वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
उत्पत्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१७
का जनक कहने से 'आत्माश्रय' दोष होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य 'स्वयं ही उत्पन्न होता है', कैसे कह रहे हैं ?
समाधान—यह शंका उचित नहीं है। क्योंकि 'स्वतः प्रामाण्य' में स्वतः का अर्थ 'स्वयं से' न होकर जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री से' है। इस कारण आत्माश्रय दोष नहीं आता। नैयायिक प्रामाण्य की उत्पत्ति गुणतः (ज्ञानजनक सामग्री से, प्रामाण्यजनक सामग्री भिन्न है) मानते हैं। किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि समस्त ज्ञान में अनुगत रहनेवाला एक भी गुण नहीं है। इस पर नैयायिक कदाचित् कहे कि छहों प्रमाओं के प्रामाण्य का जनक किसी एक गुण के न रहने पर भी विशेष प्रमा का जनक विशेष गुण है ही।
उदाहरणार्थ—प्रत्यक्ष में 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण (उपकारक) है अर्थात् जिस वस्तु का प्रत्यक्ष होता है उसके बहुत से ज्ञापक कतिपय अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष होने पर उस प्रत्यक्ष में प्रमात्व (प्रामाण्य = सच्चाई) उत्पन्न होता है। वैसे ही अनुमिति में 'सल्लिङ्ग परामर्श' (यथार्थ = सत्य लिङ्ग का परामर्श = ज्ञान) गुण है। हेतु यदि सत्य (वास्तविक) हो, और उसका पक्ष पर ज्ञान हो जाय तो अनुमिति में प्रामाण्य होता है। उपमिति के प्रामाण्य के लिये—'सादृश्यज्ञान' गुण की अपेक्षा होती है। शाब्दीप्रमा का प्रामाण्य, यथार्थ योग्यताज्ञान या यथार्थ तात्पर्य ज्ञान रूप गुण से सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में प्रामाण्य के लिए ज्ञानसामान्य सामग्री के व्यतिरिक्त गुण की आवश्यकता नहीं होती कैसे कह रहे हैं ?
'नापि०' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान कर नैयायिकों के स्वीकृत (माने हुए) गुणों में से किसी भी गुण का यहाँ संभव नहीं है, यह सिद्ध किया है। 'भूयोऽवयवेन्द्रिय संनिकर्ष' रूप गुण प्रत्यक्ष प्रमा का जनक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वह व्यभिचारी है। 'रूप में अवयव नहीं होते' यह तो आप भी मानते हैं। इस कारण निरवयव रूप आदि के पुष्कल (बहुत) अवयवों के साथ चक्षुरादि इन्द्रियों का संनिकर्ष है, नहीं कहा जा सकता। तथापि रूप आदि का प्रत्यक्ष तो होता है और वह सत्य भी है। इस प्रकार प्रामाण्य ज्ञान भी होता है। उसी प्रकार निरवयव आत्मा में भी 'भूयोऽवयवेन्द्रियसन्निकर्ष' रूप गुण का होना संभव नहीं। तथापि आत्मा का मानस प्रत्यक्ष आप मानते हैं। यहाँ पर गुण के न होने पर भी प्रामाण्य रहता है इस कारण गुण का व्यतिरेक व्यभिचार होता है। क्योंकि जहाँ गुण नहीं वहाँ प्रामाण्य का भी न होना नहीं कहा जा सकता।
इस प्रकार जिस व्यक्ति को पीलिया हो जाता है उसे सब पदार्थ पीले दीखते हैं। शंख सफेद होता हुआ भी यह पीला है ऐसा उसे ज्ञान होता है यहाँ पर शंख के पुष्कल (अधिक)—अवयवों के साथ उस पुरुष के इन्द्रियों का सन्निकर्ष रूप गुण रहता है, किन्तु उस ज्ञान में प्रामाण्य पैदा नहीं होता। इस कारण 'जहाँ गुण हो वहाँ प्रामाण्य
३१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमायाः परतस्त्वखण्डनम्
होता है' इस अन्वय व्याप्ति का भी व्यभिचार होता है। तस्मात् अन्वय व्यतिरेक व्यभिचार के कारण गुण को प्रामाण्य का जनक (कारण) नहीं मान सकते। इसीलिये प्रत्यक्ष प्रमा में 'भूयोऽवयवेन्द्रियसंनिकर्ष' रूप गुण संभव नहीं है।
इसी रीति से अनुमित्यादि प्रमाओं में तुम्हारे माने हुए सल्लिंग परामर्शादि गुण भी उपपन्न नहीं हो पाते। क्योंकि कहीं-कहीं धूलि में ही 'यह धूम हैं' इत्याकारक ज्ञान होता है। वहाँ पर दैवगत्या यदि अग्नि हुआ तो असल्लिंग परामर्श के होते हुए भी अनुमिति प्रमात्मक होती है। ऐसे व्यतिरेक व्यभिचार से अनुमिति के प्रामाण्य में सल्लिंग परामर्श को गुण (उपकारक) नहीं माना जा सकता। 'आदि' पद से सादृश्य ज्ञान और योग्यता ज्ञान रूप गुण को भी उपमिति एवं शब्द प्रमाओं के प्रामाण्य में व्यभिचारी समझना चाहिये। क्योंकि कभी-कभी सादृश्य भ्रम से भी यथार्थ उपमिति होती है, और विष्णु के अर्थ में हरि शब्द का उच्चारण होने पर भी भ्रम से उस शब्द का सिंह अर्थ है, ऐसा तात्पर्य भ्रम हो जाता है। इसलिये चारों प्रमाओं में अनुगत रहने वाले किसी एक गुण का तो सम्भव है ही नहीं, और न विशेष प्रमा के विशेष गुण का ही संभव है। तस्मात् प्रामाण्योत्पादन में, गुणादि सामग्री न होकर, ज्ञानजनक सामग्री ही उसकी जनक माननी चाहिये। इसलिये प्रामाण्य स्वतः एव उत्पन्न होता है।
इस पर 'भ्रमज्ञान में भी आपके मत से प्रामाण्य प्राप्त होगा' इस आशय से नैयायिकों की शंका और उसका समाधान—
न चैवमप्रमापि प्रमा स्यात्, ज्ञानसामान्य-सामग्र्या अविशेषादिति वाच्यम्। दोषाभावस्यापि हेतुत्वाङ्गीकारात्। न चैवं परतस्त्व¹मिति वाच्यम्। आगन्तुक-भावकारणापेक्षायामेव परतस्त्वात्।
**अर्थ—**ऐसा (ज्ञानजनक सामग्री को ही प्रामाण्योत्पादक सामग्री) मान लें तो अप्रमा (भ्रमज्ञान) भी प्रमा (यथार्थ) ज्ञान कहलायेगा। क्योंकि (वहाँ भी) ज्ञान सामान्य की सामग्री में विशेष नहीं होता।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि (हमने) दोषाभाव का भी हेतुत्वेन (हेतुरूप से) अंगीकार किया है। 'यह कहने से परतस्त्व प्राप्त होता है' ऐसी शंका यदि कोई करे तो ठीक नहीं है। क्योंकि आगन्तुक भाव कारण की अपेक्षा रहने पर ही परतस्त्व प्राप्त होता है।
**विवरण—शंका—**रजत का रजतरूप से ज्ञान होते समय इन्द्रियादि जो सामग्री ज्ञान की होती है, वही शुक्तिका में (सीप में) रजतभ्रम (चाँदी का भ्रम) होते समय
१. 'स्त्वम्'-इति पाठान्तरम् ।
प्रमायाः परतस्त्वखण्डनम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३१९
भी होती है। इस कारण 'जिस सामग्री से ज्ञान होता है उसी सामग्री से उस ज्ञान में प्रामाण्य होता है' यदि मानें तो भ्रम को भी प्रमा कहना होगा। रज्जु में हुआ सर्प-ज्ञान भी सत्य मानना होगा। इसलिये उसके प्रामाण्य का कारण ज्ञानजनक सामग्री से भिन्न ही मानना चाहिये।
