वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१६ वेदान्तपरिभाषा [ उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम्
इसी प्रकार प्रामाण्य की उत्पत्ति के विषय में भी मतभेद है। नैयायिक कहते हैं कि प्रमाओं, का प्रमाण्य परतः (गुण के कारण) उत्पन्न होता है, 'क्योंकि जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री' से उसका प्रमात्व (सत्यता) उत्पन्न होता है यह मानने पर भ्रमज्ञान को भी प्रमारूप मानना पड़ेगा।
प्रामाण्य के विषय में ऐसा विवाद होने से उसकी उत्पत्ति एवं ज्ञान के विषय में वेदान्ताभिमत सिद्धान्त 'एव मुक्तानां', इत्यादि प्रकरण से बताया गया है। 'प्रमाण' शब्द 'प्रमीयते तत् प्रमाणम्' ऐसी भावव्युत्पत्ति के द्वारा 'प्रमा' अर्थ में प्रयुक्त समझना चाहिये। धर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं-प्रत्यक्ष, अनुमिति आदि छहों प्रमाणों का प्रामाण्य स्वत एव (स्वयमेव) अर्थात् ज्ञान की सामग्री से ही उत्पन्न होता है और स्वतः एव ज्ञात होता है।
यदि कोई पूछे कि नैयायिक के जागरित रहते प्रामाण्य के स्वतस्त्व का सिद्धान्त आप कैसे कर रहे हैं ?
अतः उक्त प्रश्न का समाधान करने के लिये प्रथम 'प्रामाण्य स्वतः एव कैसे उत्पन्न होता है ?' बताते हैं। स्मृति एवं अनुभव दोनों के लिये साधारण अर्थात् स्मृति एवं अनुभव दोनों में व्याप्त रहनेवाले प्रामाण्य का लक्षण 'तद्वति तत्प्रकारकज्ञानत्व' है। लक्षण के 'तत्' पद से ज्ञान में विशेषणभूत धर्म का ग्रहण करना चाहिये। जैसे—'अयं घट:'—यह घट—इत्याकारक ज्ञान हमें हुआ। ज्ञान में 'घट विशेष्य है, और उसका (घट का) ज्ञान 'घटत्व' धर्म से हो रहा है। इसलिये 'घटत्व' उस ज्ञान में विशेषण या प्रकार कहलाता है। अतः लक्षण के 'तत्' पद से 'घटत्व' धर्म का ग्रहण करना चाहिये। तब लक्षण का अर्थ यह हुआ कि 'घटत्ववान्' पदार्थ में 'यह घट' इत्याकारक घटत्वप्रकारक ज्ञान होना ही घटप्रमा का प्रामाण्य है। 'यह घट मुझे चाहिये' यह इच्छा भी घटत्ववान् घट में घटत्वप्रकारक ही है। उसमें रहनेवाले प्रामाण्य में ज्ञान प्रामाण्य की—अतिव्याप्ति न हो जाय इसलिये लक्षण में 'ज्ञानत्व' पद दिया है। इच्छा में इच्छात्व रहता है, ज्ञानत्व नहीं। इस कारण अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है। 'तत्प्रकारकज्ञानत्व' इतना ही लक्षण यदि करें तो भ्रमज्ञान में अतिव्याप्ति होती है, क्योंकि शुक्तिका में होनेवाला 'यह रजत' इत्याकारक रजतज्ञान भी रजतत्वप्रकारक ही होता है। उसकी निवृत्ति के लिये 'तद्वति' पद का निवेश किया है। भ्रमज्ञान—रजतत्ववान् पदार्थ में नहीं होता, इसलिये दोष का निवारण हो जाता है। ज्ञान में इस प्रकार का प्रामाण्य होने पर ही उसकी इच्छा से प्रवृत्त हुए पुरुष की प्रवृत्ति (वहाँ जाना) संवादि (सफल) होती है। तस्मात् यह प्रामाण्य संवादि प्रवृत्ति के लिये अनुकूल है। यह प्रामाण्य स्वयं ही उत्पन्न होता है।
शंका—उस प्रामाण्य को अपना ही उत्पादक मानने पर अर्थात् स्वयं को ही स्वयं