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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 482 में से

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पृष्ठ 375

उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१७

का जनक कहने से 'आत्माश्रय' दोष होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य 'स्वयं ही उत्पन्न होता है', कैसे कह रहे हैं ?

समाधान—यह शंका उचित नहीं है। क्योंकि 'स्वतः प्रामाण्य' में स्वतः का अर्थ 'स्वयं से' न होकर जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री से' है। इस कारण आत्माश्रय दोष नहीं आता। नैयायिक प्रामाण्य की उत्पत्ति गुणतः (ज्ञानजनक सामग्री से, प्रामाण्यजनक सामग्री भिन्न है) मानते हैं। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि समस्त ज्ञान में अनुगत रहनेवाला एक भी गुण नहीं है। इस पर नैयायिक कदाचित् कहे कि छहों प्रमाओं के प्रामाण्य का जनक किसी एक गुण के न रहने पर भी विशेष प्रमा का जनक विशेष गुण है ही।

उदाहरणार्थ—प्रत्यक्ष में 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण (उपकारक) है अर्थात् जिस वस्तु का प्रत्यक्ष होता है उसके बहुत से ज्ञापक कतिपय अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष होने पर उस प्रत्यक्ष में प्रमात्व (प्रामाण्य = सच्चाई) उत्पन्न होता है। वैसे ही अनुमिति में 'सल्लिङ्ग परामर्श' (यथार्थ = सत्य लिङ्ग का परामर्श = ज्ञान) गुण है। हेतु यदि सत्य (वास्तविक) हो, और उसका पक्ष पर ज्ञान हो जाय तो अनुमिति में प्रामाण्य होता है। उपमिति के प्रामाण्य के लिये—'सादृश्यज्ञान' गुण की अपेक्षा होती है। शाब्दीप्रमा का प्रामाण्य, यथार्थ योग्यताज्ञान या यथार्थ तात्पर्य ज्ञान रूप गुण से सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य के लिए ज्ञानसामान्य सामग्री के व्यतिरिक्त गुण की आवश्यकता नहीं होती कैसे कह रहे हैं ?

'नापि०' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान कर नैयायिकों के स्वीकृत (माने हुए) गुणों में से किसी भी गुण का यहाँ संभव नहीं है, यह सिद्ध किया है। 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण प्रत्यक्ष प्रमा का जनक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह व्यभिचारी है। 'रूप में अवयव नहीं होते' यह तो आप भी मानते हैं। इस कारण निरवयव रूप आदि के पुष्कल (बहुत) अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष है, नहीं कहा जा सकता। तथापि रूप आदि का प्रत्यक्ष तो होता है और वह सत्य भी है। इस प्रकार प्रामाण्य ज्ञान भी होता है। उसी प्रकार निरवयव आत्मा में भी 'भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्ष' रूप गुण का होना संभव नहीं। तथापि आत्मा का मानस प्रत्यक्ष आप मानते हैं। यहाँ पर गुण के न होने पर भी प्रामाण्य रहता है इस कारण गुण का व्यतिरेक व्यभिचार होता है। क्योंकि जहाँ गुण नहीं वहाँ प्रामाण्य का भी न होना नहीं कहा जा सकता।

इस प्रकार जिस व्यक्ति को पीलिया हो जाता है उसे सब पदार्थ पीले दीखते हैं। शंख सफेद होता हुआ भी यह पीला है ऐसा उसे ज्ञान होता है यहाँ पर शंख के पुष्कल (अधिक)—अवयवों के साथ उस पुरुष के इन्द्रियों का सन्निकर्ष रूप गुण रहता है, किन्तु उस ज्ञान में प्रामाण्य पैदा नहीं होता। इस कारण 'जहाँ गुण हो वहाँ प्रामाण्य