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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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३१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमायाः परतस्त्वखण्डनम्

होता है' इस अन्वय व्याप्ति का भी व्यभिचार होता है। तस्मात् अन्वय व्यतिरेक व्यभिचार के कारण गुण को प्रामाण्य का जनक (कारण) नहीं मान सकते। इसीलिये प्रत्यक्ष प्रमा में 'भूयोऽवयवेन्द्रियसंनिकर्ष' रूप गुण संभव नहीं है।

इसी रीति से अनुमित्यादि प्रमाओं में तुम्हारे माने हुए सल्लिंग परामर्शादि गुण भी उपपन्न नहीं हो पाते। क्योंकि कहीं-कहीं धूलि में ही 'यह धूम हैं' इत्याकारक ज्ञान होता है। वहाँ पर दैवगत्या यदि अग्नि हुआ तो असल्लिंग परामर्श के होते हुए भी अनुमिति प्रमात्मक होती है। ऐसे व्यतिरेक व्यभिचार से अनुमिति के प्रामाण्य में सल्लिंग परामर्श को गुण (उपकारक) नहीं माना जा सकता। 'आदि' पद से सादृश्य ज्ञान और योग्यता ज्ञान रूप गुण को भी उपमिति एवं शब्द प्रमाओं के प्रामाण्य में व्यभिचारी समझना चाहिये। क्योंकि कभी-कभी सादृश्य भ्रम से भी यथार्थ उपमिति होती है, और विष्णु के अर्थ में हरि शब्द का उच्चारण होने पर भी भ्रम से उस शब्द का सिंह अर्थ है, ऐसा तात्पर्य भ्रम हो जाता है। इसलिये चारों प्रमाओं में अनुगत रहने वाले किसी एक गुण का तो सम्भव है ही नहीं, और न विशेष प्रमा के विशेष गुण का ही संभव है। तस्मात् प्रामाण्योत्पादन में, गुणादि सामग्री न होकर, ज्ञानजनक सामग्री ही उसकी जनक माननी चाहिये। इसलिये प्रामाण्य स्वतः एव उत्पन्न होता है।

इस पर 'भ्रमज्ञान में भी आपके मत से प्रामाण्य प्राप्त होगा' इस आशय से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—

न चैवमप्रमापि प्रमा स्यात्, ज्ञानसामान्य-सामग्र्या अविशेषादिति वाच्यम्। दोषाभावस्यापि हेतुत्वाङ्गीकारात्। न चैवं परतस्त्व¹मिति वाच्यम्। आगन्तुक-भावकारणापेक्षायामेव परतस्त्वात्।

**अर्थ—**ऐसा (ज्ञानजनक सामग्री को ही प्रामाण्योत्पादक सामग्री) मान लें तो अप्रमा (भ्रमज्ञान) भी प्रमा (यथार्थ) ज्ञान कहलायेगा। क्योंकि (वहाँ भी) ज्ञान सामान्य की सामग्री में विशेष नहीं होता।

परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि (हमने) दोषाभाव का भी हेतुत्वेन (हेतुरूप से) अंगीकार किया है। 'यह कहने से परतस्त्व प्राप्त होता है' ऐसी शंका यदि कोई करे तो ठीक नहीं है। क्योंकि आगन्तुक भाव कारण की अपेक्षा रहने पर ही परतस्त्व प्राप्त होता है।

**विवरण—शंका—**रजत का रजतरूप से ज्ञान होते समय इन्द्रियादि जो सामग्री ज्ञान की होती है, वही शुक्तिका में (सीप में) रजतभ्रम (चाँदी का भ्रम) होते समय


१. 'स्त्वम्'-इति पाठान्तरम् ।