पट नहीं है' यह अन्योन्याभाव की प्रतीति—इन दोनों में केवल शब्दों की ही विलक्षणता है, उनके अर्थों में कुछ भी भेद नहीं है ।
शंका—ऐसा मानने पर 'इदमस्मात् पृथक्' प्रयोग के समान 'इदमिदं न' प्रतीति के स्थान में 'इदमस्मात् न' प्रयोग भी होने लगेगा।
उत्तर—यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि 'अन्यारादितरर्ते०' ( पाणि० सू० २।३।२९) सूत्र के द्वारा 'अन्य' पद से अन्यार्थक 'पृथक्' इत्यादि पदों का भी ग्रहण किया होने से 'पृथक्' शब्द के योग में जैसे पंचमी का विधान किया गया है वैसे 'न' अव्यय के योग में पंचमी का विधान नहीं किया गया । इस कारण 'न' निपात के योग में 'अस्मात् न' ऐसा पञ्चमी का प्रसङ्ग नहीं आता । अन्य, पृथक्, विभक्त, भिन्न आदि शब्दों में ही भेद है । वस्तुतः ये शब्द अन्योन्याभाव के ही बोधक हैं ।
कुछ अन्योन्याभाव सादि ( उत्पत्तिमान् ) होते हैं और कुछ अनादि ( उत्पत्तिरहित ) होते हैं । जिस अन्योन्याभाव का अधिकरण उत्पत्तिशील होता है, वह अन्योन्याभाव उस अधिकरण की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न होता है । उदाहरण—पट भेद का ( पटान्योन्याभाव का ) अधिकरण घट, सादि ( उत्पत्तिशील है, इसलिये 'घट' उत्पन्न होते ही 'पटभेद' भी उत्पन्न होता है । इस कारण यह भेद सादि है ।
इसके विपरीत जिस अन्योन्याभाव का अधिकरण अनादि होता है वह अन्योन्याभाव भी अनादि ( उत्पत्तिरहित ) होता है । जैसे—जीव, ब्रह्म इत्यादि पदार्थ अनादि होते हैं । क्योंकि—
'जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा ।
अविद्या तच्चितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥'
( जीव, ईश्वर, शुद्धचैतन्य, जीवेश्वर-भेद, अविद्या = माया और उसका—चैतन्य के साथ सम्बन्ध—ये छः पदार्थ वेदान्त मत में अनादि माने गये हैं ) यह वेदान्त सिद्धान्त है ।
इस कारण जीव में 'जीव, ब्रह्म नहीं है' इस प्रकार से प्रतीयमान ब्रह्म भेद या ब्रह्म में भासमान 'ब्रह्म, जीवो न'—ब्रह्म, जीव नहीं है—यह जीवभेद, ये अनादि अन्योन्याभाव हैं । तथापि सादि और अनादि दोनों प्रकार के अन्योन्याभाव नित्य नहीं हैं, अपितु आकाशादि के समान विनाशी ( ध्वंस के प्रतियोगी हो ) हैं । क्योंकि समस्त जगत् की मूलकारण अविद्या की विद्या से निवृत्ति होने पर उसके कार्यभूत ( उसके अधीन रहने वाले ) समस्त भेदों की निवृत्ति होनी ही चाहिये । इस कारण 'नेह नानास्ति किंचन' और 'अहं ब्रह्मास्मि' जानने वाले विद्वान् की दृष्टि से—घट-पट-भेद या 'जीवेश्वर भेद' यह द्विविध भेद भी नहीं है । तस्मात् जीवेश्वर भेद के अनादि होने पर भी—
सोपाधिकनिरूपाधिकभेदः ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३०९
आविद्यक होने से उसका नाश हो ही जाता है। इसलिये पहले जो जीवेश्वर भेद बताया था वह संसारदशा में ही समझना चाहिये।
अन्योन्याभाव के और भेदों को भी बताते हैं।
पुनरपि भेदो द्विविधः—सोपाधिको निरुपाधिकश्चेति। ^१तत्रोपाधिसत्ता-व्याप्य-सत्ताकत्वं सोपाधिकत्वं, तच्छून्यत्वं निरुपाधिकत्वम्। तत्राद्यो यथा—एक^२स्यैवाकाशस्य घटाद्युपाधिभेदेन भेदः। यदा वा^३ एकस्यैव सूर्यस्य जलभाजनभेदेन भेदः। ^४तथा च एकस्यैव ब्रह्मणोऽन्तःकरणभेदाद्भेदः। निरुपाधिकभेदो यथा घटे पटभेदः।
**अर्थ—**फिर भी भेद (अन्योन्याभाव) दो प्रकार का है। सोपाधिक और निरुपाधिक (उसके भेद हैं)। उन दोनों में से जिसकी सत्ता, उपाधि की सत्ता से व्याप्य होती है वह सोपाधिक भेद है। और वैसी सत्ता से रहित जो भेद वह निरुपाधिक भेद है। उनमें से प्रथम भेद का उदाहरण इस प्रकार है—एक ही आकाश का घटादि उपाधियों के भेद से जो (घटाकाश, मठाकाश नहीं है) भेद होता है वह, या एक ही सूर्य का पात्रों (कलशों) के भेद से जो भेद होता है वह सोपाधिक भेद है। इसी प्रकार एक ही ब्रह्म का अन्तःकरणभेद से जो भेद होता है वह भी सोपाधिक भेद ही होता है। निरुपाधिक भेद का उदाहरण इस प्रकार है—घट में पट का भेद निरुपाधिक होता है।
**विवरण—**अन्योन्याभाव के सादि एवं अनादि जैसे भेद होते हैं वैसे ही सोपाधिक एवं निरुपाधिक दो प्रकार और भी हैं, जिसकी सत्ता उपाधिकी सत्ता से व्याप्य हो वह सोपाधिक भेद है अर्थात् जब तक उपाधि रहे तब तक जिसकी सत्ता हो—ऐसे अन्योन्याभाव को सोपाधिक कहते हैं। जैसे—आकाश एक ही है, उसमें वस्तुतः भेद नहीं है। तथापि उस आकाश का घटादि उपाधि के कारण भेद हो जाता है। जब तक घट
१. सोपाधिक भेदो नाम—उपाधिसत्ताव्याप्या सत्ता यस्य भेदस्य स भेदः उपाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकः तत्त्वम् = सोपाधिकत्वम्। तच्छून्यत्वं नाम—उपाधिसत्ताव्याप्यसत्ताकत्वात्यन्ताभाववत्त्वम्। ब्रह्मणः एकत्वेऽपि तदुपाधेरन्तःकरणस्य भेदात् ब्रह्मणो भेदः। यावदन्तःकरणं तावदेव अस्य भेदस्य स्थितिः। निवृत्ते तु अन्तःकरण तस्यापि निवृत्तिः।
