भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380
३२२वेदान्तपरिभाषा[ ज्ञप्तौ प्रमात्वस्य स्वतस्त्वम् ]

भी एकीभाव हो ही जाता है । तब प्रमातृचैतन्य के द्वारा वृत्त्युपहितचैतन्य का ज्ञान यदि हो जाता है तो उस वृत्तिज्ञान में विद्यमान 'तद्वतितत्प्रकारकत्व' रूप प्रामाण्य का ज्ञान नहीं होता, कैसे कहा जा सकेगा ? इसलिए वृत्त्युपहितचैतन्य का प्रमातृचैतन्य के साथ ऐक्य होने पर तन्निष्ठ प्रामाण्य का भी उसके साथ ऐक्य होना मानना ही होगा । तस्मात् प्रामाण्य स्वतोग्राह्य ही है । इसलिये प्रामाण्य का ज्ञान परतः ( अनुमान से ) होता है, यह नैयायिकों का कहना योग्य नहीं है ।

परतःप्रामाण्यवादी नैयायिक अनुमान आदि को ज्ञानग्राहक सामग्री मानते हैं । उन अनुमान आदि की व्यावृत्ति करने के लिए लक्षण में 'यावत्' यह विशेषण स्वाश्रय में दिया है । अनुमान समस्त ज्ञानों का ग्राहक न होने से 'यावत्स्वाश्रय' पद से उसकी निवृत्ति हो जाती है ।

अब स्वतोग्राह्यत्व की व्याख्या में दिये गये 'दोषाभाव' का पदकृत्य बताते हैं ।

न चैवं प्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः, तत्र संशयानुरोधेन दोषस्यापि सत्त्वेन दोषाभाव-घटितस्वाश्रयग्राहकाभावेन तत्र प्रामाण्यस्यैवाग्रहात् ।
'यद्वा—यावत्स्वाश्रय^२ग्राह्यत्वयोग्यत्वं स्वतःस्त्वम् । संशयस्थले प्रामाण्यस्योक्तयोग्यतासत्त्वेऽपि दोषवशेनाग्रहात् न संशयानुपपत्तिः ।

**अर्थ—**इस रीति से प्रामाण्य को स्वतोग्राह्य मानने पर प्रामाण्य विषयक संशय की अनुपपत्ति होगी' यह कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि वहाँ पर ( संशय-स्थल में ) संशय के अनुरोध से दोष के होने से प्रामाण्य का ही ग्रहण नहीं होता ।

अथवा यावत् जो स्वाश्रय, उसका ग्राहक जो साक्षिज्ञान, उससे ग्राह्य ( ज्ञात होने योग्य ) होना ही स्वतोग्राह्य का लक्षण किया जाय । संशय-स्थल के प्रामाण्य में उक्त योग्यता के होने पर भी दोष के कारण उसका ज्ञान नहीं होता । इस कारण संशय की अनुपपत्ति नहीं होती ।

**विवरण—**नैयायिकों का पूर्वपक्ष-भ्रम और प्रमा दोनों स्थलों में वृत्तिज्ञान रहता है और उसका ग्राहक साक्षिचैतन्य सर्वत्र समान ही है । इस कारण कोई भी ज्ञान, साक्षिज्ञान के द्वारा प्रकाशित होते ही उसके प्रमाष्य का निश्चय होना चाहिए । तब 'यह ज्ञान सत्य है या असत्य' इत्याकारक संशय, ज्ञान प्रामाण्य के विषय में हो ही नहीं सकता । किन्तु संशय तो होता है, वह अनुभवसिद्ध है । ऐसी स्थिति में स्वतःप्रामाण्य-वादी वेदान्तियों का पक्ष अनुपपन्न है ।


१. 'यद्वा'—एकस्यैव ज्ञानग्राहकत्वं प्रमात्वग्राहकत्वमित्युभयं कल्प्यते । तेन च ज्ञाने गृहीते तत्प्रमात्वमपि गृहीतमेवेति कुतस्तत्संशयः इत्यस्वरसादाह—'यद्वेति' ।
२. 'यद्ग्राहकग्राह्यत्व'—इति पाठान्तरम् ।