समाधान—हमारे मत में अप्रमा में प्रमात्व नहीं आ पाता, क्योंकि प्रमा में जैसे अन्य साधन सामग्री की आवश्यकता होती है वैसे ही दोषाभावरूप सहकारिकारण की भी आवश्यकता होती है। क्योकि दोष तो सभी कार्यों में प्रतिबन्धक होता है। और उस प्रतिबन्धक का अभाव, सभी कार्यों में सहकारिकारण रहता है। उदाहरण—अग्नि कितना भी प्रज्वलित क्यों न हो, दाह्य वस्तु के साथ चन्द्रकान्त मणि का संयोग यदि हो तो वह जला नहीं पाता। क्योकि वहाँ मणि प्रतिबन्धक रहता है, इसे आप भी स्वीकार करते ही हैं। इसलिये दोषाभावरूप कारण से युक्त जो ज्ञान की सामग्री, उसके ही कारण प्रमात्मक ज्ञान होता है। सीप में जब रजत ज्ञान होता है, तब चक्षु में तिमि-रादि कोई दोष पैदा हो जाने से समस्त कारणों में से दोषाभावरूप एक कारण अप्रमा में न होने से प्रमारूप ज्ञान नहीं हो पाता। अतएव अप्रमा, प्रमारूप कभी भी नहीं हो सकती।
शंका—ऐसा मानने पर आपके लिये अप-सिद्धान्त होगा। क्योंकि ज्ञानजनक सामग्री के अतिरिक्त दोषाभावरूप पर (दूसरे) कारण का स्वीकार करने से आपने हमारा परतस्त्व पक्ष ही स्वीकृत किया-सा होगा।
समाधान—यह आक्षेप ठीक नहीं। क्योंकि आगन्तुक भावरूपकारण की, प्रमा में अपेक्षा करने पर ही परतस्त्व की प्राप्ति होगी। आप भी (नैयायिक भी) 'प्रमाया गुणजन्यत्वं उत्पत्तौ परतस्त्वम्' परतस्त्व का लक्षण यही करते हैं (गुण रूप आगन्तुक भाव कारण की अपेक्षा होने से ही परतः प्रमात्व उत्पन्न होता है) अतः दोषाभावरूप (अभावरूप) कारण की आवश्यकता मानने पर भी, प्रामाण्य में परतस्त्व, उसके कारण नहीं हो सकेगा। इस प्रकार आगन्तुक भावरूप कारण की अपेक्षा न करते हुए ज्ञानसामान्यग्राहक सामग्री से ही उत्पन्न होना ही प्रामाण्य के स्वतस्त्व का निष्कृष्ट स्वरूप है। इसमें अदृष्ट आदि की व्यावृत्ति के लिये 'आगन्तुक' पद है। और दोषाभाव-रूप कारण से परतस्त्व की प्राप्ति न हो इसलिये 'भाव' पद दिया गया है। तस्माद् अभावरूप अन्य कारणों का स्वीकार करने पर भी परतस्त्व नहीं प्राप्त होता। अतः प्रामाण्य स्वतः एव उत्पन्न होता है।
इस प्रकार 'प्रामाण्य स्वत एव उत्पन्न होता है' इस प्रतिज्ञा की सिद्धि की। अब वह प्रामाण्य स्वतोग्राह्य कैसे है? यह सिद्ध कर नैयायिक के परतोग्राह्यत्व पक्ष का निरास करते हैं।
३२० वेदान्तपरिभाषा [ प्रमात्वस्य स्वतस्त्वम्
ज्ञायते च प्रामाण्यं स्वतः । 'स्वतो ग्राह्यत्वं च दोषाभावे सति
१. 'स्वतो ग्राह्यत्वं च' आगन्तुकदोषाभावे यावती स्वाश्रयस्य प्रमात्वाश्रयस्य ग्राहकसामग्री भासकसामग्री तया ग्राह्यत्वम् । ग्राह्यत्वं नाम भास्यत्वम्, न तु तज्जन्यग्रहविषयत्वम् । यतः साक्षिण एव स्वाश्रयग्राहकत्वं तज्जन्यग्रहाभावात् । मुरारिमिश्राणां मते ज्ञानग्राहकः अनुव्यवसायः, तेन यथा ज्ञानं गृह्यते, तथा तद्गतं प्रामाण्यमपि गृह्यते । तथा च—तन्मते प्रमात्वस्य ज्ञानग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वं सिद्धमेवेति तत्साधने सिद्धसाधनं स्यात्, तद्वारणाय 'यावत्' पदनिवेशः । तथा च तेन साक्षिज्ञानादेरपि संग्रहात् तद्ग्राह्यत्वसाधने न सिद्धसाधनम्, तन्मते तस्य असिद्धत्वात् ।
इदं बोद्धव्यम्—भाट्टमते मिश्रमते च गुरुमत इव ज्ञानसामान्यस्य 'घटमहं जानामि' इत्यादिरूपेण मिति-मातृ-मेयरूपत्रिपुटीविषयकत्वं न स्वीक्रियते । 'अयं घटः' इति प्रथमं ज्ञानम्, अनन्तरं 'घटमहं जानामि' इति द्वितीयं ज्ञानं ज्ञानविषयकम्, तेनैव च प्रामाण्यग्रहणमिति तत्सिद्धान्तः । यद्यपि मतत्रयेऽपि ज्ञानविषयकज्ञानेनैव प्रामाण्यग्रहः समानः, तथापि त्रिपुटीभाननियमो गुरुमते, इतरयोस्तु प्रथमज्ञाने विषयमात्रभानम् न तु ज्ञानात्मनोरपि, इति विशेषो न अपह्नवमर्हति । तथा च भाट्टमिश्रमतयोः ज्ञानजन्यज्ञानस्यैव प्रामाण्यग्राहकत्वं, न तु प्रथमज्ञानस्येति ज्ञानग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वम् । गुरुमते तु ज्ञानजनक सामग्र्या एव ज्ञानतत्प्रामाण्यग्राहकत्वम् । तत्र मिश्रमते ज्ञानग्राहकसामग्री प्रथमव्यवसायः, भाट्टमते च ज्ञाततालिङ्गकानुमानमिति । तत्र प्रथममते 'घटमहं जानामि' इति लौकिकमानससाक्षात्कारः, द्वितीयमते तु अनुमितिरिति साक्षात्कारत्वेन, अनुमितित्वेन च विशेषेऽपि ज्ञानाकारे न विशेषलेशोऽपि । एवं च मतत्रयसाधारणः 'स्व' पदार्थो न वात्मा, किन्तु 'स्वीय' इत्येव स्वीकर्तव्यम् । तत्र गुरुमते ज्ञानसामग्र्या एव ज्ञानग्राहकसामग्रीत्वम् । भट्टमिश्रमतयोः स्वीयपदेन ज्ञाततालिङ्गकानुमानस्य अनुव्यवसायसामग्र्याश्चेति भेदस्तु अकिञ्चित्करः ।
अत्र परिभाषाकारा किं मतमभिप्रयन्तीति जिज्ञासायां, नहि गुरुमतमेतेषामभिमतम् । व्यवहारे भाट्टनयस्यैव स्वीकारात् । नापि भाट्टमतम्, भाट्टमत इव ज्ञानानुमेयत्वस्य अस्वीकारात् । अन्यथा ज्ञानप्रत्यक्षत्वादिनिर्वचनस्यानुपपत्तेः । नापि मिश्रमत्म्, स्वरूपेतर प्रत्यक्षस्थले वृत्त्यवच्छिन्नविषयावच्छिन्नान्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यानामभेदस्वीकारेण त्रिपुटीभाननियमस्वीकारात् । न चैवं सति प्रकृते विषये गुरुमतमेव वेदान्तिनामपि मतमिति वाच्यम् । वेदान्तिमते प्रमात्वाऽप्रमात्वादिविभागस्य वृत्तिज्ञानमादायैव प्रवृत्तत्वेन वृत्तिज्ञानस्य च जडस्य स्वप्रकाशत्वाऽयोगेन साक्ष्यधीनभानस्यैव स्वीकारेण च गुरुमतसाधारण्याऽसंभवः । यत्तु वृत्तेः स्वप्रकाशत्वं परिभाषायां प्रत्यक्षपरिच्छेदे वर्णितम्, तदिदं स्वविषयत्वरूपमेव, न तु साक्ष्यनपेक्षत्वरूपमिति न कोऽपि दोषः ।
ज्ञप्तौ प्रमात्वस्य स्वतःस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२१
यावत्स्वाश्रयग्राहक-सामग्रीग्राह्यत्वम्। स्वाश्रयो वृत्तिज्ञानं तद्ग्राहकं साक्षिज्ञानं तेनापि वृत्तिज्ञाने गृह्यमाणे तद्गतं¹ प्रामाण्यं² गृह्यते।
अर्थ—और प्रामाण्य स्वतः एव जाना जाता है। स्वतोग्राह्यत्व का अर्थ है 'दोष का अभाव रहते हुए यावत् (समस्त) स्वाश्रय का (प्रमा का) ग्रहण करनेवाली सामग्री के द्वारा ग्रहण किया जाना (जानना)।' स्वाश्रय का अर्थ है—वृत्तिज्ञान, उसका ग्राहक साक्षिज्ञान होता है। उसके द्वारा वृत्तिज्ञान के ग्रहण करते समय, वृत्तिज्ञाननिष्ठ प्रामाण्य भी जाना जाता है।