२. 'स्याकाश'—इति पाठान्तरम्।
३. 'चैकस्य सू'—इति पाठान्तरम्।
४. 'यथा'—इति पाठान्तरम्।
३१० | वेदान्तपरिभाषा | [ सोपाधिकनिरुपाधिकभेदः
मठादि उपाधियां हैं तब तक 'जो घटाकाश है वह मठाकाश नहीं, जो मठाकाश है वह करकाकाश (कमण्डलु से अवच्छिन्न आकाश) नहीं। इस रीति से आकाश के भेद की प्रतीति होती है। परन्तु वास्तव में उपाधियों का विवेक कर यदि विचार किया जाय तो आकाश सर्वत्र एक ही है। घटाकाशादि व्यवहार केवल घटादि उपाधियों के भेद से होते हैं और घटादि उपाधियों के अधीन रहते हैं। अथवा सूर्य एक रहते हुए भी भिन्न-भिन्न जल-भाजनों में (जल के पात्रों में या वापी, तडागादि में) उसका प्रतिबिम्ब गिरने पर आकाशस्थ सूर्य, तडागस्थ सूर्य, आदि भेद होते हैं। वे भी सब सोपाधिक ही हैं। ये भेद उपाधिभेद के कारण ही होते हैं। जब तक उपाधि की सत्ता होगी तभी तक इनकी सत्ता रहेगी। किन्तु वास्तव में एक आकाशस्थ सूर्य ही सत्य है। इस रीति से जहां पर आकाशादिकों के भेद की सत्ता है वहां घटादि उपाधियों की सत्ता है। घटादि उपाधियों के न रहने पर आकाश सूर्य आदि का भेदेन व्यवहार नहीं होता। इस कारण भेद और उपाधियों की सत्ता में व्याप्य-व्यापक-भाव रहता है। अर्थात् भेद-सत्ता व्याप्य और उपाधि-सत्ता उसकी व्यापक होती है। सोपाधिक भेद का वेदान्तोपयोगी उदाहरण इस प्रकार है—वास्तव में ब्रह्म, अखण्डैकरस एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न अन्तःकरणरूप उपाधियों के कारण ब्रह्म में नाना जीव रूपसे भेद व्यवहार होता है। घटाकाश के समान अन्तःकरण से अवच्छिन्न हुए अथवा पात्रस्थ सूर्य के समान भिन्न-भिन्न अन्तःकरणों में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य को ही देवदत्त, यज्ञदत्त आदि संज्ञाएँ प्राप्त होती हैं। किन्तु ये प्रयोग उपाधिसत्ता के अधीन होते हैं। ज्ञान के द्वारा इस अविद्या के निवृत्ति होते ही (उपाधि का त्याग करते ही) शुद्ध चैतन्यरूप ब्रह्म एकमेवाद्वितीय ही शेष रहता है।
जिस भेद में उपाधिसत्ता की अपेक्षा नहीं होती उसे निरुपाधिक भेद कहते हैं। जैसे घट, पट से स्वाभाविक ही भिन्न है। उनका भेद, उपाधि के अधीन नहीं है। इस कारण घट में विद्यमान पटभेद या पट में विद्यमान घट-मठादिकों का भेद, निरुपाधिक (उपाधिरहित) भेद है। इनका 'घटः पटो न' इस रीति से अनुभव होता है।
इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—
न च ब्रह्मण्यपि प्रपञ्चभेदाम्युपगमेऽद्वैतविरोधः। तात्त्विकभेदा¹देरनभ्युपगमेन वियदादिवदद्वैताव्याघात²त्वात्। प्रपञ्चस्याद्वैते ब्रह्मणि कल्पितत्वाङ्गीकारात्। ³तदुक्तं सुरेश्वराचार्यैः—
१. 'दानभ्यु'–इति पाठान्तरम्।
२. 'तात्'–इति पाठान्तरम्।
३. प्रपञ्चस्य अज्ञानकल्पितत्वे वार्तिकम्प्रमाणयति—तदुक्तमिति।
सोपाधिकनिरुपाधिकभेदः ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३११
अक्षमा भवतः केयं साधकत्व-प्रकल्पने ।
किन्न पश्यसि संसारं तत्रैवाज्ञान-कल्पितम् ॥
**अर्थ—**ब्रह्म में प्रपञ्च भेद का ( संसारभेद का ) यदि स्वीकार करें तो अद्वैत के साथ विरोध होगा। यह शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि—हमने तात्त्विक ( पारमार्थिक ) भेदादि पदार्थों का स्वीकार नहीं किया होने से आकाशादिकों के समान ( वह भेद ) अद्वैत का व्याघातक ( विनाशक ) नहीं होता। क्योंकि अद्वैत ब्रह्म में प्रपञ्च कल्पित है, यह हमारा सिद्धान्त है। इसीलिये सुरेश्वराचार्य ने कहा है कि ( ब्रह्म के ) साधकत्व की कल्पना के विषय में ( जगदुत्पादकत्व की कल्पना करने में ) तुम्हारी यह अक्षमा ( असहिष्णुता ) क्यों ? क्या तुम उस ब्रह्म में ही अज्ञानकल्पित संसार को नहीं देखते हो ?
