वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१५
अर्थ— इस प्रकार प्रतिपादित प्रमाओं का ( यथार्थ ज्ञान का ) प्रामाण्य ( प्रमात्व सत्यता ) स्वतः एव = उस ज्ञान से ही उत्पन्न होता है और जाना जाता है। जो इस प्रकार है— स्मृति एवं अनुभव के लिए साधारण और संवादिप्रवृत्ति के लिये अनुकूल प्रमात्व, अर्थात् तद्वान् पदार्थ में तत्प्रकारक ज्ञान होना है और वह ज्ञानसामान्य की सामग्री का ही कार्य है, उसके लिये उसे अधिक गुण की अपेक्षा नहीं होती। क्योंकि समस्त प्रमाओं में अनुगत रहनेवाला कोई गुण नहीं है। यदि कहें कि 'प्रत्यक्ष प्रमा में भूयोवयवेन्द्रिय-सन्निकर्ष गुण है' तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि रूप के प्रत्यक्ष में तथा आत्मा के प्रत्यक्ष में उसका ( उस गुण का ) अभाव रहता है और उस गुण के रहते हुए भी 'शंखः पीतः' शंख पीला है—ज्ञान भ्रमरूप ही होता है। इसीलिये सल्लिंग-परामर्शादिक भी अनुमित्यादि प्रमाओं में गुण नहीं कहे जा सकते, क्योंकि सल्लिंगपरामर्श जहां नहीं रहता वहां भी अनुमेय विषय का बाध न होने से अनुमित्यादि ज्ञानों में प्रमात्व ही रहता है।
विवरण— वेदान्त में प्रत्यक्षादि छह प्रमाण हैं। उन छह प्रमाणों से छह प्रकार की प्रमाएं ( ज्ञान ) होती हैं। ये प्रमाएं यथार्थ ( वास्तविक = सत्य ) हैं या अयथार्थ ( अवास्तविक = असत्य ) अर्थात् भ्रमरूप हैं? इसे जानने का जो साधन है, उसके विषय में शास्त्रकारों का मतभेद है। नैयायिकों का कहना है कि—'प्रमात्वं न स्वतो-ग्राह्यं संशयानुपपत्तिः'—प्रमात्व ( प्रमा का यथार्थत्व = सत्यत्व ) स्वतोग्राह्य नहीं है अर्थात् उस ज्ञान की साधन सामग्री से ही उसका ग्रहण नहीं होता। क्योंकि ज्ञान की सत्यता या असत्यता चक्षुरादि से ही ज्ञात होती है कहा जाय तो मन्द प्रकाश में दीखने-वाले स्तम्भ आदि के विषय में 'यह स्तम्भ है या पुरुष है' इत्याकारक संशय तो अनुभव-सिद्ध है। इसलिये ज्ञान का प्रमाण्य स्वतः ( ज्ञानग्राहक सामग्री से ) ही ज्ञात नहीं होता। किन्तु उसका ग्राहक प्रमाण अनुमान है। अतः ज्ञानप्रामाण्य, अनुमानरूप 'पर-प्रमाण' से ग्राह्य होने के कारण 'परतोग्राह्य' है। प्रामाण्यग्राहक अनुमान इस प्रकार है—दूर स्थित पदार्थ का 'यह जल है' इत्याकारक जो ज्ञान मुझे हुआ, वह प्रमा ( यथार्थ = सत्य ज्ञान ) है, क्योंकि वह संवादि का ( सफल प्रवृत्ति का ) जनक है, अर्थात् उस जल की ओर देखकर उसे पीने के लिये जो मेरी प्रवृत्ति हुई वह सफल हुई) ( वहां मुझे पीने के लिये पानी मिलने से पूर्व हुआ ज्ञान, सफल प्रवृत्ति का जनक हुआ ) व्यतिरेक से भ्रमज्ञान के समान। अर्थात् इसके पूर्व मुझे शुक्ति की जगह 'यह रजत है' यह ज्ञान हुआ था, वह ऐसा सफल प्रवृत्तिजनक नहीं हुआ था, क्योंकि समीप जाकर देखते ही हाथ में सीप आई, इसलिये वह विफ़ल प्रवृत्ति का ( विसंवादि प्रवृत्ति का ) जनक हुआ तथा अप्रमारूप हुआ। परन्तु यह जल ज्ञान वैसा विफ़ल प्रवृत्तिजनक नही हुआ इस कारण यह प्रमारूप होना चाहिये, इस अनुमान प्रमाण से ही ज्ञान प्रामाण्य का निश्चय होता है।