विवरण—जिस प्रकार प्रामाण्य की उत्पत्ति स्वतः (ज्ञानग्राहक सामग्री से ही) होती है, उसी प्रकार उसका ज्ञान भी स्वतः एव होता है और यही स्वतोग्राह्यत्व है। हमें विवक्षित स्वतोग्राह्यत्व की व्याख्या इस प्रकार है—यावत् स्वाश्रयग्राहक सामग्री के द्वारा जानना। इसका आशय यह है—प्रामाण्य या प्रमात्व प्रमा का धर्म है। जैसे पुस्तक का पुस्तकत्व धर्म पुस्तक में ही रहता है, वैसे ही प्रमात्व (प्रामाण्य) भी प्रमा-निष्ठ (ज्ञाननिष्ठ) होता है। यह ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, किन्तु वृत्तिज्ञान है। इस कारण स्व = प्रामाण्य, उसका आश्रय = आधार वृत्तिज्ञान ही होता है। इसलिए स्वाश्रय शब्द से प्रामाण्य का आश्रय जो घटादि आकार से परिणत हुई वृत्ति से अवच्छिन्न चैतन्यरूप वृत्तिज्ञान, उसका ग्रहण करना चाहिये। उन समस्त वृत्तिज्ञानों का ग्राहक (ज्ञापक) साक्षिज्ञान ही है। इस कारण साक्षिज्ञान ही स्वाश्रयग्राहक = वृत्तिज्ञानज्ञापक सामग्री है। इसी साक्षिज्ञान को नैयायिक अनुव्यवसाय कहते हैं, और यही प्रमातृचैतन्य है। इस प्रमातृचैतन्य के द्वारा वृत्तिज्ञानरूप प्रमा का जब ज्ञान होता है तभी तन्निष्ठ प्रमात्व का भी ज्ञान होता है। क्योंकि धर्मज्ञानपूर्वक ही धर्मी का (पदार्थ का) ज्ञान होता है। इसलिए प्रामाण्य का स्वाश्रयग्राहक सामग्री से ही (स्वत एव) ज्ञान होता है, यह मानना चाहिये, और यही स्वतोग्राह्यत्व है।
इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षपरिच्छेद में प्रतिपादित वेदान्ताभिमत ज्ञान प्रत्यक्ष प्रक्रिया के अनुसार देखने से भी यही सिद्ध होता है। तथाहि—ज्ञानस्थल में वृत्त्युपहितचैतन्य और प्रमातृचैतन्य की एकता आवश्यक है। इस कारण प्रमातृचैतन्य में वृत्त्युपहितचैतन्य का
यत्त न्यायरत्नमालायाम्—"आत्मवाची स्वशब्दोऽयं स्वतो भाति प्रमाणता" इति 'स्व' शब्दस्य आत्मपरत्वं वर्णितम्, तदिदं भाट्टमते त्रिपुटीभानाभावात् ज्ञाततालिङ्ग-कानुमित्यैव प्रामाण्यग्रहणाच्च न भाट्टनिरूपणपरम्, किन्तु पूर्वपक्ष्याशयसंकलनपरम् इति मन्तव्यम्। एवं च—अनधिगताबाधितार्थविषयकज्ञानत्वमबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं वा प्रामाण्यम्। इदं च प्रमात्वं धारावाहिकद्वितीयज्ञानादिषु सर्वत्राविशिष्टम्। तादृशप्रमा-जनकं प्रत्यक्षादि प्रमाणम्।
१. 'तत्रा०'–इति पाठान्तरम्।
२. 'ण्यमपि'–इति पाठान्तरम्।
२१ वे० प०
| ३२२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ज्ञप्तौ प्रमात्वस्य स्वतस्त्वम् ] |
|---|
भी एकीभाव हो ही जाता है । तब प्रमातृचैतन्य के द्वारा वृत्त्युपहितचैतन्य का ज्ञान यदि हो जाता है तो उस वृत्तिज्ञान में विद्यमान 'तद्वतितत्प्रकारकत्व' रूप प्रामाण्य का ज्ञान नहीं होता, कैसे कहा जा सकेगा ? इसलिए वृत्त्युपहितचैतन्य का प्रमातृचैतन्य के साथ ऐक्य होने पर तन्निष्ठ प्रामाण्य का भी उसके साथ ऐक्य होना मानना ही होगा । तस्मात् प्रामाण्य स्वतोग्राह्य ही है । इसलिये प्रामाण्य का ज्ञान परतः ( अनुमान से ) होता है, यह नैयायिकों का कहना योग्य नहीं है ।
परतःप्रामाण्यवादी नैयायिक अनुमान आदि को ज्ञानग्राहक सामग्री मानते हैं । उन अनुमान आदि की व्यावृत्ति करने के लिए लक्षण में 'यावत्' यह विशेषण स्वाश्रय में दिया है । अनुमान समस्त ज्ञानों का ग्राहक न होने से 'यावत्स्वाश्रय' पद से उसकी निवृत्ति हो जाती है ।
अब स्वतोग्राह्यत्व की व्याख्या में दिये गये 'दोषाभाव' का पदकृत्य बताते हैं ।
न चैवं प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः, तत्र संशयानुरोधेन दोषस्यापि सत्त्वेन दोषाभाव-घटितस्वाश्रयग्राहकाभावेन तत्र प्रामाण्यस्यैवाग्रहात् ।
'यद्वा—यावत्स्वाश्रय^२ग्राह्यत्वयोग्यत्वं स्वतःस्त्वम् । संशयस्थले प्रामाण्यस्योक्तयोग्यतासत्त्वेऽपि दोषवशेनाग्रहात् न संशयानुपपत्तिः ।
**अर्थ—**इस रीति से प्रामाण्य को स्वतोग्राह्य मानने पर प्रामाण्य विषयक संशय की अनुपपत्ति होगी' यह कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि वहाँ पर ( संशय-स्थल में ) संशय के अनुरोध से दोष के होने से प्रामाण्य का ही ग्रहण नहीं होता ।
अथवा यावत् जो स्वाश्रय, उसका ग्राहक जो साक्षिज्ञान, उससे ग्राह्य ( ज्ञात होने योग्य ) होना ही स्वतोग्राह्य का लक्षण किया जाय । संशय-स्थल के प्रामाण्य में उक्त योग्यता के होने पर भी दोष के कारण उसका ज्ञान नहीं होता । इस कारण संशय की अनुपपत्ति नहीं होती ।
**विवरण—**नैयायिकों का पूर्वपक्ष-भ्रम और प्रमा दोनों स्थलों में वृत्तिज्ञान रहता है और उसका ग्राहक साक्षिचैतन्य सर्वत्र समान ही है । इस कारण कोई भी ज्ञान, साक्षिज्ञान के द्वारा प्रकाशित होते ही उसके प्रमाष्य का निश्चय होना चाहिए । तब 'यह ज्ञान सत्य है या असत्य' इत्याकारक संशय, ज्ञान प्रामाण्य के विषय में हो ही नहीं सकता । किन्तु संशय तो होता है, वह अनुभवसिद्ध है । ऐसी स्थिति में स्वतःप्रामाण्य-वादी वेदान्तियों का पक्ष अनुपपन्न है ।
१. 'यद्वा'—एकस्यैव ज्ञानग्राहकत्वं प्रमात्वग्राहकत्वमित्युभयं कल्प्यते । तेन च ज्ञाने गृहीते तत्प्रमात्वमपि गृहीतमेवेति कुतस्तत्संशयः इत्यस्वरसादाह—'यद्वेति' ।
२. 'यद्ग्राहकग्राह्यत्व'—इति पाठान्तरम् ।
अप्रामाण्यस्य परतस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२३
**समाधान—**हमने स्वाश्रयग्राहक (वृत्तिज्ञानग्राहक) साक्षिचैतन्य को दोषाभाव में विशेषण किया है। जहाँ पर हमें संशय होता है, वहाँ अनभ्यास, अपाटव आदि दोष हुआ करते हैं। इस कारण दोषाभावरूप विशेषण से घटित स्वतोग्राह्यत्व का लक्षण उस स्थल में नहीं लागू हो सकता। अतः 'दोषाभाव से युक्त स्वाश्रयग्राहक सामग्री के द्वारा ग्राह्य होना'—यह स्वतोग्राह्यत्व का निष्कृष्ट लक्षण है।
अथवा 'दोषाभाव' विशेषण का भी लक्षण में समावेश करने की आवश्यकता नहीं है। 'स्वाश्रयग्राहकसामग्रीग्राह्यत्वयोग्यत्व' ऐसा योग्यत्व घटित लक्षण करने पर संशय उत्पन्न हो सकेगा। तथाहि—ज्ञानग्राहकसामग्री के द्वारा (साक्षिज्ञान से) प्रामाण्य का ज्ञान हो या न हो किन्तु तादृश प्रामाण्य के बोध होने की योग्यता यदि हो तो वहाँ हम—स्वतोग्राह्यत्व मानते हैं। संशयस्थल में भी ऐसी स्वतोग्राह्यता रहती है। किन्तु अनभ्यासादि दोषों के कारण प्रामाण्य का निश्चय न होने से ज्ञान के विषय में (ज्ञान में) हमें संशय होता है।