**विवरण—**उक्त प्रकार से चैतन्यरूप जीव और ब्रह्म का जो भेद है, वह अन्तःकरण और माया की उपाधि के कारण होते रहने से सोपाधिक है, और उस उपाधि की ब्रह्मज्ञान के द्वारा निवृत्ति होते ही उस भेद की भी निवृत्ति होगी। किन्तु जड़ प्रपञ्च और चेतन ब्रह्म का जो भेद है उसमें किसी प्रकार की कोई उपाधि नहीं है। इस कारण वह जड़-चेतन भेद निरुपाधिक है, यही कहना चाहिये। और इस भेद के मानने पर प्रपञ्चभेद और ब्रह्म दो वस्तुओं की सिद्धि होने से द्वैतापत्ति हो जाती है अर्थात् तुम्हारे अद्वैत सिद्धान्त से विरोध होता है।
**समाधान—**ब्रह्म में प्रपञ्च का ( संसाररूप समस्त जगत् का ) भेद मानने पर भी हमारे मत में द्वैतापत्ति नहीं होती है। क्योंकि ब्रह्म में समस्त जगत् जैसे कल्पित है, वैसे ही उस प्रपञ्च का भेद भी तात्त्विक न होकर कल्पित ( आरोपित ) ही है। इस कारण आकाशादिकों के तुल्य ही यह भेद भी प्रलय तक ही रहनेवाला है। प्रलय की अवस्था में या ज्ञान से संसारमिथ्यात्व का अनुभव होने पर ब्रह्म, एकमेवाद्वितीय ही रहता है। वैसे ही इस प्रपंच के कल्पित होने के कारण ही रज्जु या शुक्ति के समान अधिष्ठानभूत ब्रह्म के अद्वैत में कोई बाध नहीं हो पाता। क्योंकि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, संहार रूप तीनों अवस्थाओं में अधिष्ठान ब्रह्म, रज्जु आदि के समान निर्विकार ही रहता है। इस कारण ऐसे हजारों कल्पित पदार्थों के अंगीकार से ब्रह्म के अद्वैत में कोई व्याघात ( बाधा ) नहीं होता, क्योंकि कल्पित प्रपञ्च का भेद कभी तात्त्विक हो ही नहीं सकता।
साधकत्वप्रकल्पने = ब्रह्मणो जगद्धेतुत्वकल्पने भवतः इयमक्षमा = असहिष्णुता का ? अर्थात् इयमक्षमा न उचिता। कुतो नोचिता ? इत्यत्राह—किं नेति। तत्रैव ब्रह्मण्येव अज्ञानकल्पितम् अज्ञानेन अविद्यया कल्पितं संसारं प्रपञ्चं किं न पश्यसि ? भावरूपत्वाद्ज्ञानस्य आवरण-विक्षेपशक्तिद्वयस्य स्वीकारात् तस्य कल्पकत्वमित्यभिप्रायः।
| ३१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् |
|---|
अद्वैत ब्रह्म में प्रपञ्च के कल्पित होने में वार्तिककार सुरेश्वराचार्य की सम्मति बताते हैं—'ब्रह्म, जगत् का साधक ( उत्पादक ) है' ऐसी कल्पना करने में ही तुम्हें इतनी असूया क्यों होती है ? यह तुम्हारी असहिष्णुता उचित नहीं है । क्योंकि ब्रह्म में ही यह प्रपञ्च, अज्ञान से कल्पित है, क्या यह तुम्हें प्रत्यक्ष दीखता नहीं है ? और तुम्हें 'मिथ्या-ज्ञान से ही प्रपञ्च कल्पित है' यह समझता है तो उस भ्रम के अधिष्ठानभूत ब्रह्म को कारण मानने में ही तुम्हें क्यों बुरा लग रहा है ? अर्थात् 'अज्ञानकल्पित संसार का अधिष्ठानभूत ब्रह्म कारण है' यह अवश्य स्वीकार करना ही होगा । सारांश यह है कि सुरेश्वराचार्य के इस वचन से भी संसार का अज्ञानकल्पितत्व सिद्ध होता है । अतः आकाश आदि अनेक पदार्थों के मानने पर भी इन व्यावहारिक पदार्थों से पारमार्थिक ब्रह्म के अद्वैत में कोई बाधा नहीं होती ।
शंका—मीमांसक तो अभाव पदार्थ को ही नहीं मानते तो आप अभाव का वर्णन कैसे कर रहे हैं ? भाट्ट चार ही पदार्थ 'द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य' मानते हैं । और प्राभाकर द्रव्यादि छह, सादृश्य और शक्ति—ऐसे आठ पदार्थ मानते हैं । घटादिकों का अभाव तो भूतलादि अधिकरणों का एक विशेष परिणाम है । कदाचित् अभाव को मान भी लें तो उसे चतुर्विध मानना वेदान्त सिद्धान्त के विरुद्ध है क्योंकि नृसिंहाश्रम मुनि ने अद्वैतदीपिका नामक ग्रन्थ में प्रागभाव का खण्डन किया है। ऐसी स्थिति में आप अभाव को चतुर्विध कैसे बता रहे हैं ? यह शंका यदि कोई करे तो ग्रन्थकार पूर्वाचार्यों की सम्मति बताते हैं ।
अत एव¹ विवरणेऽविद्यानुमाने प्रागभाव-व्यतिरिक्तत्व²विशेषणम्, तत्त्वप्रदीपिकाया³मविद्यालक्षणे भावत्वविशेषणं⁴ च सङ्गच्छते । एवं⁵ चतुर्विधा⁶भावानां योग्यानुपलब्ध्या प्रतीतिः । तत्रानुपलब्धि-र्मानान्तरम् ।
**अर्थ—**इसीलिये ( अभाव के चार प्रकार स्वीकार करने के कारण ही ) विवरण में
१. विवरणकारस्य अविद्यानुमानम्—'प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्तस्वविषया-वरणस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थप्रकाशकत्वात् ।' तथा च यदि वेदान्तिनां मते अभावो नाम कश्चित् पदार्थो न स्यात् तर्हि प्रागभावव्यावृत्त्यर्थमिदं विशेषणदानं व्यर्थं स्यात् । अतः अभावो नाम भावातिरिक्तः कश्चित् पदार्थः अस्त्येव । चित्सुखाचार्यैरपि तत्त्व-प्रदीपिकायामभावपदार्थः स्वीकृतोऽस्ति । तथा च—'अनादित्वे सति भावरूपं विज्ञान-निरस्यमज्ञानम्' इति अज्ञानलक्षणे ज्ञानप्रागभावव्यावृत्त्यर्थं भावरूपं विशेषणं प्रदत्तमस्ति ।
२. 'क्त्व'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'यां वावि'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'णं संग'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'वमुक्तानां'—इति पाठान्तरम् ।
६. 'द्यानामभा'—इति पाठान्तरम् ।