**उदाहरणार्थ—**बीज में अंकुरोत्पत्ति की योग्यता रहती है, किन्तु पर्जन्य आदि के अभाव में अंकुर उत्पन्न नहीं होता। वैसे ही संशयस्थल में प्रामाण्यग्रह होने की योग्यता तो रहती है किन्तु दोष उसमें प्रतिबन्धक होने से प्रामाण्य का निश्चय न होकर संशय उत्पन्न होता है। अतः 'दोषाभाव' विशेषण न देने पर भी योग्यत्व घटित स्वतोग्राह्यत्व का लक्षण युक्त है। और प्रामाण्य स्वतोग्राह्य ही है—यह सिद्ध हुआ।
इस प्रकार प्रामाण्य का स्वतस्त्व सिद्ध कर अप्रामाण्य की उत्पत्ति और ज्ञान परतः होते हैं—इसे बताते हैं।
'अप्रामाण्यं तु न ज्ञानसामान्य-सामग्रीप्रयोज्यम्, प्रमायामप्य- प्रामाण्यापत्तेः। किन्तु दोष-प्रयोज्यम्। नाप्यप्रामाण्यं यावत्स्वाश्रय- ग्राहक-ग्राह्यम्। अप्रामाण्य-घटक-तदभाववत्त्वादेर्वृत्तिज्ञानाऽनुपनीतत्वेन साक्षिणा ग्रहीतुमशक्यत्वात्। किन्तु विसंवादिप्रवृत्त्यादिलिङ्गकानु- मित्यादि-विषय इति परत एवाप्रामाण्यमुत्पद्यते ज्ञायते चेति।
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायामनुपलब्धि- परिच्छेदः समाप्तः॥ ६॥
१. 'अप्रामाण्यं तु' इत्यादीनां सत्कार्यवादिनों सांख्यानां सिद्धान्तं निराकुर्वन् अप्रामाण्यस्य परतस्त्वं ब्रवीति। यदि प्रामाण्यमप्रामाण्यञ्च ज्ञानसामान्यासामग्रीप्रयोज्यं स्यात्, तर्हि तयोः स्वतस्त्वं वक्तुं शक्येत, यतः एकज्ञानजात्यनुबन्धिनो प्रामाण्याप्रामाण्ये (प्रामाण्याऽप्रमात्वे) भविष्यतः। किन्तु विरोधात् तदसम्भवम्। यतो भेदनिबन्धनो हि विरुद्धधर्म-समावेशः। यथा एकस्याग्नेः शीतत्वमुष्णत्वञ्च नैवसम्भवति, तथैव एकस्य ज्ञानस्य प्रमाणत्वमप्रमाणत्वञ्च न सम्भवति। अतः अप्रामाण्यस्य ज्ञानसामान्यसामग्रीप्रयोज्यत्वं नैव कल्पनीयम्। एवं च ज्ञानसामान्यसामग्रीभिन्नजन्यत्वेन तस्य परतस्त्वमेव विभावनीयम्।
३२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अप्रामाण्यस्य परतस्त्वम्
**अर्थ—**अप्रामाण्य, ज्ञानसामान्यसामग्री का कार्य नहीं है (स्वयं उत्पन्न नहीं होता)। क्योंकि ऐसा मानने पर प्रमा में भी अप्रामाण्य प्राप्त होगा। अतः वह दोष-प्रयोज्य है (दोष का कार्य है)। वैसे ही अप्रामाण्य, यावत्स्वाश्रय-ग्राहक-साक्षिज्ञान से भी ग्राह्य (स्वतोग्राह्य) नहीं है। क्योंकि अप्रामाण्यालक्षण के (तदभाववत्त्वादि) घटकों की (अवयवों की) वृत्तिज्ञान से उपस्थिति नहीं होती। इस कारण साक्षिज्ञान के द्वारा उसका ग्रहण होना संभव नहीं। अप्रामाण्य तो विसंवादि (विफल प्रवृत्ति) आदि हेतुओं से होने वाली अनुमिति आदि ज्ञानों का विषय है। तस्मात् अप्रामाण्य परतः ही उत्पन्न होता है और परतः ही ज्ञात होता है।
**विवरण—**ज्ञान प्रामाण्य के समान उसका अप्रामाण्य (अयथार्थत्व) स्वतः उत्पन्न नहीं होता। ज्ञान सामान्य सामग्री से ही उस ज्ञान में अप्रामाण्य उत्पन्न होता है—कहने पर प्रमा में भी अप्रमात्व प्राप्त होगा। क्योंकि ज्ञानसामान्य की इन्द्रियादि सामग्री, भ्रम और प्रमा दोनों में समान है। साधन में यदि भेद न हो तो साध्य में भी भेद उत्पन्न नहीं होगा।
**प्रश्न—**तो अप्रामाण्य की उत्पत्ति कैसे होती है ?
**उत्तर—**ज्ञानसामान्यसामग्री-व्यतिरिक्त दोष ही अप्रामाण्य में जनक होते हैं। चक्षुरादि इन्द्रियों में मन्द प्रकाश आदि दोष हों तो ज्ञान के अप्रामाण्य उत्पन्न होता है—यह अनुभव है। एतावता अप्रामाण्य परतः ही उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार अप्रामाण्य स्वतोग्राह्य भी नहीं है। 'तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानत्वम्–वस्तुतः रजतत्वाभाववान् पदार्थ में रजतत्व-प्रकारक-ज्ञान होना ही अप्रामाण्य का लक्षण है। ऐसे अप्रामाण्य का ज्ञान, यावत् स्वाश्रयग्राहक सामग्री से साक्षिज्ञान से नहीं होता। क्योंकि अप्रामाण्य लक्षण के 'तदभाववत्व' रूप अवयव का वृत्ति के द्वारा ज्ञान न होने से उसे साक्षिभास्यत्व नहीं है। भ्रम स्थल में शुक्तिका आदि में रजताकार वृत्ति होती है। रजतत्वाभावाकार वृत्ति नहीं होती। और जिसकी उपस्थिति वृत्ति से नहीं होती उसका साक्षी से ज्ञान होना संभव नहीं। 'तदभावत्वादि' के 'आदि' पद से 'बाधितार्थ-विषयज्ञानत्व' रूप अप्रामाण्य लक्षण के बाधितत्व का ग्रहण करना चाहिये। अतः अप्रामाण्य का ज्ञान स्वतः नहीं होता।
**प्रश्न—**तब अप्रामाण्य का ज्ञान किस कारण से होता है ?
उत्तर—'विसंवादि०' इत्यादि वाक्य से दिया गया है। विसंवादि (विफल प्रवृत्ति) आदि से होनेवाली अनुमिति आदि में पूर्व ज्ञान का अप्रामाण्य विषय रहता है। इस कारण अप्रामाण्य, अनुमानादि ग्राह्य है। वह १अनुमान इस प्रकार है—'मुझे प्रथमतः
१. 'मम प्राथमिकं रजतज्ञानम्, अप्रमा, विसंवादिप्रवृत्तिजनकत्वात्, रज्जुसर्पज्ञानवत् ।'
अप्रामाण्यस्य परतस्त्वम् ] अनुपलब्धिपरिच्छेदः ३२५
हुआ रजत ज्ञान, अप्रमारूप होना चाहिये, क्योंकि वह विसंवादि प्रवृत्ति का जनक हुआ है, रज्जु में हुए पहले सर्प-ज्ञान के समान।' इस विषय में वेदान्ती और नैयायिकों का ऐकमत्य है।
"प्रवृत्त्यादि" यहाँ 'आदि' पद से स्वप्न में भासित हुए गजादिज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध करनेवाले 'निद्रादिदोष' आदि हेतुओं का ग्रहण करना चाहिये। 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार याप्त के कहे जाने पर भी रजतादि ज्ञान में मिथ्यात्व ज्ञात हो जाता है, इसलिए 'अनुमित्यादि' यहाँ आदि-शब्द से ऐसे शाब्द ज्ञान का स्वीकार करना चाहिये। इस कारण अप्रामाण्य, अनुमानादि परकारणजन्य होने से परतोग्राह्य ही है। स्वतोग्राह्य नहीं है। वह परतः ही उत्पन्न होता है और परतः ही ज्ञात होता है।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरणप्रकाशे
अनुपलब्धि-परिच्छेदः समाप्तः ।
-: ० :-
अथ विषयपरिच्छेदः ७
'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते' ऐसी प्रतिज्ञा कर उनमें से प्रमाण का निरूपण यहाँ तक किया गया। अब ब्रह्मरूप प्रमेय (विषय) का निरूपण करने के लिये प्रारम्भ करते हैं—
'एवं निरूपितानां प्रमाणानां प्रामाण्यं द्विविधम्—व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वं पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वं चेति। तत्र ब्रह्मस्वरूपावगाहिप्रमाणव्यतिरिक्तानां सर्वप्रमाणानामाद्यं प्रामाण्यम्, तद्विषयाणां व्यवहारदशायां बाधाभावात् द्वितीयं तु जीवब्रह्मैक्य-पराणां 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छा० ६-२-१) इत्यादीनां 'तत्त्वमसि' (छा० ६-८-१) इत्यन्तानाम्। तद्विषयस्य जीवपरैक्यस्य कालत्रयाबाध्यत्वात्।
अर्थ— इस प्रकार निरूपित किये गये प्रमाणों का प्रामाण्य दो प्रकार का है १— व्यावहारिक तत्त्व का आवेदक (निवेदन करनेवाला) और २—पारमार्थिक वस्तु का आवेदन (ज्ञान) करानेवाला। उनमें से ब्रह्मस्वरूप के बोधक प्रमाण के अतिरिक्त (अन्य) प्रमाणों में प्रथम व्यावहारिक प्रामाण्य होता है। क्योंकि उनके विषय व्यवहार-काल में बाधित नहीं होते। परन्तु 'हे प्रियदर्शन श्वेतकेतो पहले यह सत् ही था।' इत्यादि 'वह ब्रह्म तू ही है' एतदन्त वाक्यों में द्वितीय (पारमार्थिक) प्रामाण्य होता है। क्योंकि जीवब्रह्मैक्य रूप विषय तीनों काल में अबाध्य रहता है।
विवरण— 'अबाधित-विषयत्व'—विषय का बाधित न होना, यह प्रामाण्य का लक्षण है। ब्रह्मबोधक प्रमाण से भिन्न प्रमाणों के विषय व्यवहारदशा में ही अबाधित होते हैं। ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान होने पर जगन्मिथ्यात्वज्ञान होने से उनका बाध होता है। इसलिए उनका प्रामाण्य (व्यवहार में जिनका बाध नहीं होता ऐसी वस्तुओं का
१. 'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च निरूप्यते' इति पूर्वं प्रतिज्ञातमासीत्। तत्र त्रिषु विषयेषु प्रमाणविभागो निरूपितः। अत्र प्रमेयं निरूपयितुमुपक्रमते।
अबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं प्रमात्वम्, इत्यत्र 'अबाधितपदेन' व्यवहारकालाबाधितत्वस्यैव ग्रहणात् सर्वेषामपि प्रमाणानां प्रामाण्यं समानम्। व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वम्—व्यवहारकालाबाध्यसत्त्वावगाहिज्ञानजनकत्वम्। परमार्थिकतत्त्वावेदकत्वम्—कालत्रयाबाध्यसत्त्वावगाहिज्ञानजनकत्वम्।
लक्षणविभागः ] विषयपरिच्छेदः ३२७
बोधन करना--इस स्वरूप का ) व्यवहारिक ही रहता है । किन्तु इसके विपरीत 'सदेव सोम्य' इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादन किया हुआ जीवब्रह्मैक्य कभी भी बाधित नहीं होता । इस कारण ब्रह्मबोधक प्रमाणों में ( पारमार्थिक अबाध्य वस्तु का बोधकत्वरूप ) प्रामाण्य होने से ब्रह्मात्मैक्य प्रतिपादक वाक्य ही तत्त्वतः प्रमाण होते हैं ।
अतः क्रम-प्राप्त प्रमेय का निरूपण कर्तव्य होने पर व्यावहारिक विषयों का निरूपण वेदान्तोपयोगी न होने से जीवब्रह्माभेद का ही निरूपण करना चाहिए और वह 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन है । इसलिये प्रथम 'तत्' पदार्थ निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं ।
तच्चैक्यं तत्त्वं-पदार्थ-ज्ञानाधीनज्ञानमिति प्रथमं तत्पदार्थो लक्षणप्रमाणाभ्यां निरूप्यते । ^१तत्र लक्षणं द्विविधम्—स्वरूपलक्षणं तटस्थलक्षणं चेति । तत्र स्वरूपमेव लक्षणं स्वरूपलक्षणम्, यथा सत्यादिकं ब्रह्मस्वरूपलक्षणम् । 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० २-१-१ ) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ( तै० ३-६ ) इति श्रुतेः ।
अर्थ— और वह ऐक्य ज्ञान 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन होने से प्रथम 'तत्' पद के अर्थ का लक्षण एवं प्रमाणों से निरूपण किया जाता है । उनमें लक्षण, स्वरूप लक्षण और तटस्थ-लक्षण भेद से दो प्रकार का होता है । उन दोनों में से स्वरूपभूत लक्षण कहते हैं । जैसे—'सत्यादि' ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है' 'आनन्द ही ब्रह्म है, ऐसा उसने जाना' ये श्रुतियां इस विषय में प्रमाण हैं ।
विवरण— 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के ज्ञान के बिना उनका अभेद भी ज्ञात नहीं होता । इन दो पदों में से 'तत्' प्रथम होने से उसका ( तत् पद का ) लक्षण प्रमाणादि प्रथम बताया है । ब्रह्म का लक्षण और प्रमाण भिन्न न होकर एक वाक्य ही है । इसलिये 'लक्षणप्रमाणाभ्यां' यहाँ द्विवचन से स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में से स्वरूपभूत लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में स्वरूपभूत लक्षण को स्वरूप लक्षण कहते हैं; जैसे— लौहित्य, उष्णता और प्रकाश दीपक का
^१. 'तत्र' इत्यत्र त्रल्प्रत्ययः अभेदार्थः । तद्रूपं लक्षणं द्विविधमित्यर्थः । यद्यपि तटस्थलक्षणं सामान्यलक्षणं, स्वरूपलक्षणं च विशेषलक्षणम् अतः पूर्वं तटस्थलक्षणं वक्तव्यम् अनन्तरं स्वरूपलक्षणं वक्तव्यम्, तथापि सामान्यस्य प्रथमतः, विशेषस्य च अनन्तरं निर्देशः इति सामान्यस्वरूपस्य विशेषस्वरूपस्य च अनुमानिकत्वे एव प्रवर्तते, न तु श्रौतत्वे । श्रौतत्वे तु सामान्य-विशेषयोः श्रुतिक्रमानुसारेणैव लक्षणनिर्देशोऽपि युक्त इति श्रुतौ सत्यादिवाक्यस्य प्राथम्यात् जन्मादिवाक्यस्य च उत्तरत्वात् सामान्यलक्षणस्य प्रथममत्र निर्देशः इति बोध्यम् ।
| ३२८ | वेदान्तपरिभाषा | [ तटस्थलक्षणम् |
|---|
स्वरूप है। वैसे ही श्रुतिप्रतिपादित सत्, चित् और आनन्द, ब्रह्म का स्वरूप है और वही लक्षण होने से वह स्वरूप-लक्षण कहलाता है।
शंका--'असाधारणधर्मो लक्षणम्'--लक्ष्य पदार्थ में विद्यमान असाधारण-धर्म को ही लक्षण कहते हैं। सत्यादि धर्म वैसा न होने से उसे लक्षण कैसे कहा जाय ? इस आशय से वादी की शंका और उसका समाधान—
ननु १स्वस्य स्ववृत्तित्वाभावे कथं लक्षणत्वमिति चेत् । न । स्वस्यैव स्वापेक्षया धर्मिधर्मभाव-कल्पनया लक्ष्य-लक्षणत्व-सम्भवात् । तदुक्तम्—'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं चेति सन्ति धर्माः, अपृथ-क्त्वेऽपि चैतन्यात्पृथगिवावभासन्ते' इति ।
**अर्थ—**स्वयं में स्ववृत्तित्व का अभाव होने से स्वयं का ही वह लक्षण कैसे हो सकेगा ? ( उसमें लक्षणत्व कैसे सम्भव है ) यह शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि स्वयं में ही स्व की अपेक्षा से की हुई धर्म-धर्मिभाव की कल्पना से लक्ष्यत्व और लक्षणत्व बन सकता है। इस विषय में ( पद्मपादाचार्य की सम्मति दिखलाते हैं ) इसीलिए कहा है कि आनन्द, विषयानुभव और नित्यत्व--ये धर्म हैं, क्योंकि वे चैतन्य से पृथक् न होने पर भी पृथक् से भासित होते हैं।
**विवरण--शंका--**स्वरूप को ही लक्षण मानने से लक्ष्य में ही लक्षणत्व प्राप्त होगा ( लक्ष्य ही लक्षण हो जायगा )। लक्षणभूत धर्म लक्ष्य में रहना चाहिये। सत्यादि धर्म तो स्वरूप ही हैं। इसलिये उस स्वरूप में स्ववृत्तित्व का होना सम्भव नहीं। ऐसी स्थिति में सत्यादि, ब्रह्म के लक्षण कैसे हो सकेंगे ?