अनुपलब्धेर्मानान्तरत्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१३
अविद्या के अनुमान में दिये हुए 'प्रागभावव्यतिरिक्त' विशेषण की और तत्त्वदीपिका के अविद्यालक्षण में निविष्ट किये हुए 'भावत्व' विशेषण की संगति लग जाती है। इस प्रकार इन चतुर्विध अभावों की योग्यानुपलब्धि के द्वारा प्रतीति होती है। (और इन अभावों की) प्रतीति में अनुपलब्धि नामक पृथक् प्रमाण है।
विवरण—श्रीमच्छङ्कराचार्य के शारीरक भाष्य के प्रथम चतुःसूत्री पर पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नाम की टीका है। उस पर प्रकाशात्म मुनि ने 'विवरण' नाम की टीका की है इसी को 'अहङ्कारटीका' के नाम से पीछे ग्रन्थकार ने संबोधित किया है। उसमें अविद्या का (अज्ञान का) सद्भाव सिद्ध करने के लिए अनुमान बताया है। यथा—(१) 'विवादगोचरापन्नं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभावव्यतिरिक्त-स्वविषयावरण-स्वनिवर्त्य-स्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं भवितुमर्हति'—(२) अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात् (३) अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रभावत्' इस अनुमान की साध्य कोटि में 'स्वप्रागभावव्यतिरिक्त' यह विशेषण 'वस्त्वन्तर' में दिया है। इससे यह सिद्ध होता है कि विवरणाचार्य को 'प्रागभाव' मान्य था। क्योंकि उन्हें यदि प्रागभाव मान्य न होता तो उस पर होनेवाली अतिप्रसक्ति (व्यभिचार) का वारण करने के लिये उन्हें 'स्वप्रागभावव्यतिरिक्त' विशेषण देने की आवश्यकता न पड़ती। अतः अभाव की चतुर्विधता पूर्वाचार्य को भी सम्मत थी यह सिद्ध होता है। अभाव के चार प्रकार मानने पर ही उसका विशेषण सफल होता है। अतः अभाव चतुर्विध है।
इसी प्रकार 'अभाव' पदार्थ ही यदि वेदान्तियों को सम्मत न होता तो श्री चित्सुखाचार्य ने अपनी तत्त्वदीपिका में (चित्सुखी में) 'अनादिभाव-रूपत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वमविद्यात्वम्'—अनादि भावरूप होकर जो ज्ञान से निवृत्त होने योग्य हो वह अविद्या है इस अविद्या के लक्षण में दिया हुआ 'भावत्व' विशेषण व्यर्थ हुआ होता। क्योंकि 'अभाव' नामक पदार्थ ही यदि न हो तो उस पर अतिव्याप्ति कैसी होती और उसके निरसनार्थ 'भावरूपत्व' विशेषण की भी गरज नहीं पड़ती। तस्मात् 'भविष्यति', 'ध्वस्तः', 'नास्ति' और 'न' इन प्रतीतियों की उपपत्ति लगाने के लिये 'अभाव' पृथक् पदार्थ है और वह प्रागभावादि भेद से चतुर्विध है। इन चारों अभावों की प्रतीति इन्द्रियादि (प्रत्यक्षादि) किसी भी प्रमाण से नहीं होती। इसलिये योग्यानुपलब्धि ही अभावग्राहक प्रमाण है। तस्मात् 'अनुपलब्धि' यह छठा पृथक् प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।
इति षट् प्रमाणनिरूपणं समाप्तम्।
स्वतःप्रामाण्यवादः
इस रीति से छह प्रमाणों का निरूपण कर अब नैयायिकों के परतःप्रामाण्य का निरास करने के लिये उक्त छह प्रमाणों से होनेवाले ज्ञान का प्रामाण्य (यथार्थता) स्वतःग्राह्य है, यह बताने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—
३१४ | वेदान्तपरिभाषा | [ उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम्
एवमुक्तानां प्रमाणानां प्रामाण्यं $^१$स्वत एवोत्पद्यते ज्ञायते च । तथा हि स्मृत्यनुभव-साधारणं संवादि-प्रवृत्त्यनुकूलं तद्वति तत्प्रकारक-ज्ञानत्वं प्रामाण्यम् । तच्च ज्ञानसामान्य-सामग्री-प्रयोज्यं, न त्वधिकं गुणमपेक्षते, प्रमामात्रेऽनुगतगुणाभावात् । नापि प्रत्यक्षप्रमायां भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्षः । रूपादिप्रत्यक्षे$^२$ आत्मप्रत्यक्षे च तदभावात्, सत्यपि तस्मिन् पीतः शङ्ख इति $^३$प्रत्ययस्य भ्रमात्वाच्च$^४$ ।
अत एव न सलिङ्ग-परामर्शादिकमप्यनुमित्यादि-प्रमायां गुणः, असल्लिङ्ग-परामर्शादि-स्थलेऽपि विषयाबाधेन अनुमित्यादेः प्रमात्वात् ।
१. स्वतः प्रामाण्यविचारो हि संशयातिरिक्तं ज्ञानसामान्यमुद्दीश्यैव, न तु प्रमाणानि अधिकृत्य ।
तथा च न्यायरत्नमालायाम्—'यदि प्रमाणान्येव विषयीकृत्य चिन्त्येत, ततो यानि उभयोः प्रमाणतया प्रसिद्धानि तेषामेव प्रामाण्यं स्वतः इत्येतावत् सिद्धान्त्येत । ततश्च वेदस्य उभयवादिसिद्धप्रामाण्याभावेन विचाराविषयत्वात् नास्य स्वतः प्रामाण्यं साधितं स्यात् । तत्र वेदप्रामाण्यानुपयोगिनी चिन्ता काकदन्तपरीक्षावदकर्तव्या स्यात् । ज्ञानमात्रं त्वधिकृत्य स्वतः प्रामाण्ये परतश्च अप्रामाण्ये साध्यमाने वेदस्यापि स्वतःस्तावद् विषय-तथात्वरूपं प्रामाण्यमवगतं सत् कारणदोषज्ञानादेः अभावात् निरपवादं स्थितं भवतीति प्रयोजनवती चिन्ता' इति ॰
तथा च संवादिप्रवृत्तिप्रयोजकत्वरूपं प्रामाण्यं कस्य ज्ञानस्य ? कस्य च ज्ञानस्य विसंवादि प्रवृत्तिजनकत्वरूपमप्रामाण्यम् ? तच्च कथमुत्पद्यते ? कथं च ज्ञायते ? इत्येवात्र विचारणीयम् । अत्र प्रमाणशब्दः भावव्युत्पत्त्या प्रमाथंकः अतः प्रमाणानां प्रमाणां, प्रामाण्यं प्रमात्वमित्यर्थः । तत्र केचित् प्रमात्वाऽप्रमात्वयोः स्वतस्त्वमिच्छन्ति, केचिन्नेच्छन्ति । तथा च तार्किकरक्षायाम्—“प्रमाणत्वाप्रमाणत्वे स्वतः सांख्याः समाश्रिताः । नैयायिकास्ते परतः, सौगताश्चरमं स्वतः । प्रथमं परतः प्राहुः प्रामाण्यं, वेदवादिनः । प्रमाणत्वं स्वतः प्राहुः परतश्चाप्रमाणंताम् ।” इति ।
स्वत एव उत्पद्यते ज्ञायते च । स्वस्य स्वहेतुकत्वानुपपत्तेः आत्मीयात् इति 'स्वतः' शब्दस्यार्थः । आत्मीयश्च दोषाभावसहकृतज्ञानसामान्यसामग्री, दोषाभावसहकृतज्ञान-ग्राहक सामग्री च ज्ञातव्या । जनकज्ञापकयोः आत्मीयत्व प्रसिद्धिः । उत्पत्तौ जनकत्वेन आत्मीयत्वम् । ज्ञप्तौ ज्ञापकत्वेन आत्मीयत्वम् ।
२. 'क्षे चात्म०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'प्रत्यक्षस्य'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'त्वात्'-इति पाठान्तरम् ।
उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१५
अर्थ— इस प्रकार प्रतिपादित प्रमाओं का ( यथार्थ ज्ञान का ) प्रामाण्य ( प्रमात्व सत्यता ) स्वतः एव = उस ज्ञान से ही उत्पन्न होता है और जाना जाता है। जो इस प्रकार है— स्मृति एवं अनुभव के लिए साधारण और संवादिप्रवृत्ति के लिये अनुकूल प्रमात्व, अर्थात् तद्वान् पदार्थ में तत्प्रकारक ज्ञान होना है और वह ज्ञानसामान्य की सामग्री का ही कार्य है, उसके लिये उसे अधिक गुण की अपेक्षा नहीं होती। क्योंकि समस्त प्रमाओं में अनुगत रहनेवाला कोई गुण नहीं है। यदि कहें कि 'प्रत्यक्ष प्रमा में भूयोवयवेन्द्रिय-सन्निकर्ष गुण है' तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप के प्रत्यक्ष में तथा आत्मा के प्रत्यक्ष में उसका ( उस गुण का ) अभाव रहता है और उस गुण के रहते हुए भी 'शंखः पीतः' शंख पीला है—ज्ञान भ्रमरूप ही होता है। इसीलिये सल्लिंग-परामर्शादिक भी अनुमित्यादि प्रमाओं में गुण नहीं कहे जा सकते, क्योंकि सल्लिंगपरामर्श जहां नहीं रहता वहां भी अनुमेय विषय का बाध न होने से अनुमित्यादि ज्ञानों में प्रमात्व ही रहता है।
विवरण— वेदान्त में प्रत्यक्षादि छह प्रमाण हैं। उन छह प्रमाणों से छह प्रकार की प्रमाएं ( ज्ञान ) होती हैं। ये प्रमाएं यथार्थ ( वास्तविक = सत्य ) हैं या अयथार्थ ( अवास्तविक = असत्य ) अर्थात् भ्रमरूप हैं? इसे जानने का जो साधन है, उसके विषय में शास्त्रकारों का मतभेद है। नैयायिकों का कहना है कि—'प्रमात्वं न स्वतो-ग्राह्यं संशयानुपपत्तिः'—प्रमात्व ( प्रमा का यथार्थत्व = सत्यत्व ) स्वतोग्राह्य नहीं है अर्थात् उस ज्ञान की साधन सामग्री से ही उसका ग्रहण नहीं होता। क्योंकि ज्ञान की सत्यता या असत्यता चक्षुरादि से ही ज्ञात होती है कहा जाय तो मन्द प्रकाश में दीखने-वाले स्तम्भ आदि के विषय में 'यह स्तम्भ है या पुरुष है' इत्याकारक संशय तो अनुभव-सिद्ध है। इसलिये ज्ञान का प्रमाण्य स्वतः ( ज्ञानग्राहक सामग्री से ) ही ज्ञात नहीं होता। किन्तु उसका ग्राहक प्रमाण अनुमान है। अतः ज्ञानप्रामाण्य, अनुमानरूप 'पर-प्रमाण' से ग्राह्य होने के कारण 'परतोग्राह्य' है। प्रामाण्यग्राहक अनुमान इस प्रकार है—दूर स्थित पदार्थ का 'यह जल है' इत्याकारक जो ज्ञान मुझे हुआ, वह प्रमा ( यथार्थ = सत्य ज्ञान ) है, क्योंकि वह संवादि का ( सफल प्रवृत्ति का ) जनक है, अर्थात् उस जल की ओर देखकर उसे पीने के लिये जो मेरी प्रवृत्ति हुई वह सफल हुई) ( वहां मुझे पीने के लिये पानी मिलने से पूर्व हुआ ज्ञान, सफल प्रवृत्ति का जनक हुआ ) व्यतिरेक से भ्रमज्ञान के समान। अर्थात् इसके पूर्व मुझे शुक्ति की जगह 'यह रजत है' यह ज्ञान हुआ था, वह ऐसा सफल प्रवृत्तिजनक नहीं हुआ था, क्योंकि समीप जाकर देखते ही हाथ में सीप आई, इसलिये वह विफ़ल प्रवृत्ति का ( विसंवादि प्रवृत्ति का ) जनक हुआ तथा अप्रमारूप हुआ। परन्तु यह जल ज्ञान वैसा विफ़ल प्रवृत्तिजनक नही हुआ इस कारण यह प्रमारूप होना चाहिये, इस अनुमान प्रमाण से ही ज्ञान प्रामाण्य का निश्चय होता है।
३१६ वेदान्तपरिभाषा [ उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम्
इसी प्रकार प्रामाण्य की उत्पत्ति के विषय में भी मतभेद है। नैयायिक कहते हैं कि प्रमाओं, का प्रमाण्य परतः (गुण के कारण) उत्पन्न होता है, 'क्योंकि जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री' से उसका प्रमात्व (सत्यता) उत्पन्न होता है यह मानने पर भ्रमज्ञान को भी प्रमारूप मानना पड़ेगा।
प्रामाण्य के विषय में ऐसा विवाद होने से उसकी उत्पत्ति एवं ज्ञान के विषय में वेदान्ताभिमत सिद्धान्त 'एव मुक्तानां', इत्यादि प्रकरण से बताया गया है। 'प्रमाण' शब्द 'प्रमीयते तत् प्रमाणम्' ऐसी भावव्युत्पत्ति के द्वारा 'प्रमा' अर्थ में प्रयुक्त समझना चाहिये। धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं-प्रत्यक्ष, अनुमिति आदि छहों प्रमाणों का प्रामाण्य स्वत एव (स्वयमेव) अर्थात् ज्ञान की सामग्री से ही उत्पन्न होता है और स्वतः एव ज्ञात होता है।
यदि कोई पूछे कि नैयायिक के जागरित रहते प्रामाण्य के स्वतस्त्व का सिद्धान्त आप कैसे कर रहे हैं ?
अतः उक्त प्रश्न का समाधान करने के लिये प्रथम 'प्रामाण्य स्वतः एव कैसे उत्पन्न होता है ?' बताते हैं। स्मृति एवं अनुभव दोनों के लिये साधारण अर्थात् स्मृति एवं अनुभव दोनों में व्याप्त रहनेवाले प्रामाण्य का लक्षण 'तद्वति तत्प्रकारकज्ञानत्व' है। लक्षण के 'तत्' पद से ज्ञान में विशेषणभूत धर्म का ग्रहण करना चाहिये। जैसे—'अयं घट:'—यह घट—इत्याकारक ज्ञान हमें हुआ। ज्ञान में 'घट विशेष्य है, और उसका (घट का) ज्ञान 'घटत्व' धर्म से हो रहा है। इसलिये 'घटत्व' उस ज्ञान में विशेषण या प्रकार कहलाता है। अतः लक्षण के 'तत्' पद से 'घटत्व' धर्म का ग्रहण करना चाहिये। तब लक्षण का अर्थ यह हुआ कि 'घटत्ववान्' पदार्थ में 'यह घट' इत्याकारक घटत्वप्रकारक ज्ञान होना ही घटप्रमा का प्रामाण्य है। 'यह घट मुझे चाहिये' यह इच्छा भी घटत्ववान् घट में घटत्वप्रकारक ही है। उसमें रहनेवाले प्रामाण्य में ज्ञान प्रामाण्य की—अतिव्याप्ति न हो जाय इसलिये लक्षण में 'ज्ञानत्व' पद दिया है। इच्छा में इच्छात्व रहता है, ज्ञानत्व नहीं। इस कारण अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है। 'तत्प्रकारकज्ञानत्व' इतना ही लक्षण यदि करें तो भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति होती है, क्योंकि शुक्तिका में होनेवाला 'यह रजत' इत्याकारक रजतज्ञान भी रजतत्वप्रकारक ही होता है। उसकी निवृत्ति के लिये 'तद्वति' पद का निवेश किया है। भ्रमज्ञान—रजतत्ववान् पदार्थ में नहीं होता, इसलिये दोष का निवारण हो जाता है। ज्ञान में इस प्रकार का प्रामाण्य होने पर ही उसकी इच्छा से प्रवृत्त हुए पुरुष की प्रवृत्ति (वहाँ जाना) संवादि (सफल) होती है। तस्मात् यह प्रामाण्य संवादि प्रवृत्ति के लिये अनुकूल है। यह प्रामाण्य स्वयं ही उत्पन्न होता है।
शंका—उस प्रामाण्य को अपना ही उत्पादक मानने पर अर्थात् स्वयं को ही स्वयं
उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१७
का जनक कहने से 'आत्माश्रय' दोष होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य 'स्वयं ही उत्पन्न होता है', कैसे कह रहे हैं ?
समाधान—यह शंका उचित नहीं है। क्योंकि 'स्वतः प्रामाण्य' में स्वतः का अर्थ 'स्वयं से' न होकर जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री से' है। इस कारण आत्माश्रय दोष नहीं आता। नैयायिक प्रामाण्य की उत्पत्ति गुणतः (ज्ञानजनक सामग्री से, प्रामाण्यजनक सामग्री भिन्न है) मानते हैं। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि समस्त ज्ञान में अनुगत रहनेवाला एक भी गुण नहीं है। इस पर नैयायिक कदाचित् कहे कि छहों प्रमाओं के प्रामाण्य का जनक किसी एक गुण के न रहने पर भी विशेष प्रमा का जनक विशेष गुण है ही।
उदाहरणार्थ—प्रत्यक्ष में 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण (उपकारक) है अर्थात् जिस वस्तु का प्रत्यक्ष होता है उसके बहुत से ज्ञापक कतिपय अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष होने पर उस प्रत्यक्ष में प्रमात्व (प्रामाण्य = सच्चाई) उत्पन्न होता है। वैसे ही अनुमिति में 'सल्लिङ्ग परामर्श' (यथार्थ = सत्य लिङ्ग का परामर्श = ज्ञान) गुण है। हेतु यदि सत्य (वास्तविक) हो, और उसका पक्ष पर ज्ञान हो जाय तो अनुमिति में प्रामाण्य होता है। उपमिति के प्रामाण्य के लिये—'सादृश्यज्ञान' गुण की अपेक्षा होती है। शाब्दीप्रमा का प्रामाण्य, यथार्थ योग्यताज्ञान या यथार्थ तात्पर्य ज्ञान रूप गुण से सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य के लिए ज्ञानसामान्य सामग्री के व्यतिरिक्त गुण की आवश्यकता नहीं होती कैसे कह रहे हैं ?
'नापि०' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान कर नैयायिकों के स्वीकृत (माने हुए) गुणों में से किसी भी गुण का यहाँ संभव नहीं है, यह सिद्ध किया है। 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण प्रत्यक्ष प्रमा का जनक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह व्यभिचारी है। 'रूप में अवयव नहीं होते' यह तो आप भी मानते हैं। इस कारण निरवयव रूप आदि के पुष्कल (बहुत) अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष है, नहीं कहा जा सकता। तथापि रूप आदि का प्रत्यक्ष तो होता है और वह सत्य भी है। इस प्रकार प्रामाण्य ज्ञान भी होता है। उसी प्रकार निरवयव आत्मा में भी 'भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्ष' रूप गुण का होना संभव नहीं। तथापि आत्मा का मानस प्रत्यक्ष आप मानते हैं। यहाँ पर गुण के न होने पर भी प्रामाण्य रहता है इस कारण गुण का व्यतिरेक व्यभिचार होता है। क्योंकि जहाँ गुण नहीं वहाँ प्रामाण्य का भी न होना नहीं कहा जा सकता।
इस प्रकार जिस व्यक्ति को पीलिया हो जाता है उसे सब पदार्थ पीले दीखते हैं। शंख सफेद होता हुआ भी यह पीला है ऐसा उसे ज्ञान होता है यहाँ पर शंख के पुष्कल (अधिक)—अवयवों के साथ उस पुरुष के इन्द्रियों का सन्निकर्ष रूप गुण रहता है, किन्तु उस ज्ञान में प्रामाण्य पैदा नहीं होता। इस कारण 'जहाँ गुण हो वहाँ प्रामाण्य
३१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमायाः परतस्त्वखण्डनम्
होता है' इस अन्वय व्याप्ति का भी व्यभिचार होता है। तस्मात् अन्वय व्यतिरेक व्यभिचार के कारण गुण को प्रामाण्य का जनक (कारण) नहीं मान सकते। इसीलिये प्रत्यक्ष प्रमा में 'भूयोऽवयवेन्द्रियसंनिकर्ष' रूप गुण संभव नहीं है।
इसी रीति से अनुमित्यादि प्रमाओं में तुम्हारे माने हुए सल्लिंग परामर्शादि गुण भी उपपन्न नहीं हो पाते। क्योंकि कहीं-कहीं धूलि में ही 'यह धूम हैं' इत्याकारक ज्ञान होता है। वहाँ पर दैवगत्या यदि अग्नि हुआ तो असल्लिंग परामर्श के होते हुए भी अनुमिति प्रमात्मक होती है। ऐसे व्यतिरेक व्यभिचार से अनुमिति के प्रामाण्य में सल्लिंग परामर्श को गुण (उपकारक) नहीं माना जा सकता। 'आदि' पद से सादृश्य ज्ञान और योग्यता ज्ञान रूप गुण को भी उपमिति एवं शब्द प्रमाओं के प्रामाण्य में व्यभिचारी समझना चाहिये। क्योंकि कभी-कभी सादृश्य भ्रम से भी यथार्थ उपमिति होती है, और विष्णु के अर्थ में हरि शब्द का उच्चारण होने पर भी भ्रम से उस शब्द का सिंह अर्थ है, ऐसा तात्पर्य भ्रम हो जाता है। इसलिये चारों प्रमाओं में अनुगत रहने वाले किसी एक गुण का तो सम्भव है ही नहीं, और न विशेष प्रमा के विशेष गुण का ही संभव है। तस्मात् प्रामाण्योत्पादन में, गुणादि सामग्री न होकर, ज्ञानजनक सामग्री ही उसकी जनक माननी चाहिये। इसलिये प्रामाण्य स्वतः एव उत्पन्न होता है।
इस पर 'भ्रमज्ञान में भी आपके मत से प्रामाण्य प्राप्त होगा' इस आशय से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—
न चैवमप्रमापि प्रमा स्यात्, ज्ञानसामान्य-सामग्र्या अविशेषादिति वाच्यम्। दोषाभावस्यापि हेतुत्वाङ्गीकारात्। न चैवं परतस्त्व¹मिति वाच्यम्। आगन्तुक-भावकारणापेक्षायामेव परतस्त्वात्।
**अर्थ—**ऐसा (ज्ञानजनक सामग्री को ही प्रामाण्योत्पादक सामग्री) मान लें तो अप्रमा (भ्रमज्ञान) भी प्रमा (यथार्थ) ज्ञान कहलायेगा। क्योंकि (वहाँ भी) ज्ञान सामान्य की सामग्री में विशेष नहीं होता।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि (हमने) दोषाभाव का भी हेतुत्वेन (हेतुरूप से) अंगीकार किया है। 'यह कहने से परतस्त्व प्राप्त होता है' ऐसी शंका यदि कोई करे तो ठीक नहीं है। क्योंकि आगन्तुक भाव कारण की अपेक्षा रहने पर ही परतस्त्व प्राप्त होता है।
**विवरण—शंका—**रजत का रजतरूप से ज्ञान होते समय इन्द्रियादि जो सामग्री ज्ञान की होती है, वही शुक्तिका में (सीप में) रजतभ्रम (चाँदी का भ्रम) होते समय
१. 'स्त्वम्'-इति पाठान्तरम् ।
प्रमायाः परतस्त्वखण्डनम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१९
भी होती है। इस कारण 'जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री से उस ज्ञान में प्रामाण्य होता है' यदि मानें तो भ्रम को भी प्रमा कहना होगा। रज्जु में हुआ सर्प-ज्ञान भी सत्य मानना होगा। इसलिये उसके प्रामाण्य का कारण ज्ञानजनक सामग्री से भिन्न ही मानना चाहिये।
समाधान—हमारे मत में अप्रमा में प्रमात्व नहीं आ पाता, क्योंकि प्रमा में जैसे अन्य साधन सामग्री की आवश्यकता होती है वैसे ही दोषाभावरूप सहकारिकारण की भी आवश्यकता होती है। क्योकि दोष तो सभी कार्यों में प्रतिबन्धक होता है। और उस प्रतिबन्धक का अभाव, सभी कार्यों में सहकारिकारण रहता है। उदाहरण—अग्नि कितना भी प्रज्वलित क्यों न हो, दाह्य वस्तु के साथ चन्द्रकान्त मणि का संयोग यदि हो तो वह जला नहीं पाता। क्योकि वहाँ मणि प्रतिबन्धक रहता है, इसे आप भी स्वीकार करते ही हैं। इसलिये दोषाभावरूप कारण से युक्त जो ज्ञान की सामग्री, उसके ही कारण प्रमात्मक ज्ञान होता है। सीप में जब रजत ज्ञान होता है, तब चक्षु में तिमि-रादि कोई दोष पैदा हो जाने से समस्त कारणों में से दोषाभावरूप एक कारण अप्रमा में न होने से प्रमारूप ज्ञान नहीं हो पाता। अतएव अप्रमा, प्रमारूप कभी भी नहीं हो सकती।
शंका—ऐसा मानने पर आपके लिये अप-सिद्धान्त होगा। क्योंकि ज्ञानजनक सामग्री के अतिरिक्त दोषाभावरूप पर (दूसरे) कारण का स्वीकार करने से आपने हमारा परतस्त्व पक्ष ही स्वीकृत किया-सा होगा।
समाधान—यह आक्षेप ठीक नहीं। क्योंकि आगन्तुक भावरूपकारण की, प्रमा में अपेक्षा करने पर ही परतस्त्व की प्राप्ति होगी। आप भी (नैयायिक भी) 'प्रमाया गुणजन्यत्वं उत्पत्तौ परतस्त्वम्' परतस्त्व का लक्षण यही करते हैं (गुण रूप आगन्तुक भाव कारण की अपेक्षा होने से ही परतः प्रमात्व उत्पन्न होता है) अतः दोषाभावरूप (अभावरूप) कारण की आवश्यकता मानने पर भी, प्रामाण्य में परतस्त्व, उसके कारण नहीं हो सकेगा। इस प्रकार आगन्तुक भावरूप कारण की अपेक्षा न करते हुए ज्ञानसामान्यग्राहक सामग्री से ही उत्पन्न होना ही प्रामाण्य के स्वतस्त्व का निष्कृष्ट स्वरूप है। इसमें अदृष्ट आदि की व्यावृत्ति के लिये 'आगन्तुक' पद है। और दोषाभाव-रूप कारण से परतस्त्व की प्राप्ति न हो इसलिये 'भाव' पद दिया गया है। तस्माद् अभावरूप अन्य कारणों का स्वीकार करने पर भी परतस्त्व नहीं प्राप्त होता। अतः प्रामाण्य स्वतः एव उत्पन्न होता है।
इस प्रकार 'प्रामाण्य स्वत एव उत्पन्न होता है' इस प्रतिज्ञा की सिद्धि की। अब वह प्रामाण्य स्वतोग्राह्य कैसे है? यह सिद्ध कर नैयायिक के परतोग्राह्यत्व पक्ष का निरास करते हैं।
३२० वेदान्तपरिभाषा [ प्रमात्वस्य स्वतस्त्वम्
ज्ञायते च प्रामाण्यं स्वतः । 'स्वतो ग्राह्यत्वं च दोषाभावे सति
१. 'स्वतो ग्राह्यत्वं च' आगन्तुकदोषाभावे यावती स्वाश्रयस्य प्रमात्वाश्रयस्य ग्राहकसामग्री भासकसामग्री तया ग्राह्यत्वम् । ग्राह्यत्वं नाम भास्यत्वम्, न तु तज्जन्यग्रहविषयत्वम् । यतः साक्षिण एव स्वाश्रयग्राहकत्वं तज्जन्यग्रहाभावात् । मुरारिमिश्राणां मते ज्ञानग्राहकः अनुव्यवसायः, तेन यथा ज्ञानं गृह्यते, तथा तद्गतं प्रामाण्यमपि गृह्यते । तथा च—तन्मते प्रमात्वस्य ज्ञानग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वं सिद्धमेवेति तत्साधने सिद्धसाधनं स्यात्, तद्वारणाय 'यावत्' पदनिवेशः । तथा च तेन साक्षिज्ञानादेरपि संग्रहात् तद्ग्राह्यत्वसाधने न सिद्धसाधनम्, तन्मते तस्य असिद्धत्वात् ।
इदं बोद्धव्यम्—भाट्टमते मिश्रमते च गुरुमत इव ज्ञानसामान्यस्य 'घटमहं जानामि' इत्यादिरूपेण मिति-मातृ-मेयरूपत्रिपुटीविषयकत्वं न स्वीक्रियते । 'अयं घटः' इति प्रथमं ज्ञानम्, अनन्तरं 'घटमहं जानामि' इति द्वितीयं ज्ञानं ज्ञानविषयकम्, तेनैव च प्रामाण्यग्रहणमिति तत्सिद्धान्तः । यद्यपि मतत्रयेऽपि ज्ञानविषयकज्ञानेनैव प्रामाण्यग्रहः समानः, तथापि त्रिपुटीभाननियमो गुरुमते, इतरयोस्तु प्रथमज्ञाने विषयमात्रभानम् न तु ज्ञानात्मनोरपि, इति विशेषो न अपह्नवमर्हति । तथा च भाट्टमिश्रमतयोः ज्ञानजन्यज्ञानस्यैव प्रामाण्यग्राहकत्वं, न तु प्रथमज्ञानस्येति ज्ञानग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वम् । गुरुमते तु ज्ञानजनक सामग्र्या एव ज्ञानतत्प्रामाण्यग्राहकत्वम् । तत्र मिश्रमते ज्ञानग्राहकसामग्री प्रथमव्यवसायः, भाट्टमते च ज्ञाततालिङ्गकानुमानमिति । तत्र प्रथममते 'घटमहं जानामि' इति लौकिकमानससाक्षात्कारः, द्वितीयमते तु अनुमितिरिति साक्षात्कारत्वेन, अनुमितित्वेन च विशेषेऽपि ज्ञानाकारे न विशेषलेशोऽपि । एवं च मतत्रयसाधारणः 'स्व' पदार्थो न वात्मा, किन्तु 'स्वीय' इत्येव स्वीकर्तव्यम् । तत्र गुरुमते ज्ञानसामग्र्या एव ज्ञानग्राहकसामग्रीत्वम् । भट्टमिश्रमतयोः स्वीयपदेन ज्ञाततालिङ्गकानुमानस्य अनुव्यवसायसामग्र्याश्चेति भेदस्तु अकिञ्चित्करः ।
अत्र परिभाषाकारा किं मतमभिप्रयन्तीति जिज्ञासायां, नहि गुरुमतमेतेषामभिमतम् । व्यवहारे भाट्टनयस्यैव स्वीकारात् । नापि भाट्टमतम्, भाट्टमत इव ज्ञानानुमेयत्वस्य अस्वीकारात् । अन्यथा ज्ञानप्रत्यक्षत्वादिनिर्वचनस्यानुपपत्तेः । नापि मिश्रमत्म्, स्वरूपेतर प्रत्यक्षस्थले वृत्त्यवच्छिन्नविषयावच्छिन्नान्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यानामभेदस्वीकारेण त्रिपुटीभाननियमस्वीकारात् । न चैवं सति प्रकृते विषये गुरुमतमेव वेदान्तिनामपि मतमिति वाच्यम् । वेदान्तिमते प्रमात्वाऽप्रमात्वादिविभागस्य वृत्तिज्ञानमादायैव प्रवृत्तत्वेन वृत्तिज्ञानस्य च जडस्य स्वप्रकाशत्वाऽयोगेन साक्ष्यधीनभानस्यैव स्वीकारेण च गुरुमतसाधारण्याऽसंभवः । यत्तु वृत्तेः स्वप्रकाशत्वं परिभाषायां प्रत्यक्षपरिच्छेदे वर्णितम्, तदिदं स्वविषयत्वरूपमेव, न तु साक्ष्यनपेक्षत्वरूपमिति न कोऽपि दोषः ।