**समाधान—**यह कोई नियम नहीं है कि लक्षणभूत धर्म लक्ष्य से पृथक् हो, स्वयं में भी विशिष्ट अपेक्षा से धर्मत्व एवं धर्मित्व की कल्पना कर लक्षणत्व एवं लक्ष्यत्व का होना सम्भव हो सकता है। अर्थात् एक ही ब्रह्म, सत्यत्व रूप काल्पनिक धर्म से लक्षण होता है और वही ब्रह्मत्वरूप धर्म से लक्ष्य होता है। इसीलिये तो पंचपादिका में आनन्द, ज्ञान और सत्यत्व—ये चैतन्य से भिन्न नहीं हैं तथापि भिन्न से प्रतीत होते हैं, इस कारण उन्हें ब्रह्म के धर्म कहा गया है।
अब तटस्थ-लक्षण का स्वरूप बताकर ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण करते हैं—
तटस्थलक्षणं २तु यावल्लक्ष्यकालमनवस्थितत्वे सति यद्व्यावर्तकं तदेव यथा गन्धवत्त्वं पृथिवीलक्षणम् । महाप्रलये परमाणुषु उत्पत्तिकाले घटादिषु३ गन्धाभावात् । प्रकृते ४ब्रह्मणि च जगज्जन्मादिकारणत्वम् ।
१. 'स्वरूपस्य'--इति पाठान्तरम् ।
२. 'नाम'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'च' पाठान्तरम् ।
४. 'ते च ज' इति पाठान्तरम् ।
ब्रह्मणो जगत्कर्तृत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३२९
अत्र जगत्पदेन कार्यजातं विवक्षितम्, कारणत्वं च कर्तृत्व¹मतोऽविद्यादौ नातिव्याप्तिः ।
अर्थ— जो लक्षण लक्ष्य के यावत् काल पर्यन्त ( जब तक लक्ष्य रहे तब तक ) स्थिर न रहकर लक्ष्य का व्यावर्तक ( अन्य पदार्थ से भेदक ) हो उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं । जैसे—गन्धवत्त्व पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण है । क्योंकि महाप्रलय के समय परमाणुओं में और उत्पत्तिकाल के घटादिकों में गन्ध नहीं होता । प्रकृत प्रसंग में जगज्जन्मादि-कारणत्व, ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है । यहाँ 'जगत्' शब्द से यावत् कार्य विवक्षित हैं और 'कारणत्व' पद से कर्तृत्व अभिप्रेत है । इस कारण इस लक्षण की अविद्यादि में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
विवरण— जबतक लक्ष्य स्थिर रहे तब तक उसमें न रहकर ( कुछ समय तक ही लक्ष्य में रहकर ) अन्य पदार्थों से लक्ष्य को भिन्न करनेवाले लक्षण को तटस्थ लक्षण कहते हैं । उदाहरण—पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण 'गन्ध' है, क्योंकि वह महाप्रलय के समय पृथ्वीपरमाणुओं में नहीं रहता और न प्रथम ( उत्पत्तिक्षण में घटादिकार्यरूप ) पृथ्वी में ही—ऐसा नैयायिक मानते हैं । 'उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति' उत्पन्न हुआ द्रव्य क्षण-भर निर्गुण रहता है, यह उनका सिद्धान्त है । तथापि गन्धगुण के कारण पृथ्वी, जलादि अन्य द्रव्यों से भिन्न है—ऐसा ज्ञान होता है । इसलिये गन्ध में तटस्थ लक्षण का समन्वय हो जाता है । ऐसे ही प्रकृत ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-हेतुत्व भी सृष्ट्युत्पत्त्यादि काल में ही रहता है । प्रलय के पश्चात् जगत् के ही न होने से उसका कारणत्व भी उसमें नहीं रहता । तथापि जगत् का कारणत्व, ब्रह्मव्यतिरिक्त अन्य पदार्थों में सम्भव न होने से, वह ब्रह्म को अन्यों से व्यावृत्त ( भिन्न ) करता है । इसलिए 'जगज्जन्मादिकारणत्व' ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण है ।
शंका— जगत् के जन्मादिकों की कारणता, माया में भी होने से यह लक्षण वहाँ भी अतिव्याप्त है । इस शंका को दूर करने के लिये 'कारणत्व' शब्द से कर्तृत्वरूप निमित्त कारण, हमें विवक्षित है । जड-अविद्या ( माया ) में जगत् की उपादान-कारणता ही है कर्तृत्व नहीं है । इस कारण उसमें इस ब्रह्म-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । 'आदि' शब्द से अदृष्टादि का स्वीकार करना चाहिए ।
प्रश्न— कर्तृत्व से क्या तात्पर्य है ? और ब्रह्म में कर्तृत्व मानने पर उक्त अति-का निरास कैसे होता है ? ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—
कर्तृत्वं च तत्तदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्वम् । ईश्वरस्य तावदुपादानगोचरापरोक्षज्ञान-सद्भावे च 'यः सर्वज्ञः सर्व-
१. 'त्वं तेना'—इति पाठान्तरम् ।
३३० | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो नवलक्षणानि
विद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ( मुं० १-१-९ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशचिकीर्षा-सद्भावे१ 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशकृतौ च तन्मनोऽकुरुत' इत्यादि२वाक्यम् ।
अर्थ—उन-उन उपादान कारणों का अपरोक्षज्ञान, चिकीर्षा ( करने की इच्छा ) और कृति ( प्रयत्न ) का होना ही कर्तृत्व है । ईश्वर में उपादान-विषयक अपरोक्षज्ञान के होने में 'जो अक्षरसंज्ञक ईश्वर सामान्यतः और विशेषतः भी सर्वज्ञ है और जिसका तप ज्ञानमय ही है, उससे यह हिरण्यगर्भाख्य ब्रह्म, नाम, रूप और व्रीहियवादिरूप अन्न उत्पन्न होता है' ( मुं० १-१-९ ) श्रुति ही प्रमाण है । उसे वैसी ( जगद्विषयक ) चिकीर्षा के होने में 'मैं बहुत होऊँ एवं प्रजा उत्पन्न करूँ ऐसी इच्छा उसने ( आत्मा ने ) की' ( तै० २-६ ) इत्यादि श्रुतिप्रमाण हैं । और उसकी कृति के विषय में 'उस ब्रह्म ने मन को उत्पन्न किया' इत्यादि श्रुतिवाक्य ( बृ० १-२-१ ) आधार हैं ।
विवरण—जिसे कार्य के उपादान कारण का अपरोक्ष ( प्रत्यक्षात्मक ) ज्ञान हो और उस कार्य के करने की इच्छा तदनुकूल प्रयत्न भी जिसका हो उसे उस कार्य का कर्ता कहते हैं । जैसे—कुम्हार में घट की मृत्तिकारूप उपादान कारण का प्रत्यक्षज्ञान, घट उत्पन्न करने की इच्छा और दो कपालों का संयोग कराने वाला प्रयत्न भी रहता है, इसलिये वह घट का कर्ता है । उसी प्रकार प्रकृत ईश्वर में भी जगत् के उपादान कारण ( माया ) का ज्ञान आदि होने से वह जगत् का कर्ता है । माया जड होने से उसमें ज्ञान आदि का सम्भव नहीं । इस कारण माया जगत् की कर्त्री नहीं है । अतः ब्रह्म के जगत्कर्तृत्वरूप तटस्थलक्षण की उसमें अतिव्याप्ति नहीं होती ।
शंका—ब्रह्म में इस प्रकार के कर्तृत्व के होने में क्या प्रमाण है ?
उत्तर—इसीलिए तो ग्रन्थकार ने क्रमशः उपादानविषयक ज्ञान, चिकीर्षा और कृति को बताया है । इस विषय में तीन श्रुतिवाक्यों को भी उद्धृत किया है । 'आदि' शब्द से 'स प्राणमसृजत' ( प्र० ६-४ ) आदि श्रुतियों को भी समझ लेना चाहिये । ज्ञान, इच्छा और कृति ये तीनों मिलकर ब्रह्म का एक लक्षण नहीं हैं, अपितु वे तीन लक्षण हैं, ऐसा ग्रन्थकार कहते हैं ।
३ज्ञानेच्छाकृतीनां मध्येऽन्यतमगर्भलक्षणत्रितय४मिदं विवक्षितम्,
१. 'वे च-इति पाठान्तरम् ।
२. 'दिश्रुतिवा'—इति पाठान्तरम् ।
३. ज्ञानेच्छाद्यन्यतमगर्भ०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'यं विव०'—इति पाठान्तरम् ।
ब्रह्मणो नवलक्षणानि ] •विषयपरिच्छेदः ३३१
अन्यथा व्यर्थ-विशेषण¹त्वापत्तेः । अत एव जन्म-स्थिति-ध्वंसाना- मन्यतमस्यैव लक्षणे प्रवेशः । एवं च² प्रकृते लक्षणानि नव सम्पद्यन्ते । ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वे च—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' ( तै० ३–१ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् ।
अर्थ—ज्ञान, इच्छा और कृति--इनमें से कोई एक भी जिसके गर्भ में ( भीतर ) घटक हो, ऐसे तीन लक्षण ( यहाँ ) विवक्षित हैं। नहीं तो उन्हें व्यर्थ विशेषणत्व प्राप्त होगा ( उनका विशेषण रूप से रहना व्यर्थ होगा )। इसीलिये 'जन्म स्थिति और भङ्ग ( नाश )—इनमें से भी एक-एक का ही लक्षण में प्रवेश समझना चाहिये । इस प्रकार प्रकृत में ( ब्रह्म के ) नौ लक्षण होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादिकों की कारणता के विषय में 'जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न हुए भूत जिसके कारण जीवित रहते हैं, और लय के समय जिसमें प्रवेश करते हैं ( वह ब्रह्म हैं )' इत्यादि श्रुतिप्रमाण है ( तै० ३-१ ) ।
विवरण—ऊपर बताये हुए ज्ञान, इच्छा, कृति में से प्रत्येक को लक्षण में निविष्ट कर 'जगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानत्व' 'जगच्चिकीर्षावत्व' और 'जगदुत्पादनानुकूलकृतिमत्त्व' इस प्रकार के तीन स्वतन्त्र लक्षण ही यहाँ विवक्षित हैं। अन्यथा ( समस्त विशेषण मिलकर ब्रह्म का यह एक ही लक्षण है—ऐसा मानने पर ) लक्षणगत दो विशेषण व्यर्थ होंगे। क्योंकि उनसे किसी की भी व्यावृत्ति नहीं होती। एक विशेषण से ही ब्रह्मेतर पदार्थों का निषेध सिद्ध हो जाने से उतना ही निर्दुष्ट लक्षण हो जाता है। इस प्रकार आरम्भ में बताये हुए जन्मादिकारणत्व रूप लक्षण में भी जन्म, स्थिति और नाश में से एकैक का समावेश कर तीन लक्षण समझ लेने चाहिये। इस रीति से १—जगज्जन्मोपादानगोचरापरोक्षज्ञान, २—तज्जन्मगोचरचिकीर्षा, ३—जगज्जन्मानुकूलकृति, ४—स्थित्युपादानविषयकज्ञान, ५—स्थितीच्छा, ६—स्थितिप्रयत्न, ७—प्रलयोपादान, ८—प्रलयेच्छा, और ९—प्रलयप्रयत्न ये ब्रह्म के नौ लक्षण सिद्ध होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादि की कारणता के विषय में 'यतो वा' इत्यादि श्रुति-प्रमाण हैं। 'आदि' पद से 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।
'जन्म, स्थिति और नाश इन तीनों से उपादानकारणत्व की ही सिद्धि होती है । इस कारण उसमें निमित्तत्व तो नहीं बन पाता' इस अरुचि से लघुलक्षण बताते हैं ।
१. 'णताप०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'च लक्ष०'—इति पाठान्तरम् ।
३३२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो लघुलक्षणम्
यद्वा—निखिलजगदुपादानत्वं ब्रह्मणो लक्षणम्। उपादानत्वं च जगदध्यासाधिष्ठानत्वम् जगदाकारेण¹ विपरिणममान-मायाऽधिष्ठानत्वं वा। एतादृशमेवोपादानत्वमभिप्रेत्य 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'सच्च त्यच्चाभवत्' ( तै० २–६ ) 'बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २–६ ) इत्यादि-श्रुतिषु ब्रह्मप्रपञ्चयोस्तादात्म्य-व्यपदेशः। घटः सन् घटो भाति, घट इष्ट इत्यादि-लौकिकव्यपदेशोऽपि सच्चिदानन्दरूप-ब्रह्मैक्याध्यासात्।
अर्थ—अथवा 'समस्त जगत् का उपादानत्व' ही ब्रह्म का लक्षण है उपादानत्व का अर्थ है कि अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठानत्व, अथवा जगत् के आकार में ( जगदाकारेण ) परिणत हुई माया का अधिष्ठानत्व। ब्रह्म में रहनेवाली इसी उपादानकारणता के अभिप्राय से 'जो यह सब है वह आत्मा ही है' ( नृसिंहोत्तरतापनीय ), 'वही मूर्त और अमूर्त हुआ' ( तै० २–६ ) 'मैं बहुत होऊँ' ( तै० २–६ ) इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म और प्रपञ्च के तादात्म्य का ( ऐक्य का ) उपदेश किया गया है। 'घट-भासित होता है' और 'घट इष्ट है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म के ऐक्याध्यास से ही होता है।
विवरण—समस्त जगत् का उपादानकारणत्व ( उपादान कारण होना ) ही ब्रह्म का लक्षण है, समझ लीजिये। किन्तु चेतन ब्रह्म में जडप्रपञ्च का उपादानकारणत्व कैसे सम्भव हो सकता है ? और यह उपादानकारणत्व माया में भी होने से उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। ऐसी शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि उपादान शब्द से हमें जगद्रूप अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठान ( आधार ) ही विवक्षित है। मिथ्या रजत के भ्रम का अधिष्ठान जैसे शुक्ति होती है वैसे ही ब्रह्म में भासमान मायाकल्पित प्रपञ्च का अधिष्ठान ( विवर्तोपादान ) ब्रह्म ही है, माया नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है।
इस पर भी 'जिसका परिणाम होता है वही उपादान होता है' ऐसा यदि आपका आग्रह ही हो तो दूसरा कल्प ( पक्ष ) बताते हैं--जगदाकारेण ( जगद्रूप से ) परिणाम को प्राप्त होनेवाली ( परिणत होनेवाली ) माया का अधिष्ठानत्व ब्रह्म में होना—यही उसका उपादानत्व है। माया में परिणामि-उपादानत्व होने पर भी स्वाधिष्ठान-ब्रह्म के बिना वह कुछ नहीं कर सकती। इस कारण ब्रह्म में ही ऐसा उपादानत्व सम्भव हो सकता है। अतः यह ब्रह्मलक्षण निर्दुष्ट है।
माया के जगदाकारपरिणामित्व के होने में 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। वैसे ही ब्रह्म और प्रपञ्च का ऐक्य प्रतिपादन करनेवाली उपर्युक्त
१. 'ण परिण०'–इति पाठान्तरम्।
दुःखस्येष्टत्वापत्ति-तत्परिहारौ ] विषयपरिच्छेदः ३३३
श्रुतियाँ भी ब्रह्म के इस उपादानकारणत्व को मानकर ही प्रवृत्त हुई हैं। अन्यथा चेतनब्रह्म और जडजगत् दोनों में ऐक्य का संभव नहीं। किन्तु भ्रमाधिष्ठानत्व मानने से जिस प्रकार सर्प तो केवल भासित होता है, वस्तुतः रज्जु ही है। उसी प्रकार भासमान जगत्, परमार्थतः ब्रह्म ही है—यह उनमें अभेद उपपन्न हो जाता है। 'आदि' शब्द से 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि वचन विवक्षित हैं। इस प्रकार 'घट सत् है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी (लोगों का अभेद व्यवहार भी) सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म में जगत् का अध्यास मानकर ही होता है। क्योंकि यहाँ पर भासमान घटसत्ता, वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है। इसी प्रकार 'घट भासित होता है' यहाँ जो भास होता है, वह चैतन्य का ही होता है, और 'घट इष्ट है' वाक्य से जो इष्टत्व प्रतीत होता है वह भी ब्रह्म के आनन्दरूप में अध्यास मानकर ही होता है।
इस पर शंका और उसका समाधान—
नन्वानन्दात्मक-चिदध्यासाद् घटादेरिष्टत्व-व्यवहारे दुःखस्यापि तत्राध्यासात्त^१त्रापि इष्टत्वव्यवहारापत्तिरिति चेत्। न। आरोपे सति निमित्तानुसरणं, न तु निमित्तमस्तीत्यारोप इत्यभ्युपगमेन दुःखादौ सच्चिदंशाध्यासेऽप्यानन्दांशाध्यासाभावात्। जगति नामरूपांश-द्वय-व्यवहारस्तु अविद्यापरिणामात्मक-नामरूप-सम्बन्धात्।
तदुक्तम्—
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो^२ द्वयम्॥ इति।
अर्थ—शंका—आनन्दात्मक चैतन्य में अध्यास के कारण घटादिकों का—'घट इष्ट है' ऐसा इष्टत्व-व्यवहार होता है। ऐसा कहने से दुःख का भी उस आनन्दात्मक ब्रह्म में ही अध्यास होने के कारण उस विषय में भी (दुःख इष्ट है) इत्याकारक इष्टत्व व्यवहार होने लगेगा।' ऐसी शंका करें—तो वह ठीक नहीं। क्योंकि 'आरोप हो तो उसके निमित्त की (कारण की) कल्पना करनी चाहिये। निमित्त है इसलिये आरोप की कल्पना नहीं करनी चाहिये' यह अभ्युपगम (नियम) होने से, दुःख में सत् और चित् दो अंशों का अध्यास होने पर भी आनन्दांश का अध्यास नहीं होता, संसार में 'नाम' और 'रूप' इन दो अंशों का जो व्यवहार होता है, वह अविद्या-परिणामात्मक
१. 'तस्यापि'-इति पाठान्तरम्।
२. 'पमतो' इति पाठान्तरम्।
३३४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जगतो जन्मक्रमनिरूपणम्
नाम, रूप के सम्बन्ध से होता है। इसीलिए कहा है कि, 'है—सत्ता, भासता है—ज्ञान, प्रिय—आनन्द, तथा रूप और नाम—ये पाँच अंश, प्रत्येक पदार्थ में प्रतीत होते हैं। उनमें से प्रथम तीन—सत्, चित्, आनन्द ये 'ब्रह्मरूप' हैं, और शेष दो अंश—नाम, रूप, 'जगद्रूप' हैं।
**विवरण—**वादी कहता है कि आनन्दात्मक ब्रह्म में घटादि पदार्थों के अध्यस्त होने से उनकी 'घट मुझे इष्ट है' इत्याकारक इष्टत्वेन प्रतीति होना आप बताते हैं। तो इसी के अनुसार ब्रह्म में दुःख पदार्थ के भी अध्यस्त होने से वह भी 'दुःख मुझे इष्ट है' इस रूप से प्रतीत होना चाहिए। परन्तु ऐसा अनुभव तो किसी को नहीं है। इस कारण क्या ब्रह्म में दुःख का अध्यास न माना जाय ?
सिद्धान्ती उत्तर देता है—'यदि आरोप प्रत्यक्ष सिद्ध हो तो उसके निमित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। आरोप का निमित्त होने मात्र से ही आरोप की कल्पना नहीं की जाती' यह नियम है। अतः हम यह कल्पना करते हैं कि यस्मात् 'दुःख इष्ट है' ऐसी दुःख में इष्टत्व की प्रतीति नहीं होती, तस्मात् दुःख में केवल 'सत्' और चित्' इन दो अंशों का अध्यास होता है, आनन्दांश का नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है। 'अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम्' यह विद्यारण्य ने भी कहा है।
**शंका—**ब्रह्म तो नाम रूप से रहित होने के कारण उस पर आरोपित घटादिकों के विषय में 'अयं घटः शुक्लः' ऐसा नाम-रूपात्मक व्यवहार कैसे होता है ? ग्रन्थकार समाधान करते हैं कि जगत् में नाम-रूपात्मक व्यवहार अविद्या ( माया ) के परिणामात्मक नाम-रूप के सम्बन्ध से होता है। इसी कारण प्रत्येक पदार्थ में 'अस्ति, भाति' इत्यादि रूप से प्रतीयमान पाँच अंशों में से पहिले तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और शेष दो जगद्रूप ( माया परिणामरूप ) हैं—यह अभियुक्तों का कथन है।
इस रीति से तत् पदार्थ के स्वरूप एवं तटस्थ लक्षणों का निरूपण करने से अब उससे जगत् की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, उसे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं—
अथ जगतो जन्मक्रमो निरूप्यते—तत्र सर्गाद्यकाले परमेश्वरः सृज्यमान-प्रपञ्च-वैचित्र्य-हेतु-प्राणिकर्म-सहकृतोऽपरिमितानिरूपित-शक्ति-विशेषविशिष्ट-मायासहितः सन्नामरूपात्मक-निखिल-प्रपञ्चं प्रथमं बुद्ध्यावाकलय्येदं करिष्यामीति सङ्कल्पयति, 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' ( छा० ६-२-३ ) इति 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतेः। तत आकाशादीनि पञ्चभूतानि अपञ्चीकृतानि तन्मात्रपद¹प्रतिपाद्यानि उत्पद्यन्ते। तत्राकाशस्य शब्दो गुणः।
१. 'द वाच्यान्युत्प'-इति पाठान्तरम् ।
जगतो जन्मक्रमनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३५
वायोस्तु शब्दस्पर्शौ। तेजस्तु शब्द-स्पर्श-रूपाणि। अपां तु शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः। पृथिव्यास्तु शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः।
अर्थ— अब जगत् की उत्पत्ति का क्रम निरूपण किया जाता है। घटादिप्रपञ्च की उत्पत्ति के समय परमेश्वर उत्पाद्य प्रपञ्च की विचित्रता में कारण बनानेवाले प्राणिकर्मों की सहायता से एवं अपरिमित, अनिर्वाच्य विशेषशक्तिरूप माया से युक्त होकर प्रथमतः नाम-रूपात्मक समस्त प्रपञ्च का बुद्धि से आकलन करता है और 'यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह (ब्रह्म) 'मैं बहुत होऊँ इस प्रकार ईक्षण करता हुआ' (छां० ६-२) 'मैं बहुत होऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-ऐसी कामना उसने की' (तै० २-६) इत्यादि श्रुति इस विषय में प्रमाण है। तदनन्तर आकाशादि अपञ्चीकृत पाँच भूत उत्पन्न होते हैं। इन्हीं को (पञ्च) तन्मात्राएँ भी कहते हैं। उन भूतों में से आकाश का गुण शब्द है। किन्तु वायु के शब्द और स्पर्श दो गुण हैं। तेज के शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हैं। जल के शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं। पृथ्वी के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँच गुण हैं।
विवरण— सृष्टि करते समय प्रथमतः परमेश्वर समस्तप्रपञ्च के स्वरूप का 'यह ऐसा है' इस प्रकार से आकलन कर लेता है, उसके अनन्तर 'मैं यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह सत्यसंकल्प होने से उसके संकल्प के अनुसार क्रमशः आकाशादि पाँच सूक्ष्मभूत उत्पन्न होते हैं और वे क्रम से शब्दादि एक-एक गुणों से अधिक रहते हैं। इन अपञ्चीकृत आकाशादिभूतों को ही 'शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र' ऐसी पौराणिक संज्ञाएँ हैं। ईश्वर के संकल्पपूर्वक सृष्टि उत्पन्न करने के विषय में दो श्रुतियों का ऊपर उल्लेख कर ही चुके हैं। 'आदि' शब्द से 'आत्मा वा··· स ऐक्षत' आदि श्रुतियों का ग्रहण करना चाहिये। वैसे ही सृष्टि के आकाशादि क्रम से उत्पन्न होने के विषय में 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी' (तै० ३-१) इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति प्रसिद्ध ही है।
शंका— ईश्वर ही ब्रह्मादि स्थावरान्त जगत् का निर्माण करता है—यह माननेसे इस विषम उत्पत्ति के कारण ईश्वर का विषमता, निर्दयता आदि दोष प्राप्त होंगे—इस शंका का निरसन करने के लिये ईश्वर में, 'सृज्यमान०' विशेषण जोड़ा गया है। ईश्वर पर्जन्य के समान सर्वसाधारणतया ही उत्पादक है। उन-उन प्राणियों के विशेषगुण उनके पूर्व कर्मानुसार ही उत्पन्न होते हैं। अतः विषमता में कारण कर्म होते हैं। ईश्वर तो उनकी सहायता से उनके अनुसार केवल विभाग कर देता है, इस कारण उसमें उक्त दोष नहीं आ पाते।
यदि कोई कहे कि तुम्हारे मत में परमेश्वर कूटस्थ-निर्विकार है तब उसमें संकल्पादि कैसे हो सकेंगे?
३३६ वेदान्तपरिभाषा [ शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वनिराकरणम्
'अपरिमित' इत्यादि विशेषण से उक्त शंका का निरसन किया है । निरुपाधिक ब्रह्म में जगत् का स्रष्टृत्व ( उत्पादकत्व ) यद्यपि संभव नहीं हो सकता, तथापि अनादि, अनिर्वचनीय, अपरिमित शक्तिरूप अपनी माया की उपाधि से जब ब्रह्म, युक्त हो जाता है तब उस सोपाधिक ब्रह्म ( ईश्वर ) में जगत्कर्तृत्व उत्पन्न होता है । अतः उक्त शंका युक्त नहीं है ।
अब नैयायिकों के 'शब्द आकाश का ही गुण है' मत का निरसन करते हैं ।
न¹ च ²शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वम्, वाय्वादावपि तदुपलम्भात् । न चासौ भ्रमः, बाधकाभावात् ।
अर्थ— शब्द को केवल आकाश का ही गुण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि वायु आदि में भी उसकी प्रतीति होती है । इसे भ्रम भी नहीं कह सकते क्योंकि उस प्रतीति में कोई बाधक नहीं है ।
विवरण— शब्द केवल आकाश का ही गुण है वायु आदि भूतों में 'शब्द' गुण नहीं होता—यह नैयायिक मानते हैं । परन्तु ग्रन्थकार कहते हैं कि यह उचित नहीं है । क्योंकि आकाश में प्रतिध्वनिरूप शब्द की जैसी प्रतीति होती है, वैसी वायु, तेज, जल और पृथिवी में भी क्रम से 'बिस्स्' 'भुग् भुग्' 'बुल बुल' और 'कड कड' आदि शब्द सुनाई पड़ते हैं । अतः इस प्रतीति के अनुसार पांचों भूतों में शब्द को मानना चाहिये ।
इस पर नैयायिक कहता है कि वायु आदि द्रव्यों में शब्द की प्रतीति भ्रम से होती है । जैसे—अग्नि की उष्णता जल में भासित होने से 'उष्णं जलम्' व्यवहार होता है,
१. 'न तु श०'—इति पाठान्तरम् । २. न च शब्दस्येति । शब्दः आकाशमात्रस्य गुणः इति नैयायिकाः कथयन्ति । किन्तु वाय्वादीनामपि शब्दो गुण इति वेदान्तिनः । नैयायिका हि न हि आकाशाद् वायोरुत्पत्ति मन्यन्ते, इति न आकाशगुणस्य शब्दस्य वाय्वादिक्रमेण तेज आदिषु तेषामंगीकारो युक्तः । वेदान्तिनां तु आकाशाद् वायुरिति श्रुतिप्रमाणपरतन्त्राणां न नैयायिकानां मतादरणमुचितम् । तदुक्तं पञ्चदश्याम्—
"शब्दस्पर्शो रूपरसो गन्धो भूतगुणा इमे । एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥ प्रतिध्वनिवियच्छब्दः वायौ बीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगु भुगु ध्वनिः ॥ उष्णस्पर्शः प्रभारूपं जले बुलुबुलुध्वनिः । शीतस्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥"